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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

लाखनका विवाह । ३७७ ११-
हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४
बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥
राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५
मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥
उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६
मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥
इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७
बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥
दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८
कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥
मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६
अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११०
जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥
चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११
शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥
खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२
कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥
ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३
चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥
भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४
और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५
सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥