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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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मलखानका विवाह । १६५ ३६


कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बर चन्दन धारी ॥
खायकै पाने औ धारिमैंनैनको हौर औ नूपुरैंकी झनकारी ।
सेंदुरै भाल बिशाललखे ललिते मनलज्जित मन्मथनारी १०४
ग्वरिग्वरिबहियाँ हरिहरिचुरियाँ सो मनिहारिनि दी पहिराय ॥
पहिरि मुँदरियाँ अठो अँगुरियाँ ऊपर छल्ला लये दबाय १०५
पहिरि आरसी ली अँगुठा में सीसा उपर तासु के भाय ॥
अगे अगेला पिछे पछेला बीचम छन्न रही दर्शाय १०६
टाड़ैं पहिरी सोने वाली जोसन पट्टी करैं बहार ॥
दुलरी तिलरी पंचलरीलों तापर परा मोतियन हार १०७
नथुनी लटकन की शोभाअति कानन करनफूल शृङ्गार ॥
गैरे गुज्भी ढउकानन में बँदियाँ मस्तक करै वहार १०८
बिछिया पहिरी पद अँगुरिन में अनवट सखी दीन पहिराय ॥
कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै तापर पायजेब लहराय १०६
लहँगा पहिरयो कीनखाब को चादर ओढ़िलीन फिरिभाय ॥
जैसे बादल बिजुली चमकै तसगजमोतिनिपरै दिखाय ११०
तहिले राजा फिरि आवत भे औ रानी सों कह्यो सुनाय ॥
बिदा कि बिरिया अब आई है जल्दी बेटी देउ पठाय १११
सुनिकै बातें ये राजा की रानी बेटी लीन बुलाय ॥
सीतामाता अनुसूया की सबियाँकथाकहीसमुझाय ११२
कहा न मानै जो पूरुष को नारी घोर नर्क को जाय ॥
चोर कुकर्मी जो पतिहोवै सेवा किहे नारि तरिजाय ११३
विनापराधे नारी त्यागै सो पति मरै भूखके घाय ॥
ऐसे कहिकै गजमोतिनि सों माता रोई हृदय लगाय ११४