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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

९४ आल्हखण्ड । २८२
खबरि सुनाई सब मल्हना को रूपना वारबार शिरनाय १४४
बारह रानी परिमालिक की अपने कीन सबन श्रृंगार ॥
मनियादेवन को सुमिरन करि पलकी उपरभई असवार १४५
आल्हा ऊदनके महलन में रानी गई तड़ाका आय ॥
रूप देखिकै तहँ फुलवा को रानिनखुशीभईअधिकाय १४६
विदा माँगिकै न्यवतहरी सब अपने नगर चले ततकाल ॥
बाजत डङ्का अहतङ्का के पहुँचतभयेनगरनरपाल १४७
पूर मनोरथ भे ऊदन के घर घर भयो मंगलाचार ॥
ब्याह पूरभा अब फुलवा का सोये सबै शूरसरदार १४८
खेत छूटि गा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाकरकेर ॥
तुम सों ब्रह्मा यह मागतहौं सबविधिअपनिदीनताहेर १४९
नदी औ पर्वत चहु जंगल में कतहूँ जाय लेउँ अवतार ॥
तहँ तहँ स्वामी रघुबर होवें चाहौं यही सृष्टि कर्त्तार १५०
करों बन्दना पितु अपने की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १५१
बढ़े साहिबी दिन दिन दूनी औ कविकरैं सुयशको गान ॥
ललिते ऐसे नर दुर्बल को करतो कौन और सनमान १५२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसोंरहौ सदा भरपूर १५३
माथ नवायौं शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५४
इति श्रीलखनऊनिवार्सि(सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपा-
ऽनु पण्डितललिताप्रसादकृतउदनपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः॥ ३॥
इति उदयसिंहका विवाह सम्पूर्ण ॥