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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

लाखनिका विवाह । ३८७ २१
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा तुरत लीन बुलवाय ॥
लिखी हकीकति जो गंगाधर तिनको तुरतदीन बतलाय ४३
गंगा कैलेउ तुम तम्बुन माँ तुम्हरी कैद देइँ छुड़वाय ॥
सुनिकै बातें ये जयचंदकी दोऊ गंगा लीन उठाय ४४
तब छुड़वायो जयचंद राजा पहुँचे धाम आपने जाय ॥
सम्मत कीन्ह्यो फिरि गंगाधर मड़ये मूड़ लेब कटवाय ४५
अकसर लड़काको लै आवो जावो पूत जवाहरलाल ॥
सुनिकै तुरतै सो गमनत भा आयो जहाँ बैठ नरपाल ४६
कहि समुझायो सब राजा को दोऊ चरणन शीश नवाय ॥
अकसर लड़का को पठवावो सबियाँ शंका देउ भुलाय ४७
इतना सुनिकै मलखे बोले राजन हुकुम देउ फरमाय ॥
पांच सात मिलि हमअब जैबे भौंरी तुरत देब करवाय ४८
सुनिकै बातें मलखाने की आयसु दीन कनौजीराय ॥
बैठि पालकी में लखराना देबी फूलमती को ध्याय ४६
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा देवा बनरस का सरदार ॥
गंगा मामा लखराना का सोऊ बांधि लीन हथियार ५०
सवैया ॥
ते सरदार सबै चलिकै फिरि भीतर भौन के जाय सिधाये ।
सुन्दर आसन डारितहाँ नृप आदर भाव किये अधिकाये ॥
पण्डित आयकै बैठि गयो गठिबन्धन हेतु सुता बुलवाये ।
सातसुहागिल आय तहाँ ललिते मन मोदन गीत सुनाये ५१
पहिली भाँवरिके परतै खन क्षत्री आये आध हजार ॥
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा इनहुन खैंचि लीन तलवार ५२