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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
चन्द्रावलिकी चौथि अथवा बौरीगढ़की लड़ाई ॥
सवैया ॥
शेष महेश गणेश रमेश धनेश सुरेश दिनेश मनावैं ।
बावन पावन धोवन को सुखकारि पुरारि धरे सुखपावैं ॥
सोई भये जमदग्नि के बंश औ पूरण अंश पुराण बतावैं ।
वोई भये रघुनन्दन भूप सो रूप लखे ललिते मुद पावैं १
सुमिरन ॥
धन्य बखानों मैं दिनकर को जिनते पढ़ा बीर हनुमान ॥
तिनके कुलमाँ रघुनन्दन भे जिनकोजानतसकलजहान १
तिनको मानत हम परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म सुरासुरपाल ॥
चारो प्यारे नृप दशरथ के कीन्हेनिबाल रूप जो ख्याल २
सोई धारे उर गिरिजापति मनमें बालरूप के हाल ॥
काकभुशुण्डी कौवा तन को मुनि सों मांगि लीनसत्रकाल ३
कितन्यो राजा सिंहासन तजि इनके परे प्रेम के जाल ॥
सुन्यो बिभीषण की गाथा है शरणहिताकत भयो निहाल ४