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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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उदयसिंहका विवाह । २६५ २७
[Body]
भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३
कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४
मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥
औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥
कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६
खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥
चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७
झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८
छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥
को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६
तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४०
आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥
पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१
ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥
हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२
जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३
ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥
मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४
ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥

२८ आल्हखण्ड । २६६
इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५
ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥
नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६
मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥
इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७
गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥
पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८
उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥
यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६
इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥
घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५०
घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥
ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१
ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥
राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२
द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३
इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥
देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४
छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥
कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५
ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥
खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६
नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥

उदयसिंहका विवाह । २६७ २६
इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७
नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥
इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८
चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥
नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६
सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥
पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६०
टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥
असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१
काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥
हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२
इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥
हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३
हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥
भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४
चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५
जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६
हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥
विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७
द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥
खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८
काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥

३० आल्हखण्ड । २६८
इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६
खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥
अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७०
घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥
दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१
कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥
रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२
कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥
मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३
बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥
देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४
ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥
मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५
रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥
जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६
जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥
रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७
खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८
माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६
इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम
वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥

उदयसिंहका विवाह। २६६ ३१
सवैया ॥
दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी ।
मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥
बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी ।
काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १
सुमिरन ॥
दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥
बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १
भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥
राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २
सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥
रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३
जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥
क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४
हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥
तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५
छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥
ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥
बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १
नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥
बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २
काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।

३२ आल्हखण्ड । २७०
रारि बचैहौ की लड़िजैहौ तैसो जल्दी करी उपाय ३
इतना सुनिकै मकरँद बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
हुकुम जो पावैं महाराजा को सबको बांधि दिखावैं आय ४
सुनिकै बातैं मकरन्दा की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥
तुरत नगड़ची को बुलवायो पुरमें डौंडी दीन पिटाय ५
हुकुम पायकै मकरन्दा का फौजैं होन लगीं तय्यार ॥
रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ६
बाजे डंका अह्तंका के क्षत्री सबै भये हुशियार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ७
पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥
तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री सबै भये तय्यार ८
मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥
बैठ्यो घोड़ा पर मकरन्दा मनमें सुमिरि यशोदालाल ९
कूच करायो नरवरगढ़ ते पहुँच्यो समरभूमि मैदान ॥
गर्दा दीख्यो आसमान में बोल्यो यहां वीर मलखान १०
यहु दल आवतहै नरपति का गर्दा छाय रही असमान ॥
सँभरो सँभरो ओ रजपूतौ हमरे करो बचन अब कान ११
इतना सुनिकै मोहबेवाले तुरतै बाँधि लीन हथियार ॥
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १२
बड़िबड़ि तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥
दुहूँ ओर ते गोला छूटे हाहाकार शब्द गा छाय १३
गोला लागै ज्यहि क्षत्री के आधे सरग लिहे मड़राय ॥
गोला लागै ज्यहि घोड़े के धुनकततूलसरिसउड़िजाय १४
गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७१ ३३
गोला लागै ज्यहि साँड़िया के तुरतै गिरै भूमि अललाय १५
जौने बैलके गोला लागै मानो मगर फुल्यावै खायँ ॥
जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक द्वैजायँ १६
बड़ी दुर्दशा भै तोपन में धुवना रहा सरग में छाय ॥
दूनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द द्वैजाय १७
उठीं बँदूकै बादलपूर की जो नब्बे कै याक बिकाय ॥
मघा के बूंदन गोली बरसें झरसैं सबै शूर त्यहि घाय १८
दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेत मैदान ॥
भाला बरछी तलवारिन का लाग्यो होन घोर घमसान १६
अपन परावा कछु चीन्हैंना मारैं एक एक को जवान ॥
सूंढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे घोड़न भिरी रान में रान २०
कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहुँ कहुँ देखि परै तलवार ॥
दूनों दिशिके रजपूतन ने कीन्ह्यो तहां भड़ामड़मार २१
चलै कटारी बूँदी वाली ऊना चलै विलाइति क्यार ॥
तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूरसरदार २२
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
रुधिर किसरिता तहँ बहिनिकरी जूझे क्षत्री अमित अपार २३
हाथी सोहैं त्यहि सरिता माँ छोटे दीपन्न के अनुमान ॥
परे बछेड़ा त्यहि नदिया माँ तिनको नदी कगाराजान २४
छुरी कटारी मछली ऐसीं ढालैं कछुवा परैं दिखाय ॥
वहैं सेवारा जस नदिया माँ तैसे बहे०गार तहँ जायँ २५
नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥
परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वानशृगाल २६
बड़ी सनेही नरदेही में कहुँ कहुँ चढ़े काक खगजायँ ॥

१४ आल्हाखण्ड । २७२
नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७
को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥
जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८
हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥
छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६
परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥
कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३०
मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥
दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१
मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥
वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२
सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥
बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३
ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥
बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४
इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥
ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५
सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥
मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६
सवैया ॥
भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा ।
काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥
मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा ।
आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७

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३६ आल्हाखण्ड । २७४
ऊदन मारैं तलवारी सों बेंदुल हनै टाप के घाय ४८
यकइस हाथी असवारन को ऊदन दीन्ह्यो तुरत सुलाय ॥
ऊदन ठाकुर के मोर्चापर कउ राजपूत न रोंकै पायँ ४९
देखि वीरता बघऊदन की मकरँद दौरा गुर्ज उठाय ॥
यह गति दीख्यो मकरन्दा कै हिरियाबोली शीशनवाय ५०
हमका लाये तुम काहे को जो अब दौरै गुर्ज उठाय ॥
जादू डारों बङ्गाले की इनकी कैद लेउ करवाय ५१
इतना कहिकै हिरिया मालिनि औ ऊदनपर डरा मशान ॥
मकरँद ठाकुर त्यहि समया में तुरतै बांधि लीन तहँ आन ५२
गा हरकारा तब आल्हा ढिग औ रण हाल बतावा जाय ॥
आल्हा बोले तब देवा ते तुम इन्दल का लवो बुलाय ५३
इतना सुनतै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥
माथ नवायो सो आल्हा को अपनी लई ढाल तलवार ५४
देवा चलिभा ह्याँ तम्बू ते दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥
जीति के डंका बाजन लागे मकरँद कूच दीन करवाय ५५
बड़ी खुशाली नरपति कीन्ह्यो हिरिये द्रव्यदियो अधिकाय ॥
देवा भेटा ह्याँ सुनवाँ का सबियाँहालगयोफिरिगाय ५६
देवा भेटा फिरि द्यावलि को दोऊ चरणन शीशनवाय ॥
कही हकीकति सब नरवर की देवलि गिरी मूर्च्छा खाय ५७
कैदी द्वैगे बघऊदन जो पकरे गये सबै सरदार ॥
मोहिं अभागिनि के बेड़ा को अवधौं कौन लगावै पार ५८
इतना देवलि के कहतै खन इन्दल तहाँ पहुँचाआय ॥
हाथ जोरिकै सो देवा के बोल्यो चरणनशीशनवाय ५६
कहौ हकीकति तुम चाचा की नरवर हाल देउ बतलाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७५ ३७
देवा बोला तहँ इन्दल ते बेटा कही बूत ना जाय ६०
हिरिया मालिनि की जादूते पकड़े गये उदयसिंहराय ॥
जे व्यवहारी तुम्हरे दिशि के मकरँद कैद लीन करवाय ६१
घोड़ी जख्मी भै मलखे कै आल्हा पठयो तुम्हें बुलाय ॥
इतना सुनिकै इन्दल बोले सबकी कैद देउँ छुड़वाय ६२
हुकुम जो पावों महतारी को दादा चरण विलोकों जाय ॥
काह हकीकति है मालिनि कै सम्मुख लड़ै हमारे आय ६३
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बार बार समझाय ॥
पिता आज्ञा रघुनन्दन करि चौदह बर्ष रहे बनजाय ६४
कौन सिखाई सुत अपने को तुम ना करो पिताके बैन ॥
कही न मानैं पितु अपने की तेई गिरैं नरकके ऐन ६५
जैसे देवता पति नारी को तैसे पिता पुत्र को देव ॥
नीके जानैं धर्म शास्त्र जे ते नित करें पिता की सेव ६६
तेई सपूते नर बाजत हैं जिनके पिता बचन विशवाश ॥
कौन भरोसा नरदेही का कलियुग कौन जियनकी आश ६७
पिताहितैषी जग सब को है अपनो हुनर देय बतलाय ॥
रहै लालसा पितु उरमाहीं हमसों पुत्रहोय अधिकाय ६८
जे नहिं मानैं पितु अपने को तेई नीच जगत में भाय ॥
येई कुलीने अकुलीने के लक्षण साफपरै दिखलाय ६९
निन्दक होवैं रघुनन्दन को तासों कौन हमारो नात ॥
नेही गेही नरदेही का जगमें साँचो राम लखात ७०
इतना सुनिकै इन्दलठाकुर देवी चरण शरण गा धाय ॥
विनय सुनाई भल देवी को पढ़िपढ़िवेदऋचनको भाय ७१
बरंबुहिभै तब मठिया ते इन्दल बोल्यो शीश नवाय ॥

आल्हाखण्ड । २७६
विजय हमारी नरवर होवै तुम सुनिलेउ शारदामाय ७२
एवमस्तु भा फिरि मठिया माँ इन्दल चलिभा शीशनवाय ॥
आयसु माँग्यो फिरि माता ते सुनवाँलीन्ह्यो हृदयलगाय ७३
यन्त्र बांधिकै भुजदण्डन में मस्तक रचना दियोलगाय ॥
पढ़ि पढ़ि रक्षाके मन्त्रन को भूली जादू दीन बताय ७४
घोड़ करिलिया आल्हावाला इन्दल तुरत लीन कसवाय ॥
विदा मांगिकै महतारी सों देवा साथ चले हरषाय ७५
देवी चलिकै मठभीतर सों नरवर गढ़ै पहुंची आय ॥
काठक घोड़ा बाण अजीता लीन्ह्योसेल शनीचरजाय ७६
किरपा करिकै जगदम्बा तहँ चेतन कीन फौजको जाय ॥
इन्दल पहुंचे जब तम्बू में आल्हालीन्ह्यो गोदबिठाय ७७
चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो औ सब दीन्ह्यो कथासुनाय ॥
इन्दल बोल्यो तब आल्हा ते दादा सत्य देयँ बतलाय ७८
करो तयारी अब नरवर की सबकी कैद लेयँ छुड़वाय ॥
ठाढ़ो हाथी पचशब्दा था आल्हा तुरत लीन सजवाय ७९
बैठे हाथी आल्हाठाकुर इन्दल तुरत भये तय्यार ॥
बैठ कबूतरी पर मलखाने देवा भयो घोड़ असवार ८०
मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥
खर खर खर खर कै रथ दौरे रथ्वा चले पवनकी चाल ८१
कूचकराये आल्हा ठाकुर नरवरगढ़ै चले ततकाल ॥
कउ कउ घोड़ा हिरनचाल पर कउ कउ चलैं मोरकी चाल ८२
कउ कउ घोड़ा हंस चालपर कउ कउ सरपट रहे भगाय ॥
कदम चालपर कोऊ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८३
या विधि छैला अलबेला सब पहुँचे समरभूमि में जाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७७ १५

गा हरिकारा तब नरवरमें राजै खबरि दीन बतलाय ८४
गाफिल बैठे का महराजा शिरपर फौज पहूँची आय ॥
सुनिकै बातें हरिकारा की राजा गये सनाकाखाय ८५
आज्ञा दीन्ह्यो मकरन्दा को जावो समरभूमि तुम धाय ॥
इतना सुनतै मकरँद चलिभा तुरतै राजै शीश नवाय ८६
बाण अजीता सेल शनीचर ढूँढ़्यो घोड़ काठको जाय ॥
पता न पायो इन काहूका लाग्यो बार बार पछिताय ८७
हिरिया मालिनि के घर पहुँचा लीन्ह्यो ताको संग लिवाय ॥
चलि मकरन्दा भा नरवरते पहुँचा समरभूमि में आय ८८
आगे घोड़ा मकरन्दा का पाछे सकल सेन समुदाय ॥
ऐसी आगे इन्दल ठाकुर पहुँच्यो समरभूमिमें आय ८६
इन्दल बोल्यो मकरन्दा ते मामा काह गयो बौराय ॥
भाँवरि कैद्यो म्वरे चाचाकी चाची घरै देउ पठवाय ६०
जीति न पैहौ कुल पूज्यनते मामा साँच दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये इन्दल की मकरँद बोला बचनरिसाय ६१
सुनवाँ भौजी के बालकतूम इन्दल बेटा लगो हमार ॥
समर जो करिहौ तुम फूफा ते जैहौ अवशि यमनके द्वार ६२
इतना कहिकै मकरँद ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥
रान रान सों घोड़ा भिड़िगे ऊंटन भिड़िगै ऊंट कतार ६३
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥
तेगा छूटे बर्दवान के कोताखानी चलीं कटार ६४
भाला बलछिनकी मारुइ कहुँ कहुँ कहुँ कड़ावीन की मार ॥
चलै भुजाली कहुँ कहुँ गद्दर कहुँकहुँकठिनचलैतलवार ६५
छूटे भाला बलछी सोहैं पै जस खेत बाजरे क्यार ॥

३. तृतीय भाग: बेला का विवाह, सिरसा की लड़ाई व मलखान का वीर-गति

मुण्डन केरे मुड़ चौरा मे औ रुण्डनके लगे पहार ६६
बड़ी लड़ाई भै नत्वर में मकरँद इन्दल के मैदान ॥
बड़े लड़ैया दूनों ठाकुर रणमाँ करें घोर घमसान ६७
मकरँद बोला तहँ हिरिया ते यहिपर छाँड़ो घोर मशान ॥
इतना सुनतै इन्दल ठाकुर हिरिया पास पहुँचा ज्वान ६८
पकरिकै जूरा त्यहि हिरियाको इन्दल काटिलीन ततकाल ॥
जादू झूठी भईं हिरिया की तुरतै हैगै हाल बिहाल ६६
देखि दुर्दशा यह हिरिया कै मकरँद खैंचि लीन तलवार ॥
ऐंचिकै मारा सो इन्दल के इन्दल लीन ढालपर वार १००
बचा कुँवरुवा आल्हावाला त्यहिका राखिलीन भगवान ॥
औ ललकारा मकरन्दा को मामा मौत आपनी जान १०१
ढाल कि औझरि इन्दलमारा मकरँद गिरा मूरछाखाय ॥
उतरिकै घोड़ी ते मलखाने तुरतै मुशकलीन बँधवाय १०२
मकरँद बँधिगे समरभूमि में भगिगे सबै सिपाही ज्वान ॥
कोउन रहिगा त्यहि समया में जो क्षण एक करै मैदान १०३
कूच करायो आल्हा ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
खबरि पाय कै नरपति राजा तुरतै गयो सनाकाखाय १०४
कछू न सूझी तब नरपति को अपने मंत्री लये बुलाय ॥
मंत्र पूँछिकै तिन मंत्रिन सों आल्हा पास पहुँचे आय १०५
हाथ जोरिकै नरपति बोले मानो कही बनाफरराय ॥
कैद छुड़ायो सुत हमरे की अपने शूर लेउ छुड़वाय १०६
बेटी ब्याहैं हम ऊदन को सुख सों लौटि मोहोवे जाउ ॥
दगा जो राखै तुम्हरे सँग माँ नरपति कह्यो हमारो नाउँ १०७
सुनिकै बातें ये नरपति की आल्हा मकरँद दीन छुड़ाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७६ ४१
जायके छांड़्यो राजा सबको तम्बु गयो यऊ सब आय १०८
साइति शोधी चूड़ामणि ने आल्है खबरि दीन पहुँचाय ॥
कालिह सबेरे भौंरी हैहैं नरपति खबरिगये यहपाय १०९
इतना सुनिकै माहिल चलिभा लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥
जायकै पहुँचा नरवरगढ़ में जहँपर नरपति का दरबार ११०
बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥
माहिल बोले तहँ राजा ते मानो कही हमारी भाय १११
शूर छिपावो तुम महलन में भौरिन कटा देउ करवाय ॥
जाति बनाफर की नीची है हल्ला देशदेश अधिकाय ११२
पानी पीहै कोउ तुम्हरे ना मानो नरवर के महराज ॥
पगिया अरझी नहिं माहिलकै भावै तौन करो तुमकाज ११३
इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
तैसे कीन्ह्यो नरपति राजा जैसे माहिल गये बताय ११४
माड़ो छायो मालिन तुरतै राजै खम्भ दीन गड़वाय ॥
गऊ के गोबर आँगन लीप्यो बारिनि तुरततहांपरआय ११५
चौक बनावन प्रोहित लाग्यो आई नगर सुहागिल धाय ॥
ब्याह गीत सब गावन लागीं उत्सवदेखिपरे अधिकाय ११६
तब मकरन्दा को बुलवायो नरपति हालकह्यो समुझाय ॥
लैके नेगी तुम चलिजावो घरके ठाकुर लवो बुलाय ११७
इतना सुनिकै मकरँद चलिभा नाई बारी सङ्ग लिवाय ॥
जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ११८
हाथ जोरिकै मकरँद बोल्यो जो कछु राजै दीन सिखाय ॥
दशै आदमी भौरिन आवैं यहजब सुन्यो बनाफरराय ११९
विस्मय कीन्ह्यो आल्हा मनमों मकरँद फेरि कहा समुझाय ॥

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४२ माहलखण्ड । १८०

रारि करैया को तुमते है हमहूँलड़िभिड़िगयनअघाय १२०
इतना सुनिकै मलखे बोले मानी बात तुम्हारी भाय ॥
दशही चलिहैं अब भौंरिन में आल्है हुकुम दीन फर्माय १२१
मलखे सुलखे देवौं आल्हों इन्दलैं तुरत भयो तय्यार ॥
जोगाँ भोगाँ मन्नाँ ब्रह्माँ जंगनिक भैन चँदेलेक्यार १२२
चढ़ि चढ़ि घोड़ा हाथिन ठाकुर मड़येतर को भये तयार ॥
सुमिरि शारदा मइहरवाली ऊदनपलकी भे असवार १२३
नरपति राजा के द्वारेपर पहुँचे तुरत बनाफरराय ॥
मकरँद ठाकुर सब बीरन को घरके भीतरगयो लिवाय १२४
फाटक बन्दीकरि नरपति ने कन्या तुरत लीन बुलवाय ॥
वर औ कन्या इकठौरी भे भौरिनसमयगयोतहँआय १२५
फुलवा ऊदन का गठिबन्धन नाइनि बारिनि दीन कराय ॥
पग परछाल्यो नरपति राजा कन्या दान दीन हरषाय १२६
पहिली भाँवरिके परतै खन सबियाँ शूर गये तहँ आय ॥
मारु मारु का हल्ला हैगा येऊ उठे तड़ाका धाय १२७
आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे चलन लागि तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार १२८
कोगति बरणै राजपूतन कै मानैं नहीं नेकहू हार ॥
ना मुँह फेरैं नरवलवाले ना ई मोहवे के सरदार १२६
बड़ी गचापच भै आँगन में मुण्डन लागे ऊंच पहार ॥
जोगा भोगा दोनों भाई दोनों हाथ करैं तलवार १३०
बड़ा लड़ैया मकरँद ठाकुर आँगन भली मचाई रार ॥
जीति न दीख्यो इन दशहूँ ते नरपति गयो हियेसोंहार १३१
हाथ जोरिकै नरपति बोल्यो मानो कही बनाफरराय ?'

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उदयसिंहका विवाह । २८१ ९३

बाजी लरिका मकरन्दा है ज्यहियहदीन्ह्यो रारिमचाय १३२
स्याबसिस्याबसि तुमेकाआल्हा काहे न विजयहोय सबकाल ॥
मलखे सुलखे जिनके भाई नामी बच्छराजके लाल १३३
मेलजोल भा दुहुँ तरफा ते हैगै मारु बन्द त्यहिकाल ॥
सातौ भाँवरि फुलवा सँगमें घूमी देशराज के लाल १३४
राजा नरपति के महलन में तुरतै भात भयो तय्यार ॥
भयो बुलौवा फिरि क्षत्रिनको पहुँचे मोहबे के सरदार १३५
जेंवन बैठे आल्हा ऊदन तबहूँ चलनलागि तलवार ॥
गेडुवा पाटन की मारुन में सबियाँ शूरगये तहँ हार १३६
कीनि नम्रता फिरि नरपतिने बेटी बिदा दीन करवाय ॥
दायज दीन्ह्यो भल नरपतिने आल्हासबधनदीनलुटाय१३७
उठी पालकी नृप द्वारेते तम्बुन फेरि पहुँची आय ॥
कूचको डङ्का बाजन लाग्यो हाहाकार शब्द गोहाय १३८
खीमा उखरे रजपूतन के सो छकरन में लिये लदाय ॥
कूच करायो नरवरगढ़ते मोहबे चले शूर समुदाय १३६
बारा दिनका धावाकरिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥
दगैं सलामी तहँ आल्हाकी सुनवाँचढ़ी अटापरधाय १४०
दीख कबूतरी पर मलखाने बेंदुल चढ़ा लहुरखाभाय ॥
आल्हा इन्दल इक हौदा पर सुनवाँ गई द्वारपर आय १४१
पलकी आई तहँ फुलवा की नारिन कीन नेग सबगाय ॥
घर के भीतर के जानेकी पण्डितसाइतिदीनबताय १४२
बधू पुत्र घर भीतर गमने द्यावलि रूपन लीन बुलाय ॥
जल्दी जावो तुम मोहबे को मल्हनेखबरिजनावोजाय १४३
इतना सुनिकै रुपना चलिभा मल्हना महल पहुँचाआय ॥

९४ आल्हखण्ड । २८२
खबरि सुनाई सब मल्हना को रूपना वारबार शिरनाय १४४
बारह रानी परिमालिक की अपने कीन सबन श्रृंगार ॥
मनियादेवन को सुमिरन करि पलकी उपरभई असवार १४५
आल्हा ऊदनके महलन में रानी गई तड़ाका आय ॥
रूप देखिकै तहँ फुलवा को रानिनखुशीभईअधिकाय १४६
विदा माँगिकै न्यवतहरी सब अपने नगर चले ततकाल ॥
बाजत डङ्का अहतङ्का के पहुँचतभयेनगरनरपाल १४७
पूर मनोरथ भे ऊदन के घर घर भयो मंगलाचार ॥
ब्याह पूरभा अब फुलवा का सोये सबै शूरसरदार १४८
खेत छूटि गा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाकरकेर ॥
तुम सों ब्रह्मा यह मागतहौं सबविधिअपनिदीनताहेर १४९
नदी औ पर्वत चहु जंगल में कतहूँ जाय लेउँ अवतार ॥
तहँ तहँ स्वामी रघुबर होवें चाहौं यही सृष्टि कर्त्तार १५०
करों बन्दना पितु अपने की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १५१
बढ़े साहिबी दिन दिन दूनी औ कविकरैं सुयशको गान ॥
ललिते ऐसे नर दुर्बल को करतो कौन और सनमान १५२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसोंरहौ सदा भरपूर १५३
माथ नवायौं शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५४
इति श्रीलखनऊनिवार्सि(सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपा-
ऽनु पण्डितललिताप्रसादकृतउदनपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः॥ ३॥
इति उदयसिंहका विवाह सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
चन्द्रावलिकी चौथि अथवा बौरीगढ़की लड़ाई ॥
सवैया ॥
शेष महेश गणेश रमेश धनेश सुरेश दिनेश मनावैं ।
बावन पावन धोवन को सुखकारि पुरारि धरे सुखपावैं ॥
सोई भये जमदग्नि के बंश औ पूरण अंश पुराण बतावैं ।
वोई भये रघुनन्दन भूप सो रूप लखे ललिते मुद पावैं १
सुमिरन ॥
धन्य बखानों मैं दिनकर को जिनते पढ़ा बीर हनुमान ॥
तिनके कुलमाँ रघुनन्दन भे जिनकोजानतसकलजहान १
तिनको मानत हम परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म सुरासुरपाल ॥
चारो प्यारे नृप दशरथ के कीन्हेनिबाल रूप जो ख्याल २
सोई धारे उर गिरिजापति मनमें बालरूप के हाल ॥
काकभुशुण्डी कौवा तन को मुनि सों मांगि लीनसत्रकाल ३
कितन्यो राजा सिंहासन तजि इनके परे प्रेम के जाल ॥
सुन्यो बिभीषण की गाथा है शरणहिताकत भयो निहाल ४

२ आल्हाखण्ड । २८४
सोई ललिते जब उर आवै जावैं सबै लोक जंजाल ॥
चौथि बखानों चन्द्रावलि की सुनिये ताको पूर हवाल ५
अथ कथाप्रसङ्ग ॥
लागो सावन मनभावन जब वर्षन मेघ झमाझम लाग ॥
दुःख छूटिगा नर नारिन का उपजा हिये प्रेम अनुराग १
गड़े हिंडोला सब घर घर हैं दर दर झुंड खड़े अधिकार ॥
सावन आवन मनभावन की गावन लागीं गीत बहार २
कजली जाहिर मिर्जापुर की सिर्जा जनों वहाँ कर्त्तार ॥
गड़ैं हिंडोला कोशलपुर में अबहूँ देखें लोग बहार ३
सोई महीना जब आवत भा तब मल्हना को सुनो हवाल ॥
बेटी प्यारी चन्द्रावलि जो ताको शोच करै सब काल ४
नयनन आँसू ढरकन लागे बयनन कढ़े चित्त घबड़ाय ॥
ऐसी हालत मै मल्हना कै तबहीं गये उदयसिंहआय ५
लखिअसहालत उदयसिंह तब दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥
पूँछन लागे महरानी ते काहे गई उदासी छाय ६
सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना बोली बचन बनाय ॥
याद आयगै लरिकाई कै सोई बात गई उरछाय ७
ताहि विसूरति मैं ऊदन थी सोई गई उदासी छाय ॥
सखी हमारी एक साथ की पायो दुःख रहै अधिकाय ८
दुःख याद हो जब काहू को कोमल चित्त जाय घबड़ाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देउ बतलाय ६
आजुइ तुमका अस देखा ना बहुदिन लखातुम्हें असमाय ॥
की विप देवो उदयसिंह को की दुख देवो साँच बताय १०
करो बहाना चहू केते तुम मानी नहीं लहुरवा भाय ॥