आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
[Header] मलखानका बिवाह । १६३ ३७
धन्य सराही त्यहि ठाकुर को तुम सों मिलैं नात समरस्त ॥
क्यहु अभिलाषा कछु बाकीना द्वैगे सबै ज्वान अब पस्त ८१
बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥
बारह ठाकुर गे मौरिन में तेई फेरि सजे सब भाय ८२
भाला बरछी औ ढालै लै हाथ म लई सबन तलवार ॥
नाई दारी गडुवा लीन्हेनि चलिभे सबै शूर सरदार ८३
मलखे बैठे फिरि पलकी में बाजन सबै रहे लहराय ॥
एकपहर के फिरि अर्सा में राजा भवन पहुंचे जाय ८४
नाई आवा फिरि भीतर सों आल्है शीश नवावा आय ॥
जल्दी चलिये अब भोजनको करिये न देर बनाफरराय ८५
इतना सुनिकै सब क्षत्रिनने अपने कपड़ा धरे उतार ॥
ढालैं धरिकै गैंड़ावाली हाथ म लई नाँगि तलवार ८६
तब गजराजा कह आल्हा सों ठाकुर मोहबे के सरदार ॥
हमरे कुलकी यह रीती ना भोजन करत गहै हथियार ८७
एकरीति नहिं सब देशन में अपने कुला कुला व्यवहार ॥
बातैं सुनिकै ये राजा की सबहिन धराफेरि हथियार ८८
चलिकै ठाकुर गे चौका में पीढ़न उपर बैठिगे जाय ॥
षटरस व्यंजन सब परसेगे उत्तम भातगयो फिरिआय ८९
लक्ष्मी बोलत परलै द्वैगै आये सबै शूर समुदाय ॥
जान न पावैं मुहबेवाले सबका कटा देव करवाय ९०
बातें सुनिकै गजराजा की आल्हा गये सनाकाखाय ॥
गडुवा लैंकै ऊदन ठाढ़े मलखे पाटा लीन उठाय ९१
बड़ी मारु भै फिरि चौका में अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
पाटा लागै ज्यहि ठाकुर के घुर्मित गिरै मूर्च्छा खाय ९२
३८ आल्हखण्ड । १६४
को गति बर्णै तहँ ऊदन की गडुवन मारि कीन खरिहान ॥
लाखनि ब्रह्मा के मुर्चा में सम्मुख लड़ै न एकोजवान ६३
कांतामल औ सूरज ठाकुर दोऊ हाथ करैं तलवार ॥
बड़े लड़ैया मोहबे वाले ठाकुर समरधनी सरदार ६४
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
मारे मारे तलवारिन के चौका बही रक्तकी धार ६५
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडोरै गाय ॥
तैसे ठाकुर मोहबे वाले मारिकैदीन्हों समरसोवाय ६६
बहुतक जूझे भुन्नागढ़ के रानी राजै लीन बुलाय ॥
रानी बोली फिरि राजा सों मानों कही त्रिसैनेराय ६७
बड़े लड़ैया मोहबे वाले ओ महाराजा बात बनाय ॥
लड़िकैजिनिहौनहिंआल्हा सों तुम करि थाके सबै उपाय ६८
कहा न मानो तुम माहिल को नहिं सब जैहैं काम नशाय ॥
हँसी खुशी सों बेटी पठवो याहि में भला परै दिखराय ६६
बातें सुनिके ये रानी की राजा समर पहुँचा आय ॥
भुजा उठाये फिरि बोलत भा अबहीं मारु बन्द है जाय १००
मारु बन्द भै दोऊ दिशिसों राजा बोला वचन सुनाय ॥
बिदा करावो अब बेटी को नहिं कछु देर बनाफरराय १०१
बातें सुनिकै गजराजा की द्वारेगये बराती आय ॥
कपड़ा पहिरे अपने अपने सीताराम चरण मनध्याय १०२
हुकुम लगायो हाँ गजराजा बेटी बेगि होय तय्यार ॥
हुकुम पायकै गजराजा को सोलह करनलागि श्रृंगार १०३
सवैया ॥
मज्जेन चीर ओ कुण्डैल अंजन नाक में मोक्तिक बेसे सवाँरी ।
मलखानका विवाह । १६५ ३६
कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बर चन्दन धारी ॥
खायकै पाने औ धारिमैंनैनको हौर औ नूपुरैंकी झनकारी ।
सेंदुरै भाल बिशाललखे ललिते मनलज्जित मन्मथनारी १०४
ग्वरिग्वरिबहियाँ हरिहरिचुरियाँ सो मनिहारिनि दी पहिराय ॥
पहिरि मुँदरियाँ अठो अँगुरियाँ ऊपर छल्ला लये दबाय १०५
पहिरि आरसी ली अँगुठा में सीसा उपर तासु के भाय ॥
अगे अगेला पिछे पछेला बीचम छन्न रही दर्शाय १०६
टाड़ैं पहिरी सोने वाली जोसन पट्टी करैं बहार ॥
दुलरी तिलरी पंचलरीलों तापर परा मोतियन हार १०७
नथुनी लटकन की शोभाअति कानन करनफूल शृङ्गार ॥
गैरे गुज्भी ढउकानन में बँदियाँ मस्तक करै वहार १०८
बिछिया पहिरी पद अँगुरिन में अनवट सखी दीन पहिराय ॥
कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै तापर पायजेब लहराय १०६
लहँगा पहिरयो कीनखाब को चादर ओढ़िलीन फिरिभाय ॥
जैसे बादल बिजुली चमकै तसगजमोतिनिपरै दिखाय ११०
तहिले राजा फिरि आवत भे औ रानी सों कह्यो सुनाय ॥
बिदा कि बिरिया अब आई है जल्दी बेटी देउ पठाय १११
सुनिकै बातें ये राजा की रानी बेटी लीन बुलाय ॥
सीतामाता अनुसूया की सबियाँकथाकहीसमुझाय ११२
कहा न मानै जो पूरुष को नारी घोर नर्क को जाय ॥
चोर कुकर्मी जो पतिहोवै सेवा किहे नारि तरिजाय ११३
विनापराधे नारी त्यागै सो पति मरै भूखके घाय ॥
ऐसे कहिकै गजमोतिनि सों माता रोई हृदय लगाय ११४
४० आल्हखण्ड । १६६
मिला भेट करि सब काहू सों फुलियामालिनिलीनबुलाय ॥
बहुधनदीन्ह्यो फिरिफुलियाको रोवत चढ़ी पालकीजाय ११५
बड़ी खुशहाली आल्हा कीन्ह्यो बहुधन द्वारे दीन लुटाय ॥
विदा मांगिकै गजराजा सों लश्कर कूच दीनकरवाय ११६
सात रोज को धावा करिकै पहुँचे नगर मोहोवा जाय ॥
सखियाँ मंगल गावन लागीं परछन भई द्वारपर आय ११७
विदा मांगिकै न्यवतहरी सब निज निज देशगये हर्षाय ॥
चील्ह रूप धरि सुनवाँ आई मल्हनाखुशीभई अधिकाय ११८
देवलि बिरमा त्यहि औसर में फूली अंग न सकैं समाय ॥
को गति बर्णै परिमालिक की मानों इन्द्रलोक गे पाय ११९
पिता आपने की दाया सों मलखे ब्याह गयौ सब गाय ॥
नही भरोसा निज भुजबलका किरपाशंकर करैं सहाय १२०
आशिर्वाद देऊँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकौनविधिगाय १२१
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२२
इष्ट देवना मम एकै हैं पूरण ब्रह्म राम भगवन्त ।
चरणकमल तिन धरि हिरदे में ह्याँसों करौं तरंग को अन्त १२३
इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत
मलखेपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
मलखे विवाहसमाप्त ॥
इति ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
ब्रह्माका विवाह अथवा दिल्लीकी लड़ाई ॥
सवैया ॥
हैकर दीन गह्यों तुमको रघुनाथ करो अबतो रखवारी ।
पायके शाप पषाण भई मुनिनारि दयालु दियो तुम तारी ॥
हा राम कह्यो यवनो यकबार गयो तब धामहि वेगि खरारी ।
दीन पुकार करै ललिते प्रभु चूक क्षमो रघुनाथ हमारी १
सुमिरन ॥
पहिले सुमिरों पद गणेश के गौरा पारवती के बाल ॥
हाथी आनन सम आनन है सेंदुर सदा विराजै भाल १
बड़ी पियारी जिन दुर्वा है फूलो बड़े पियारे लाल ॥
भोग लगावै जो लड्डू को तापर खुशी रहें सब काल २
हैं शिवशङ्कर के लरिका ते अरिका करैं सदा जे नाश ॥
विधिवत पूजनजोकोउ कीन्हो पूरी सदा तासुकी आश ३
बड़ो भरोसो तिन गणेश को अपने हृदय करौ सब काल ॥
करो मनोरथ पूरण हमरो गौरा पारवती के लाल ४
छूटि सुमिरनी गै गणेशकै सुनिये बेला केर हवाल ॥
[Header]
३ आल्हखण्ड । १९८
ब्याह बखानौं त्यहि ब्रह्माको ज्यहिका पिता राजा परिमाल ५
[Section Title]
अथ कथाप्रसंग ॥
पृथीराज दिल्ली को राजा ज्यहिका जानै सकल जहान ॥
कन्या उपजी जब त्यहिके घर तारा टूटि तैवै असमान १
थर थर थर थर पृथ्वी कांपी दर दर बोले श्वान श्रृगाल ॥
भन् भन् भन् भन् वायू डोलीं अशकुन बहुत भये त्यहिकाल २
अशकुन दीख्यो पृथीराज ने तुरतै पंडित लीन बुलाय ॥
लै कै पोथी ज्योतिष वाली पंडित हाल दीन बतलाय ३
गौना हैहै जब कन्या का हैहै तबै घोर घमसान ॥
बहुतक क्षत्री तब नशिजैहैं झुझिहैं बड़े बड़े ह्याँ ज्वान ४
ताते बेला यहि कन्या का राखो नाम आप महराज ॥
पाय दक्षिणा पंडित चलिभो होवन लागि और फिरिकाज ५
छठी बारहौं पसनी हैगै बेला परो तासु को नाम ॥
सात वरस की जब बेला भइ खेलत फिरै सखिन के धाम ६
कोउ कोउ सखियां तहँ ब्याहीर्थी बेंदी दिये आपने भाल ॥
क्वारी पूछैं तिन ब्याहिन ते सखि तुम कहौ श्वशुरपुर हाल ७
ब्याही बोलीं अनव्याहिन ते मानो सखी बचन तुम साँच ॥
जब सुधि आवत है बालम कै तब उर जरै विरहकी आँच ८
सुरपुर नरपुर अहिपुर माहीं सो सुख नहीं परै दिखराय ॥
जो सुख पावा हम श्वशुरे में बालम छाती लीन लगाय ६
कटिगहि मसरूँ हम नहिंटसरूँ कसकै हृदय किये सुधि आज ॥
का सुख जानो तुम अनुब्याहिउ बैरिनि भई हमारी लाज १०
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी सब अनब्यही गईं शर्माय ॥
बढ़ी लालसा तब ब्याहे की व्याला घरै पहुंची आय ११
ब्रह्माका विवाह । १६६ ३
खयो मिठाई औ मेवा कछु पलँगा सोय रही फिरिजाय ॥
फिकिरि लगाये सो ब्याहे की एका एकी उठी कन्वाय १२
हम नहिं जैहैं अब श्वशुरे को यह कहि रोय उठी चिल्लाय ॥
रानी अगमा तहँ ठाढ़ी थी तुरतै छाती लीन लगाय १३
धीरज दैके माता पूछे बेटी स्वपन दीख का आज ॥
इतना सुनिकै बेटी बोली माता कहतलगै बड़िलाज १४
माता बोली फिरि बेटी सों बेटी सत्य देउ बतलाय ॥
कैसो स्वपना तुम दीख्यो है हमरे धीर धरा ना जाय १५
सुनिकै बातें ये माता की बेटी कहन लागि त्यहि बार ॥
मोहिं बियाहनजन्तु कोउआयो हाथ म लिये ढाल तलवार १६
फिरि बैठायो मोहिं डोला पर अपने घरे लिये सो जाय ॥
ऐसा दीख्यों जब माता मैं तबहीं रोय उठिउँ चिल्लाय १७
इतना कहिकै बेला चलि भै खेलन लागि सखिन के साथ ॥
महलन आये पिरथी राजा रानी गहाजाय तब हाथ १८
स्वपन बतायो सब बेला को सो सुनि लीन पिथौराराय ॥
ब्याहन लायक अब कन्या है बोली बार बार समुझाय १६
रानी अगमा की बातें सुनि बोले पृथीराज महराज ॥
कहे अधीरज तुम होतीहौ रानी कहा न टारौं आज २०
इतना कहिकै पिरथी चलिभे औ दरबार पहुंचे आय ॥
ताहर बेटा को बुलवायो चौंड़ा बाम्हन लीन बुलाय २१
कलम दवाइति कागज लैके चिट्ठी लिखन लाग सरदार ॥
शिरी सरखऊ शिरिपत्री करि पाछे आपन राम जुहार २२
पहिलि लड़ाई है द्वारेपर मड़ये कठिन चली तलवार ॥
खान कलेवा लड़िका आई तबहूँ मूड़ कटावब यार २३
[Header] ३ आल्हखण्ड । २००
इतनी जुरैति ज्याहिके होवै टीका लेय हमारो सोय ॥
नहीं विधाता की मर्जी ना कन्या व्याह और विधिहोय २४
इतना लिखिकै पृथीराज ने नाई बारी लीन बुलाय ॥
साल दुसाला मोतिन माला चीरा कलँगी लीन मँगाय २५
तिरपन पलकी अस्सी गजरथ उम्दा घोड़ा सवाहजार ॥
धरिकै तोड़ा दो मुहरन का अच्छा थार सूवरण क्यार २६
तीनि लाखको टीका दैकै सबको हाल दीन समुझाय ॥
नगर मोहोवे कोउ जायो ना ओछी जाति बनाफरराय २७
चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि ताहर को ताहर चलिभे शीश नवाय ॥
नाई बारी चौंड़ा ताहर फाटक पार पहुंचे आय २८
ताहर बैठे दलगंजन पर चौंड़ा एकदन्त असवार ॥
कूच करायो फिरि दिल्ली ते दूनों चलत भये सरदार २६
आठ रोज को धावा करिकै सुन्नागढ़ै पहुंचे जाय ॥
लड़का खारो गजराजा को पाती तुरत दीन पकराय ३०
पढ़िकै चिट्ठी गजराजा ने टीका तुरत दीन लौटार ॥
तहँते पहुँचे फिरि वौरीगढ़ जहँपर रहैं यादवा यार ३१
तिनहुन टीका जब लीन्ह्यो ना नरवर फेरि पहुंचे जाय ॥
नरपति राजा नरवरवाला सोऊ टीका दीन फिराय ३२
गंगाधर बूँदी का राजा त्यहि दरबार गये फिरि धाय ॥
चिट्ठी पढ़िकै सोऊ ठाकुर टीका तुरत दीन लौटाय ३३
ताहर बोले फिरि चौंड़ाते दादा कही हमारी मान ॥
चार महीना घूमत द्वैगे अब हम भये बहुत हैरान ३४
जल्दी चलिये अब उरई को जहँपर बसै महिल परिहार ॥
यह मन भाय गई चौंड़ा के हाथी उपर भयो असवार ३५
ब्रह्माका विवाह । २०९ ५
चढ़ि दलगंजन की पीठि पर ताहर नाहर भयो तयार ॥
नाई बारी सँग में लीन्हे पहुँचे माहिल के दरबार ३६
आवत दीख्यो जब ताहर को माहिल बहुत गयो घबड़ाय ॥
माहिल बोले फिरि ताहर ते बेटा कुशल देउ बतलाय ३७
ताहर बोले फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥
टीका लाये हम बहिनी का घूमत बिते महीना चार ३८
कुँवर बनावो क्यहु क्षत्री का मोको पूत आपनो जान ॥
माहिल बोले तब ताहर ते मानो कही बीर चौहान ३६
अजयपाल कनउज का राजा राजन मध्य बीर सरदार ॥
ताको लड़का रतीभान भो जाकी जगजाहिर तलवार ४०
ताको लड़का लाखनि राना टीका तासु चढ़ावो जाय ॥
इतना सुनिकै ताहर चौंड़ा तुरतै कूचदीन करवाय ४१
जायकै पहुँचे फिरि कनउज में जहँपर भरी लाग दरबार ॥
की गति बरणै चन्देले कै आली खानदान सरदार ४२
ताहर दीख्यो जब जयचँद को तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि जल्दी सों लीन्ह्यो कनउजके सरदार ४३
पढ़िकै चिट्ठी राहुट द्वैगा नैना अग्निबरण भे लाल ॥
लै जाव चिट्ठी कहूँ अनतै को मेरो बड़ो पियारो बाल ४४
ताहर चौंड़ा दूनो जरिकै तुरतै कूच दीन करवाय ॥
पार उतरिकै श्रीयमुना के उरई निकट पहुंचे आय ४५
मलखे ठाकुर त्यहि समया में मारन आयो तहां शिकार ॥
ताहर चौंड़ा मलखे ठाकुर मारग भेंटिगये सरदार ४६
कुशल प्रश्न ताहर सों कहिकै बोला बचन बीर मलखान ॥
कौने मतलब को निकरेहौ नाहर दिल्लीके चौहान ४७
६ आल्हखण्ड । २०२
सुनिकै बातें ई मलखे की ताहर हाल गयो सबगाय ॥
मलखे बोले फिरि ताहर सों लड़का तुम्हें देयँ बतलाय ४८
संग हमारे कछु दूरी तुम औरो चलो बीरचौहान ॥
इतना सुनिकै दूनों चलिभे मोहोबे गये तीनहू ज्वान ४६
ताहर बोले तहँ मलखे ते यहुहै कौन शहर मलखान ॥
मलखे बोले तहँ ताहर सों यहहै नगर मोहोबा ज्वान ५०
यहँको राजा परिमालिक है ब्रह्मा लड़का तासु कुँवार ॥
तोरी बहिनी सों त्यहि ब्याहौं साँची बात मानु सरदार ५१
सुनिकै बातें ये मलखे की ताहर बहुत गयो शर्माय ॥
ऐसी बातें का तुम बोले ब्याह न करें बनाफरराय ५२
नहीं आज्ञा दिल्लीपति कै टीका नगर गोहोबे जाय ॥
सरबरि हमरी का नाहीं हैं ठाकुर काह गयो बौराय ५३
सुनिकै बातें ये ताहर की बोला बचन बीर मलखान ॥
धाँसि सिरोही मुँहमें देवों जोफिरि ऐस कहै चौहान ५४
इतनी सुनिकै ताहर ठाकुर पाती तुरत दीन पकराय ॥
मूड़ कटाई सो ब्याहे माँ नाहर जौन पिथौराराय ५५
ताका बाना जग मर्दाना मारै शब्द ताकिकै बान ॥
परै निशाना पूरशब्द पर ता सँग कौन लड़ैया ज्वान ५६
सुनिकै बातें ये ताहर की बोला तुरत बनाफरराय ॥
लड़ै मरैका कछु डर नाहीं यहही धर्म सनातन भाय ५७
रीछ बाँदरन सँग में लैके लङ्का विजय कीन भगवान ॥
ग्वालन बालन सँगमा लैके कंसै हना कृष्ण बलवान ५८
काह हकीकति है दिल्ली कै चलिकै बिल्ली देउँ बनाय ॥
पौर खशभिल्ली दिल्ली जाई किल्ली तुरतै देउँ नवाय ५९
ब्रह्माका बिवाह । २०३ ७
कैसो दिल्ली में गिल्ली सम पिल्ली पूत पिथौरा राय ॥
लिल्ली घोड़िन के चढ़वैया लड़िहैं कौन तहाँपर भाय ६०
चौंड़ा बोला तहँ मलखे ते चलिये जहाँ चंदेलोराय ॥
सुनिकै बातें ये चौंड़ा की तीनों अटे महल में जाय ६१
देखिकै सूरति मलखाने कै बोला मोहबे का सरदार ॥
हाल बतावो सब सिरसा को ओ बिरमा के राजकुमार ६२
हाथ जोरिकै मलखे बोले दादा मोहबे के महराज ॥
मनोकामना सब पूरण हैं तुम्हरीकृपा सुफल सबकाज ६३
टीका लाये ये दिल्ली सों मैं ब्रह्माका करों बिवाह ॥
यही कामना यक बाकी है साँची मानु कही नरनाह ६४
पाती दीन्ह्यो मलखाने ने बांचन लाग रजापरिमाल ॥
डसै भुवंगम लहरैं आवैं कहरन लाग तुरत नरपाल ६५
हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा मोहबे के महराज ॥
टेक न टारैं मलखे दादा तासों करे बनी यहु काज ६६
सुनिकै बातें ये ऊदन की बोले तुरत रजापरिमाल ॥
हाल बतावो सब मल्हनाको वाको बड़ो पियारो बाल ६७
मोहिं बुढ़ापा की लाठी है ब्रह्मा बड़ा पियारा मान ॥
नामी राजा दिल्लीवाला ठाकुर समरधनी चौहान ६८
टेक कठिनहै मलखाने कै पूरण यहौ हृदय विश्वाश ॥
जियब न देखें हम काहू कर सबकर होय वहाँपर नाश ६६
पढ़िकै चिट्ठी पृथीराज की हमरे गई करेजे हूक ॥
जानि बूझिकै जस मलखे की ऐसी करै कौन नर चूक ७०
सवैया ॥
सुनिकै नृपबैन तबै बलऐन बोले मलखे ललिते अनखाई ।
आल्हाखण्ड । २०४
कउनसो काज अकाज भयो महराज गयउ जहँ लाज गवाँई ॥
सुखको साज समाज करउ रघुराज सदा मम लाज बचाई ।
घबड़ानको आज न काज कछू हम ब्याहकरैं वछराजदुहाई ७१
सुनिकै बातैं मलखाने की राजा गयो सनाकाखाय ।
मलखे चलिभे फिरि महलनको मल्हना पास पहुंचे जाय ७२
चिट्ठी पढ़िकै पृथीराज की मलखे हाल दीन बतलाय ।
सुनिकै चिट्ठी पृथीराज की मल्हनागई तुरत कुँभिलाय ७३
तारा टूटे आसमान में थर थर धरा गई तब हाल ।
चील्हैं छाईं राजमहल में रोवन लागे श्वान श्रृगाल ७४
मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परैं दिखलाय ।
छारो ब्रह्मा घरमें रहिहै टीका आप देउ लौटाय ७५
सुनिकै बातें ये मल्हना की मलखे बोले वचन रिसाय ।
ब्याह विधाता यह रचिराखा टीका कौन सकै लौटाय ७६
सदा न फूलै कहुँ वन तोरई माई सदा न सावन होय ।
सदा जवानी नहिं स्थिरहै माई सदा न वर्षा होय ७७
टीका फेरो जो दिल्ली का माता होउ जगत बदनाम ।
जातिके ओछे मोहवे वाले यह है देश-देश सरनाम ७८
होय नतैती जो दिल्ली में पूरण होयँ हमारे काम ।
भुन्ना नैनागढ़ माड़ो में हमपर कृपाकीन सियराम ७९
ये सब अशकुन हैं ताहर को माता कहां ज्ञान गा त्वार ।
अबै कबूतरी ना बुड्ढी भै ना बल खाय गई तलवार ८०
बार जो बाँका जा ब्रह्मा का हमरो मूड़ लियो कटवाय ।
बातें सुनिकै ये मलखे की मल्हना दीन्ह्यो बाँह गहाय ८१
ब्रह्माका विवाह । २०५
जस मनभावै मलखाने के तैसी करो बनाफरराय ॥
बड़ी खुशीभै मलखाने के फूले अंग न सके समाय ८२
बड़ी प्रशंसाकी मल्हना की मलखे बार बार शिरनाय ॥
शाखा चलिहै महरानी तब ईजति हमरी लियो बचाय ८३
वारु न बांका इनका जैहै ओ महरानी बात बनाय ॥
जहाँ पसीना इनका गिरिहै तहँ मैं देहौं खून बहाय ८४
करो तयारी अब जल्दी सों ताहर टीका देय चढ़ाय ॥
बातें सुनिकै मलखानेकी मल्हना हुकुम दीन फर्माय ८५
बाँदी लीपन चौका लागी छींक्यो एक पुरुषने आय ॥
मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परै दिखराय ८६
टीका फेरो तुम दिल्ली का मानो कही बनाफरराय ॥
बातें सुनिकै ये मल्हना की बोला तुरत लहुरवाभाय ८७
टीका फिरिहै जो दिल्ली का होई देश हँसौंवा माय ॥
कीन तयारी जब माड़ो की तबहूं छींक भई थी आय ८८
तबहूं रोंक्यो महरानी तुम माड़ो फते कीन हम जाय ॥
शकुन हमारो फिरि वैसे भा शंका कौन गई मन आय ८६
सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना ठीक लीन ठहराय ॥
ऊदन मलखे द्वउ मनिहैं ना अब अनहोनी परै दिखाय ६०
बड़ा लड़ैया दिल्ली वाला है सब राजन में शिरताज ॥
तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धुहौ स्वामी रामचन्द्र महराज ६१
परो साँकरो अब हमपर है राखन हार तुम्ही रघुराज ॥
हम सुनिराखा है विप्रन सों राख्यो सदा भक्तकी लाज ६२
गौतम नारी को तुम तारा केवट लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥
मांस अहारी गृद्धै तारयो भीलिनिदर्श दिखायो जाय ६३
१० आल्हाखण्ड । २०६
सोई दशरथ के रघुरैया नैया तुही लगैया पार ॥
एक पूतकी मैं मैयाहौं ताकी कुशल किह्योकरतार ६४
सुमिरन करिकै रघुनन्दन को मल्हना करनलागि घरकाम ॥
मलखे ठाकुर त्यहिसमया में ताहर वेगि बुलावा धाम ६५
जितने वासी रहें मुहवे के आये सबै नारि नर द्वार ॥
सात सुहागिल त्यहि समयामें गावन लगीं मंगलाचार ६६
बड़ी भीर भै परिमालिक घर कहुँ तिलडरा भूमि ना जांय ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ आयो साइतिं तुरत दीन बतलाय ६७
नव पिचकारी भरिकेशरि रंग मारैं एक एक को धाय ॥
धूरि उड़ाई तहँ अबीर की महलन् गई लालरी छाय ६८
चौक पुराई गजमोतिन सों पीढ़ा तहाँ दीन धरवाय ॥
चौड़ा ताहर दउ ठाढ़े ये ब्रह्मा गये तहाँपर आय ६६
को गनि वरणै परिमालिक कै लोहा छुये सोन ह्वैजाय ॥
पारस पाथर ज्यहिके घरमाँ त्यहिकी द्रव्यसकैको गाय १००
ऊदन बोले तहँ ताहर सों अब तुम टीका देउ चढ़ाय ॥
साँगा गाड़ दइ तब ताहरने औयहबोल्यो भुजा उठाय १०१
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौ हम टीका देई चढ़ाय ॥
रीति हमारे यह घरकी है साँचे हाल दीन बतलाय १०२
सात तेवा लोहे के नीचे तापर साँग गाड़ि हम दीन ॥
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौहमब्याहबहिन काकीन१०३
देखि तमाशा बहु ताह रका मल्हना बोली वचन रिसाय ॥
अशकुनकीन्योम्परेमहलन्मां टीका तुरत देउ लौटाय १०४
बिना बियाहे ब्रह्मा रहि हैं तौ नहिं होय हमारी हान ॥
अक्लि तुम्हारी को लैलीन्ही मानौं नहीं कही मलखान १०५
ब्रह्माका बिवाह । २०७ ११
सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन बोले माथ नवाय ॥
टीका फेरागा दिल्ली का. तौमुँहकौन दिखावाजाय १०६
इतना कहिकै ऊदन ठाकुर तुरतै डारा सांग उखार ॥
ऊदन बोले फिरि ताहर सों नाहर दिल्ली के सरदार १०७
हम तो नौकर परिमालिक के तिन यह डारा सांग उखार ॥
ऐसे नौकर जिनके घरमाँ तिनसे कौन करै तलवार १०८
सुनिकै बातें ये ऊदन की ताहर मनै गयो शर्माय ॥
बीरा दीन्ह्यो ताहर ठाकुर ब्रह्मा बीरागये चबाय १०६
छींक तड़ाका मै सम्मुखमाँ मल्हना रोय उठी घबड़ाय ॥
ब्याह न करिहौं मैं ब्रह्मा का मानो कही बनाफरराय ११०
हमैं चाह है नहिं भौरिन कै ना कछु बहू केरि परवाह ॥
इकलौता यहु जीवै जग औ फिरि बनेरहै नरनाह १११
बहुतक अशकुन हम देखे हैं कैसे धरा जाय जिय धीर ॥
पुत्रघाव सों दशरथ मरिगे यासों और कौन जगपीर ११२
भला न देखें यहि ब्याहे में मानो कही वीर मलखान ॥
जो नहिं मानो मलखाने तुम हमरे जाय प्रानपर आन ११३
बातैं सुनिकै ये मल्हना की बोले फेरि बीर मलखान ॥
घरको आवो टीका फेरैं तौसब हँसिहैं देशजहान ११४
बिटिया आहिउ तुम ठाकुर की ठाकुर घरै बियाही माय ॥
नहिं क्यहु बनियाकी महतारी जो मन बारबार पछिताय ११५
हल्दी मिरचा हम बेचैं ना ना हम करैं वाणिज्य व्यापार ॥
हम तो लरिका हैं ठाकुर के औ दिनराति करैं तलवार ११६
धन्य सराहौं हम कुन्ती का आपन दीन्हे पुत्र पठाय ॥
युद्ध मचायो तिन कौरव ते औ यश रहा जगतमें छाय ११७
१२ आल्हखण्ड । २०८
बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥
मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८
जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥
जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९
इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥
चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२०
बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥
चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१
सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥
माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२
नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥
सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३
यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥
बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४
दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥
अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५
चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥
पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६
कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥
कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७
कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥
उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८
मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥
तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६
ब्रह्माका विवाह । २०६ १३
पटा बनेटी बाना कहूँ कहूँ कहूँकहूँ गदका को घमसान ॥
बाढ़ि घरावैं कहूँ कहूँ क्षत्री कहूँकहूँ हँनैं निशाना जवान १३०
देखि तमाशा चौंड़ा ताहर मनमें बड़े खुशी है जायें ॥
कूच कराये दउ मोहबे ते दिल्लीशहरगये नगच्याय १३१
ह्यौंसुधि पाई माहिल ठाकुर दिल्ली अटे अगाड़ी जाय ॥
माथनवायो जब माहिल ने खातिर कीन पिथौराराय १३२
सोने कि चौकी में बैठारयो राजा दिल्लीके महराज ॥
बोले पिरथी फिर माहिल ते तुम्हरोकौन करी हमकाज १३३
बोले माहिल फिर पिरथी ते मानो कही सत्य महराज ॥
ब्याहजो कीन्ह्यो तुम मोहबे में खोई सबै अपनी लाज १३४
जाति बनाफरकी ओछी है है सब जातिन केरि उतार ॥
इतना कहतै चौंड़ा ताहर दोऊ आयगये दरबार १३५
सूरति दीख्यो जब ताहर की गरई हाँक दीन ललकार ॥
हमजो वरजा तुमको ताहर ना तुम मानी कही हमार १३६
सुनिकै बातें ये राजा की ताहर हाथजोरि शिरनाय ॥
कही हकीकति सब मलखे की ताहर बारवार समुझाय १३७
माहिल बोले फिर राजा ते नाहर दिल्ली के सरदार ॥
टीका फेरो तुम जल्दी सों इतनी मानो कही हमार १३८
इतना सुनिकै चौंड़ा चलिभा ताहर बोले बचन उदार ॥
बड़े लड़ैया मोहबे वाले जिनके बाँट परी तलवार १३६
ब्याहन आवैं जब तुम्हरे घर तब तुम मूड़ लिह्यो कटवाय ॥
टीका फिरिहै अब दादा ना तुमते सत्यदीन बतलाय १४०
यह मन भाय गई माहिल के तुरतै कीन्ह्यो रामजुहार ॥
बिदा माँगिकै पृथीराज सों चलिभा उरई का सरदार १४१
२४
१४ आल्हखण्ड । २१०
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२
माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना-
रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥
सवैया ॥
भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना।
और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥
मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना।
गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १
सुमिरन ॥
दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥
नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १
बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥
ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २
को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥
माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३
तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥
गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४
शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥
त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५
ब्रह्माका विवाह । २११ १५
छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥
फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६
अथ कथाप्रसंग ॥
माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥
बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १
मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥
टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २
बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥
मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३
त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥
माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४
कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥
बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५
पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥
बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६
काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥
सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७
जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥
ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८
चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥
चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६
हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥
भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १०
बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥
१६ आल्हखण्ड । २१२
भलो आपनो जो तुम चाहौ इकलो ब्रह्मा देउ पठाय ११
हमहूं जैबे त्यहि संगैमाँ तुम्हरे काज सिद्ध हैजायँ ॥
सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना बोली मन हर्षाय १२
कहा तुम्हारो हम टारब ना भैया उरई के सरदार ॥
इकलो ब्रह्मा तुम लै जावो जामें होय नहीं तहँ मार १३
माहिल बोले फिरि मल्हनाते बहिनी मानो कही हमार ॥
चोरी चोरा काम निकालो नाकछु रीतिभांति की ब्यार १४
यह मन भायगई मल्हना के चुप्पे पलकी लीन मँगाय ॥
ब्रह्माठाकुर को बुलवायो औ पलकीमों दीन बिठाय १५
लैकै पलकी माहिल चलिभे ऊदन अटा तहाँ पर आय ॥
हाल जानिकै सब माहिल को चुप्पै धावन लीन बुलाय १६
लिखिकै चिट्ठी मलखाने को ऊदन तुरतै दीन पठाय ॥
चिट्ठी पढ़िकै मलखाने ने औ सुलखेको लीन बुलाय १७
कहि समुझायो सब सुलखेको सोऊ चला बेगिही धाय ॥
जायकै पकरयो सो माहिलको तुरतै कैद लीन करवाय १८
लैकै पलकी औ माहिल को सिरसागढ़ै पहुँचा आय ॥
बाँधि जँजीरन फिरि माहिलको फाटक पास दीन बैठाय १६
ऊदन चलिभे फिरि महलनको मल्हनै शीश झुकावा जाय ॥
हाथ जोरिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय २०
माहिल मामा की बातन में इकलो ब्रह्मा दियो पठाय ॥
कुशल न होइहै तहँ ब्रह्माकी साँची बात कहैं हम माय २१
इतना कहिकै ऊदन चलिभे दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥
कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय २२
चिट्ठी लिखिकै मलखाने ने औ परिमालै दीन जनाय ॥