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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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४२ माहलखण्ड । १८०

रारि करैया को तुमते है हमहूँलड़िभिड़िगयनअघाय १२०
इतना सुनिकै मलखे बोले मानी बात तुम्हारी भाय ॥
दशही चलिहैं अब भौंरिन में आल्है हुकुम दीन फर्माय १२१
मलखे सुलखे देवौं आल्हों इन्दलैं तुरत भयो तय्यार ॥
जोगाँ भोगाँ मन्नाँ ब्रह्माँ जंगनिक भैन चँदेलेक्यार १२२
चढ़ि चढ़ि घोड़ा हाथिन ठाकुर मड़येतर को भये तयार ॥
सुमिरि शारदा मइहरवाली ऊदनपलकी भे असवार १२३
नरपति राजा के द्वारेपर पहुँचे तुरत बनाफरराय ॥
मकरँद ठाकुर सब बीरन को घरके भीतरगयो लिवाय १२४
फाटक बन्दीकरि नरपति ने कन्या तुरत लीन बुलवाय ॥
वर औ कन्या इकठौरी भे भौरिनसमयगयोतहँआय १२५
फुलवा ऊदन का गठिबन्धन नाइनि बारिनि दीन कराय ॥
पग परछाल्यो नरपति राजा कन्या दान दीन हरषाय १२६
पहिली भाँवरिके परतै खन सबियाँ शूर गये तहँ आय ॥
मारु मारु का हल्ला हैगा येऊ उठे तड़ाका धाय १२७
आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे चलन लागि तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार १२८
कोगति बरणै राजपूतन कै मानैं नहीं नेकहू हार ॥
ना मुँह फेरैं नरवलवाले ना ई मोहवे के सरदार १२६
बड़ी गचापच भै आँगन में मुण्डन लागे ऊंच पहार ॥
जोगा भोगा दोनों भाई दोनों हाथ करैं तलवार १३०
बड़ा लड़ैया मकरँद ठाकुर आँगन भली मचाई रार ॥
जीति न दीख्यो इन दशहूँ ते नरपति गयो हियेसोंहार १३१
हाथ जोरिकै नरपति बोल्यो मानो कही बनाफरराय ?'