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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

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३ आल्हखण्ड । १९८
ब्याह बखानौं त्यहि ब्रह्माको ज्यहिका पिता राजा परिमाल ५

[Section Title]
अथ कथाप्रसंग ॥

पृथीराज दिल्ली को राजा ज्यहिका जानै सकल जहान ॥
कन्या उपजी जब त्यहिके घर तारा टूटि तैवै असमान १
थर थर थर थर पृथ्वी कांपी दर दर बोले श्वान श्रृगाल ॥
भन् भन् भन् भन् वायू डोलीं अशकुन बहुत भये त्यहिकाल २
अशकुन दीख्यो पृथीराज ने तुरतै पंडित लीन बुलाय ॥
लै कै पोथी ज्योतिष वाली पंडित हाल दीन बतलाय ३
गौना हैहै जब कन्या का हैहै तबै घोर घमसान ॥
बहुतक क्षत्री तब नशिजैहैं झुझिहैं बड़े बड़े ह्याँ ज्वान ४
ताते बेला यहि कन्या का राखो नाम आप महराज ॥
पाय दक्षिणा पंडित चलिभो होवन लागि और फिरिकाज ५
छठी बारहौं पसनी हैगै बेला परो तासु को नाम ॥
सात वरस की जब बेला भइ खेलत फिरै सखिन के धाम ६
कोउ कोउ सखियां तहँ ब्याहीर्थी बेंदी दिये आपने भाल ॥
क्वारी पूछैं तिन ब्याहिन ते सखि तुम कहौ श्वशुरपुर हाल ७
ब्याही बोलीं अनव्याहिन ते मानो सखी बचन तुम साँच ॥
जब सुधि आवत है बालम कै तब उर जरै विरहकी आँच ८
सुरपुर नरपुर अहिपुर माहीं सो सुख नहीं परै दिखराय ॥
जो सुख पावा हम श्वशुरे में बालम छाती लीन लगाय ६
कटिगहि मसरूँ हम नहिंटसरूँ कसकै हृदय किये सुधि आज ॥
का सुख जानो तुम अनुब्याहिउ बैरिनि भई हमारी लाज १०
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी सब अनब्यही गईं शर्माय ॥
बढ़ी लालसा तब ब्याहे की व्याला घरै पहुंची आय ११