आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ३ आल्हखण्ड । २००
इतनी जुरैति ज्याहिके होवै टीका लेय हमारो सोय ॥
नहीं विधाता की मर्जी ना कन्या व्याह और विधिहोय २४
इतना लिखिकै पृथीराज ने नाई बारी लीन बुलाय ॥
साल दुसाला मोतिन माला चीरा कलँगी लीन मँगाय २५
तिरपन पलकी अस्सी गजरथ उम्दा घोड़ा सवाहजार ॥
धरिकै तोड़ा दो मुहरन का अच्छा थार सूवरण क्यार २६
तीनि लाखको टीका दैकै सबको हाल दीन समुझाय ॥
नगर मोहोवे कोउ जायो ना ओछी जाति बनाफरराय २७
चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि ताहर को ताहर चलिभे शीश नवाय ॥
नाई बारी चौंड़ा ताहर फाटक पार पहुंचे आय २८
ताहर बैठे दलगंजन पर चौंड़ा एकदन्त असवार ॥
कूच करायो फिरि दिल्ली ते दूनों चलत भये सरदार २६
आठ रोज को धावा करिकै सुन्नागढ़ै पहुंचे जाय ॥
लड़का खारो गजराजा को पाती तुरत दीन पकराय ३०
पढ़िकै चिट्ठी गजराजा ने टीका तुरत दीन लौटार ॥
तहँते पहुँचे फिरि वौरीगढ़ जहँपर रहैं यादवा यार ३१
तिनहुन टीका जब लीन्ह्यो ना नरवर फेरि पहुंचे जाय ॥
नरपति राजा नरवरवाला सोऊ टीका दीन फिराय ३२
गंगाधर बूँदी का राजा त्यहि दरबार गये फिरि धाय ॥
चिट्ठी पढ़िकै सोऊ ठाकुर टीका तुरत दीन लौटाय ३३
ताहर बोले फिरि चौंड़ाते दादा कही हमारी मान ॥
चार महीना घूमत द्वैगे अब हम भये बहुत हैरान ३४
जल्दी चलिये अब उरई को जहँपर बसै महिल परिहार ॥
यह मन भाय गई चौंड़ा के हाथी उपर भयो असवार ३५