आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । ३८२
घोड़ी कबूतरी की पीठोपर मलखे सिरसाका सरदार १६४
बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर त्यहि बार ॥
शङ्का फंका करि डंका तहँ बाजे घोर शोर ललकार १६५
रहा कलङ्का नहिं देही माँ ऐसे कहत चलैं सब यार ॥
पंद्रादिनका धावा करिकै बूँदी निकट गये सरदार १६६
झील देखिकै मलखाने ने तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥
लाले पीले नीले काले सबरँग ध्वजा रहे फहराय १६७
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण कछु चमकन लागे पक्षी चले बसेरन धाय १६८
परे आलसी खटिया तकि तकि संतन धुनी दीन परचाय ॥
भस्म लगायो सब अंगन में ध्यायो चरित पुरातन गाय १६६
शिवा रमा ब्रह्माणी पति के मनमें चरित रहे सुलगाय ॥
बड़े यशस्वी पितु अपने के दोऊचरणकमलकोध्याय १७०
करों तरंग यहां सों पूरण दोऊ गणपतिचरण मनाय ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं लेवैं आपन मोहिं बनाय १७१
इति श्रीलखनऊनिवसि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबू प्रयाग
नारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि
मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखान
बड़ाईवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
सवैया ॥
सत्यहैं वेद पुराण सबै मति एक असत्य यहै लखिपावा ।
मतिही के असत्य असत्य सबै यह सत्यहि २ सत्य बतावा ॥
बेद पुराण भूलनहीं यह भूल असत्य मती ठहरावा ।
ललिते मति सत्यासत्य निवारण वेद पुराणन ने दर्शावा १