आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । २८४
सोई ललिते जब उर आवै जावैं सबै लोक जंजाल ॥
चौथि बखानों चन्द्रावलि की सुनिये ताको पूर हवाल ५
अथ कथाप्रसङ्ग ॥
लागो सावन मनभावन जब वर्षन मेघ झमाझम लाग ॥
दुःख छूटिगा नर नारिन का उपजा हिये प्रेम अनुराग १
गड़े हिंडोला सब घर घर हैं दर दर झुंड खड़े अधिकार ॥
सावन आवन मनभावन की गावन लागीं गीत बहार २
कजली जाहिर मिर्जापुर की सिर्जा जनों वहाँ कर्त्तार ॥
गड़ैं हिंडोला कोशलपुर में अबहूँ देखें लोग बहार ३
सोई महीना जब आवत भा तब मल्हना को सुनो हवाल ॥
बेटी प्यारी चन्द्रावलि जो ताको शोच करै सब काल ४
नयनन आँसू ढरकन लागे बयनन कढ़े चित्त घबड़ाय ॥
ऐसी हालत मै मल्हना कै तबहीं गये उदयसिंहआय ५
लखिअसहालत उदयसिंह तब दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥
पूँछन लागे महरानी ते काहे गई उदासी छाय ६
सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना बोली बचन बनाय ॥
याद आयगै लरिकाई कै सोई बात गई उरछाय ७
ताहि विसूरति मैं ऊदन थी सोई गई उदासी छाय ॥
सखी हमारी एक साथ की पायो दुःख रहै अधिकाय ८
दुःख याद हो जब काहू को कोमल चित्त जाय घबड़ाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देउ बतलाय ६
आजुइ तुमका अस देखा ना बहुदिन लखातुम्हें असमाय ॥
की विप देवो उदयसिंह को की दुख देवो साँच बताय १०
करो बहाना चहू केते तुम मानी नहीं लहुरवा भाय ॥