आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हाखण्ड । २७२
नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७
को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥
जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८
हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥
छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६
परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥
कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३०
मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥
दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१
मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥
वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२
सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥
बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३
ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥
बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४
इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥
ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५
सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥
मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६
सवैया ॥
भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा ।
काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥
मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा ।
आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७