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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

१८ आल्हखण्ड । ५१०
कही वीरता लखराना की ब्रह्मा बार बार तहँ गाय १८७
चन्दन बगिया डेरा परिगा पिरथी कूच दीन करवाय ॥
इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै दीन्ह्यो हुकुम लगाय १८८
सजो मोहोबा चौगिर्दा ते हाटक नये करौ तय्यार ॥
हुकुम पायकै महरानी का मोहबा सजन लाग त्यहिवार १८६
पुती दिवालैं गईं केसरि ते चम्चम् चमकिकरहि जाँयँ ॥
द्वार द्वार में बन्दन वारे घरघर रहे पताका छाय १६०
को गति बरणै पुरवासिन कै द्वारे कलश दीन धरवाय ॥
घृतसों पूरित दीपक वारे सुन्दरि गीत रहीं सब गाय १६१
सजीं बाजारें गलियारन मा माली बैठ ठट्ट के ठट्ट ॥
चलैं कदमपर कहूँ कहूँ घोड़ा कहूँ कहूँ चलैं चाल सरपट्ट १६२
ठट्ट लागि गे तम्बोलिन के जाहिर पान मोहोवे क्यार ॥
सतर सराफाकी बैठी है सोहैं भाँति भाँतिके हार १६३
कौन बजाजा कै गति बरणै भाला वरछिन केरि बजार ॥
गमला बिरखन के गलियनमा जिनमा कोटि वृक्षरुहदार १६४
फूले बेला अलबेला कहूँ मेला लाग चमेलिन क्यार ॥
रेला आवै कहूँ नारिन के गावैं गीत मंगलाचार १६५
बारह रानी चंदेले की तिनके महल सजे त्यहिवार ॥
घरे खिलौना हैं ताखन मा पाखनवेलि बूट अधिकार १६६
सोने चांदी के जेवर को रानी करता फिरैं झनकार ॥
को गति बरणै महरानिन कै सोलो कीन तहाँ श्रृंगार १६७
हाट बाट चौहाटा सजिगे बोले तबै रजा परिमाल ॥
चलिकै लइये जगनायक जी बेटा रतीभानको लाल १६८
इतना कहिकै परिमालिक जी पलकी ऊपर भये असवार ॥

[Header] नदीबेतवाकासमर । ५११ १६

अल्हा चढ़िकै हरनागर पर तुरतै भयो तहाँ तैयार १६६
मैने सजिगो परिमालिक का तब फिरि कूचदीन करवाय ॥
जहँ पर तम्बू लखराना का तहँपर गये चंदेलेराय २००
आवत दीख्यो परिमालिक को लाखनि उठे तड़ाका धाय ॥
पकरिकै बाहू लखराना की औछातीमा लीन लगाय २०१
बैठे तम्बू मा परिमालिक आये दुऊ बनाफरराय ॥
मिलाभेंट करि सब काहुन सों सबहिनकूच दीन करवाय २०२
चला कनौजी चढ़ि भूरी पर इन्दल पपिहा पर असवार ॥
घोड़ मनोहर पर देवा चढ़ि बेंदुल उदयसिंह सरदार २०३
हिरसिंह बिरसिंह बिरिया वाले येऊ साथ भये तय्यार ॥
सिंद्धा ठाकुर परहुल वाला गंगा कुड़हरिका सरदार २०४
मीरा सय्यद बनरस वाले औरौ नृपति चले त्यहिबार ॥
ठाढ़ो हाथी पञ्चशब्दा था आल्हा तापर भये सवार २०५
द्यावलि सुनवाँ फुलवा तीनों डोलन उपर भई असवार ॥
डोला चलिभा चितरेखा का मोहवालखनलागिसरदार २०६
जौनौ गलियन जायँ कनौजी तौनी देखें नई वहार ॥
चलैं पिचका क्यहुगलियन मा कहुँकहुँहोयँफुलनकीमार २०७
कहुँ कहुँ ढोलक सारंगी ध्वनि कहुँ कहुँ बाजैं खूब सितार ॥
तबलागमकैं क्यहुगलियनमा होवै नाच पतुरियनक्यार २०८
परे पाँवड़ैहैं द्वारे मा महलन मणी करें उजियार ॥
उड़ैं कबूतर क्यहु महलन ते होवै नाच मुरैलन क्यार २०६
पिंजरा टाँगे ललमुनियन के चकस गड़े बुलबुलन केर ॥
सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में कहुँ कहुँ तीतर और बटेर २१०
को गति बरणै त्यहि समयाकै चकित लखैं चहुँदिशि हेर ॥

२० आल्हखण्ड । ५१२
चारहु राजा गाँजर वाले बारह कुँवर बनौधाकेर २११
इन के सँगमा लाखनि राना मल्हना द्वार पहुँचे आय ॥
कीनि आरती चन्द्रावलि तहँ भीतरगये कनौजीराय २१२
संग पतोहुन को लै कै फिरि द्यावलिगर्ड तड़ाका धाय ॥
आल्हा ऊदन इन्दल तीनों येऊ फेरि पहुँचेजाय २१३
बड़ी कसमसि भै महलन मा बैठ सबै महा सुखपाय ॥
बारहु रानी परिमालिक की मल्हनामहल गईसबआय २१४
बड़ी खुशाली भै मल्हना के फूले अङ्ग न सकै समाय ॥
बेटी बोली चन्द्रावलि तब मानों साँच लहुरवाभाय २१५
जबते छाँड़्यो नगर मोहोबा जबते मरे बीर मलखान ॥
तबते ईजति ये ताके हैं लुच्चा दिल्ली के चौहान २१६
जोना अवतिउ ऊदन भैया पिरथी लूटि लेत करवाय ॥
धर्म रखैया सब मोहवे के युगयुगजियौबनाफरराय २१७
सुनिकै बातें चन्द्रावलि की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥
काहहकीकति थी पिरथी की मोहबाशहर लेत लुटवाय २१८
मिला भेंट करि सब काहुन सों सबहिन कूच दीन करवाय ॥
जहाँ कचहरी परिमालिक की आल्हा सहित पहुँचेआय २१९
खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने बैठे तहँ कनौजीराय ॥
राजा बोले तब आल्हा ते हमपरदया दीन बिसराय २२०
जबै बनाफर तुम मोहबेगे तबहीं चढ़ा पिथौराराय ॥
जूझिग ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय २२१
इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच बचन महराज ॥
सुनी तलाकें जब तुम्हरी हम मानो गिरी उपरते गाज २२२
माहिल भूपतिकी चुगुली सुनि हमरी देश निकासी कीन ॥

[Header]
नदीबेतवाकासमर । ५१३ २१

जूझिगे ठाकुर सिरसा वाले तबहूं खबरि आपनहिं लीन २२३
खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर देत फुकवाय ॥
चढ़िकै मारत हम पिरथी का साँची सुनो चँदेलेराय २२४
द्यावलि बिरमा सम माता ना ना जग भायसरिस मलखान ॥
ब्रह्मा ठाकुर के ब्याहे मा हाथी द्वार पछारा ज्वान २२५
पहिलि लड़ाई मै माड़ौगढ़ दूसर नैनागढ़ मैदान ॥
तिसरि लड़ाई मै पथरीगढ़ ब्याहे गये तहाँ मलखान २२६
चौथि लड़ाई मै दिल्ली मा पाँचो नरवर का मैदान ॥
इन्दल ब्याह हरण छठयें मा तहँपर भयो घोर घमसान २२७
सतौं लड़ाई मै बौरीगढ़ आठों बूँदी का मैदान ॥
नव दश बार लड़े रण नाहर तब मरिगये बीर मलखान २२८
भुजा टूटिगै इक आल्हा की हैंगा बली बीर चौहान ॥
स्वप्ना हैगे अब दुनिया मा हमका आजु बीरमलखान २२६
यहु दुख पावा तुम्हरी दिशि ते मानो साँच चँदेलेराय ॥
सवन चिरैया ना घर छोड़ै नानिजरा बणिजकोजाय २३०
मोहिं निकारा तब मोहबे ते तुम्हरो काह बिगारा भाय ॥
जेयत मोहोबे हम आइत ना जो ना चढ़त पिथौरा धाय २३१
पाल्यो पोष्यो लरिकाई ते ताते लाज दीन बिसराय ॥
दूध पियायो मल्हना रानी तब यह रुजिया लहु रखा भाय २३२
अस समुझायो मोहिं माता जब तब सब क्रोध दीन बिसराय ॥
सुनिकै बातें ये आल्हा कीं कायल भये चँदेलेराय २३३
तबै बनाफर उदयसिंह जीं बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥
सुखसों सोवो अब मोहबे मा करिहै काह पिथौराराय २३४
जो कछु हैगा पाछे परिगा अब आगे का करो विचार ॥

२२ आल्हखण्ड । ५१४
इतना सुनिकै परिमालिकजी लागे करन मंगलाचार २३५
सवैया ॥
मोद अपार बढ़यो त्यहि वार सो यार सँभार रह्यो कछु नाहीं।
पैरको भूषण हाथन धारि सो हाथको भूषण पैरन माहीं ॥
हाथ मिलावत धावत आवत गावत गीत डरे गलबारीं।
कौन सों मारग ऐसो तहाँ सो जहाँ ललिते सुखपावत नाहीं २३६
बड़ा मोदभा पुर महलन मा टहलन नेक न लागी वार ॥
आल्हा ऊदन लाखनि ठाकुर सबहिनखूबकीनज्यौंवनार २३७
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीनपरचाय २३८
परे आलसी खटिया तकितकि घों घों करउ रहे घर्ाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायण भाय २३६
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २४०
माथ नवावों पितु माता को देवी देव सरिस औतार ॥
सेवा करिकै पितु माताकी सरवन पूत भयो भवपार २४१
औरौ गाथा रघुनाथा की कहिगे बालमीकि बिस्तार ॥
पूरण ब्रह्म आदि पुरुषोत्तम स्वामी रामचन्द्र अवतार २४२
अब बदनामी का डर नाहीं होवो रामचन्द्र भत्तार ॥
शरण तुम्हारी हम ताके हैं दर्शन चहैं नाथ यहिवार २४३
पगड़ी हमरी अब अरुझी है सो सुरझाय-देव रघुनाथ ॥
कितनो पापी कलियुग करि है तबहूँ धरों चरण में माथ २४४
माता भ्राता त्राता ताता नाता एक ठीक रघुनाथ ॥

नदीबेतवाकासमर। ५१५ २३
स्वारथ साथी सब दुनिया है कासों करों जगतमें साथ २४५
सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २४६
इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र
वंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतनदीबे-
तवायुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः॥ १ ॥
नदीबेतवाकायुद्धसमाप्त ॥
इति ॥

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॥श्री गणेशाय नमः॥
अथ आल्हखण्ड ॥
ठाकुरउदयसिंहजीकाहरणवर्णन ॥
सवैया ॥
बज्रसे अंग ओ बानर हय अरु बीरन में बलवान महा ।
रणमण्डल कोउ न जाय सकै ज्यहि ठौर जबै यहु बीर रहा ॥
सप्त समुन्दर नाँघि अगाध दशकन्धर को पुर जाय दहा ।
आयहु फेरि जबै लखिते रघुनाथ ते साँच हवाल कहा १
सुमिरन ॥
तुम्हैं बहादुर मैं ध्यावत हौं अञ्जनि पूत वीर हनुमान ॥
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ नितप्रतिकरौं चरणकोध्यान १
सरबरि तुम्हरी का दुनिया मा दूसर कौन बहादुर ज्वान ॥
शरण तुम्हारी मा आयन है साँचे वीर बली हनुमान २
गदा प्रहारी हे असुरारी मारी दुष्ट लङ्किनी नारि ॥
पर्शंत पाँयन मकरी तरिगै लायो पर्वत श्रृंग उखारि ३
बड़े पियारे रघुनन्दन के वन्दन करौं जोरि दोउ हाथ ॥
अक्षत चन्दन धूप दीप सों पूजन करौं मानसी नाथ ४

२ आल्हखण्ड । ५१८
करो मनोरथ पूरण हमरे सबविधि माननीय हनुमान ॥
छूटि सुमिरनी गै हनुमत कै ऊदन हरण सुनो अब ज्वान ५
अथ कथाप्रसंग ॥
'एक समैया की बातें हैं परिगै पर्व दशहरा आय ॥
सुनवाँ बोली तब ऊदन ते साँची सुनो बनाफरराय १
मोरि लालसा यह डोलति है मज्जन करों बिठूरै जाय ॥
आयसु लैके तुम दादा की देवर मोहिं देउ हनवाय २
यह मन भायगई ऊदन के आल्हा महल पहुँचे जाय ॥
हाथ जोरि अरु बिनती करिकै बोला तहाँ लहुरवाभाय ३
सुनवाँ भौजी की इच्छा है हमको गंग देउ हनवाय ॥
आयसु पावैं जो दादा की तौ हम जायँ बिठूरै धाय ४
इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच लहुरवा भाय ॥
देश देश.के राजा अइहैं करिहौं कलह तहाँपर जाय ५
त्यहिते बैठो घर अपने मा ऊदन साँच दीन बतलाय ॥
पर्व दशहरा की फिरि अइहै औरे साल हनायो जाय ६
इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा सुनो बनाफरराय ॥
पगिया हमरी कछु अरुझीना जो तहँ रारि मचैवे जाय ७
बाचा हारे हम भौजी ते तुमको गंग देब हनवाय ॥
मोहिं भरोसा है दादा को करिहौ पूर मनोरथ भाय ८
बातें सुनिकै बघऊदन की दीन्ह्यो हुकुम बनाफरराय ॥
'हुकुम पायकै ऊदन ठाकुर लीन्हीं तुरत फौज सजवाय ६
सजी पालकी तहँ ठाढ़ी थीं सुनवाँ फुलवा भई सवार ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया औ जगनायक भयो तयार १०
सवालाख दल ऊदन लैके तुरतै कूच दीन करवाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५१६ ३
बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११
आठ रोजकी मैजलि करिकै पहुँचा तहाँ बनांफरराय ॥
तम्बू गड़िगा तहँ ऊदन का भारी ध्वजा रहा फहराय १२
सुभिया बेड़िनि झुन्रागढ़ ते पहुँची सबऊ बिठूरै जाय ॥
करै तमाशा सो तम्बुन में पावै द्रव्य तहाँ अधिकाय १३
जहँपर तम्बू था ऊदन का - सुभिया तहाँ पहुँची आय ॥
रूप देखिकै बघऊदन का दीन्ह्यो नाच रंग बिसराय १४
कछु नहिं भावै सुभिया मनमा ठगिनी भई तहाँपर आय ॥
औरी नटिनी सँग जे आईं तिनका नाच दीनकरवाय १५
अपना बैठे तहँ सोचति है कैसे मिलैं बनाफरराय ॥
जादू डारौं जो ऊदन पर तबहुँन काजसिद्धदिखलाय १६
जाहिर जादू मा सुनवाँ है हमरे जाय प्राण पर आय ॥
मनमा सोचै मनै बिसूरै मनमा बार बार पछिताय १७
डारि मोहनी दी लश्कर मा जेवर डिब्बा लीन उठाय ॥
दीन रुपैया ऊदन ठाकुर नटिनिन कूचदीन करवाय १८
चढ़ीं पालकी सुनवाँ फुलवा गंगा उपर पहुँचीं जाय ॥
मज्जन कीन्ह्यो उदयसिंह तहँ विप्रनदानदीन अधिकाय १९
मज्जन कीन्ह्यो जगनायक जी प्रातःकृत्य कीन हर्षाय ॥
दान मान दै सब विप्रन को सबहिन कूचदीनकरवाय २०
लखा तमाशा औ मेला खुब तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
उखरि ग तम्बू फिरि ऊदन का लश्कर कूच दीन करवाय २१
बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गे छाय ॥
अस्त दिवाकर जब पश्चिम भे तम्बूदीन तहाँ गड़वाय २२
उत्तम नदिया हैं यमुनाजी उतरे जहाँ बनाफरराय ॥

१ आल्हखण्ड । ५२०
डिब्बा दीख्यो नहिं जेवर को सुनवाँ गई सनाकाखाय २३
तुरत बनाँफर उदयसिंह को अपने पास लीन बुलवाय ॥
कहि समुझावा तहँ ऊदन ते डिब्बा नहीं परै दिखलाय २४
एक लाख का सब गहना है कैसी करैं बनाफरराय ॥
डिब्बा भूलाहै बिठूर मा मोको याद भयो यहँ आय २५
काह बतावों मैं देवर ते करिये कैसो कौन उपाय ॥
धीरज राखो अपने मनमा बोले वचन ल्हुरवाभाय २६
तुरत बुलायो जगनायक को औ सब हाल कह्यो समुझाय ॥
हम तो जावत हैं बिठूर को तुम अब कूचजाउ करवाय २७
यह मन भायगई जगना के ऊदन गये बिठूरै आय ॥
कैयो दिनका धावा करिकै जगना अटा मोहोबे जाय २८
रहा न मेला कछु लौटेमा सिरकी पाल परे दिखराय ॥
तिनमा नटिनी औ नट ठहरे गे तिन पास बनाफरराय २६
सुभिया दीख्यो जब ऊदन का भै मन खुशी तबै अधिकाय ॥
कहाँते आयो औ कहँ जैहौ ठाकुर हाल देउ बतलाय ३०
सुनिकै बातें ये सुभिया की बोले फेरि बनाफरराय ॥
नगर मोहोबा के हम ठाकुर आयन आजु बिठूर नहाय ३१
जब तुम नाचन गइ तम्बूमा गहनो गयो हमार हिराय ॥
पतालगावन त्यहि आयन है तुमते साँच दीन बतलाय ३२
इतना सुनिकै सुभिया बोली मानो साँच बनाफरराय ॥
पँसासारी हमते खेलो हम फिरि पतादेवलगवाय ३३
खेल पसारा सुभिया बेड़िनि बैठे तहाँ ल्हुरवाभाय ॥
जुआँ युद्धसों साँचे क्षत्री कबहूँ न धरैं पछारी पाँय ३४
नल औ पुष्कल आगे खेल्यो झेल्योदुःख नृपति अधिकाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२१ ५
भारी गाथा नलराजा की देखो महाभारत में जाय ३५
द्वापर शकुनी के सँग खेल्यो कुन्ती पुत्र युधिष्ठिरराय ॥
हारि द्रौपदी महाराजा गे खैंचा चीर दुशासन आय ३६
मानिकै शासन दुर्योधन का पहुँचे बनोवास फिरिजाय ॥
काटिकै संकट महाराज सब कीन्हेनि महाभारत फिरि आय ३७
यहु दुखदाई पंसासारी खेलन लागि बनाफरराय ॥
जादू डारी सुभिया बेड़िनि भे तब सुवा लहुरवा भाय ३८
डारिकै पिंजरा मा ऊदन का सुभिया कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुँची फिरि दिल्ली मा जहँ पर बसैं पिथौरा राय ३६
जहाँ कचहरी दिल्लीपतिकी सुभिया गई यतन सों धाय ॥
करी बन्दगी महाराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४०
सुभिया बोली फिरि पिरथी ते राजन साँच देयँ बतलाय ॥
डारिकै जादू हम ऊदन पर औ मेला ते लई चुराय ४१
पै डर हमरे है आल्हा का स्वामी जगा देउ बतलाय ॥
डारिकै सिरकी हम दिल्ली मा निर्भय बसी पिथौरा राय ४२
इतना सुनिकै पिरथी बोले सुभिया कूच देउ करवाय ॥
जो सुनिपै हैं आल्हा ठाकुर हम ते रारि मचै हैं आय ४३
इतना सुनिकै सुभिया चलिभै डेरन फेरि पहुँची आय ॥
कूच करावा फिरि दिल्ली ते सब दरबार भँझावा जाय ४४
कहूँ ठिकाना जब लाग्योना सुन्नागढ़ै गयी तब धाय ॥
जहाँ कचहरी गजराजा की सुभिया तहाँ पहुँची जाय ४५
हाथ जोरिकै महाराजा के आपन हाल दीन बतलाय ॥
जगा चाहती हम सुन्नागढ़ यह इककाज हमारो आय ४६
इतना सुनिकै राजा बोले सुभिया कूच जाउ करवाय ॥

६ , आल्हखण्ड । ५२२
जो सुनि पै हैं आल्हा ठाकुर हमते रारि मचै हैं आय ४७
सुनिकै बातें गजराजा की सुभिया कूच दीन करवाय ॥
झारखण्ड के फिरि जंगल मा डेराजाय दीन गड़वाय ४८
चौकी पहरा करि जादू के निर्भय बसी तहाँ सुखपाय ॥
सुनवाँ सोचै ह्याँ महलन मा आये नहीं लहुरा भाय ४६
पता लगावों मैं ऊदन का जावों देश देश को धाय ॥
यहै सोचिकै रानी सुनवाँ चिल्हियाबनीसरगमड़राय ५०
पहिले ढूँढ़ा त्यहि बिठूर का पाछे गयी कामरू धाय ॥
सिलहट बिजहट मौरँग भुन्ता दिल्लीशहरलखा फिरिजाय ५१
पता न पायो जब ऊदन का पहुँची झारखण्ड में आय ॥
तहाँ पै डेराहैंड बेड़िनि के सुनवाँ बैठि बरगदे जाय ५२
पेड़ बरगदा के नीचे मा सुभिया पलँग लीन बिछवाय ॥
लैकै पिंजरा फिरि सुवना का मानुष तुरतै दीन बनाय ५३
खेलै चौपरि सँग ऊदन के सुभिया बोली बचन सुनाय ॥
व्याह हमारे सँगमा करिये मानो कही बनाफरराय ५४
भजिये अल्ला बिसमिल्ला को ऊदन रटो खुदाय खुदाय ॥
तब सुख पैहौ तुम देहीं का नाहीं खाल लेउँ खिचवाय ५५
खुदा खैरियत तुम्हरी करि हैं बिसमिल भलाकरी सबकाल ॥
बाबा आदम संकट टारी मेटी अली भली जंजाल ५६
बातें सुनिकै ये बेड़िनि की बोला देशराज का लाल ॥
खुदा खुदाई चहु दिखलावैं बिसमिलआयजायँततकाल५७
ऊदन व्याहैं नहिं बेड़िनि को कबहूँ राम नाम बिसराय ॥
देश आरिया के क्षत्री हम कैसे मुसलमान ह्वैजायँ ५८
जब छुइजावैं मुसलमान को तबहीं तुरत करें अस्नान ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२३ ७
बेवश हैकै पिंजरा आयन ताते छूटिगयो सब मान ५६
पढ़ै फारसी हम बिद्या ना अपनौ धर्म करैं प्रतिपाल ॥
नित प्रति ध्यावैं रघुनन्दन को पूरणब्रह्म सुरासुर पाल ६०
खाल न रहै जो देहीमा केवल प्राण करैं विश्राम ॥
तबहूँ मुख सों ऊदन ठाकुर कवहूँ न लेयँ खुदाको नाम ६१
निर्भय बातें सुनि ऊदन की बरगद डार दीन टँगवाय ॥
बहुतक बाँसन हनि हनि मारा ऊदन जपो खुदाय खुदाय ६२
सुनिकै बातें ये सुमिया की बोला फेरि बनाफरराय ॥
ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६३
बात न दूसरि हम अब कहिबे चहु तन धजीधजीउड़िजाय ॥
ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६४
सुनिकै बातें उदयसिंह की तुरतै सुवना लीन बनाय ॥
डारिकै पिंजरामा ऊदन का टाँगा फेरि बरगदा आय ६५
देखि दुर्दशा यह ऊदन की सुनवाँ बार बार पछिताय ॥
डारि मशान दियो सुनवाँ ने पाछे पिंजरा लीन उठाय ६६
लैकै पिंजरा कछु दूरी मा सुनवाँ गई तड़ाका धाय ॥
सुवना लैकै फिरि पिंजरा ते मानुष तुरतै दीन बनाय ६७
सुनवाँ बोली फिरि ऊदन ते क्यों नहिं देवर जपो खुदाय ॥
काहे बिज्में तुम बेड़िनि में नित प्रति सहौ बाँसके घाय ६८
चलिये देवर अब मोहबे को तुम्हरी बार बार बलिजायँ ॥
सुनिकै बातें ये सुनवाँ की बोले फेरि बनाफर राय ६९
चोरी चोरा ना हम जैहैं तुमते साँच देयँ बतलाय ॥
लैकै फौजैं दादा आवैं हमरी कैद लेयँ छुड़वाय ७०
ऐसे ऊदन अब जैहैं ना नित प्रति सहैं बाँसके घाय ॥

८ आल्हखण्ड । ५२४
सुवा बनावो अब मानुष ते टाँगो फेरि बरगदा जाय ७१
इतना सुनिकै रानी सुनवाँ टाँगा फेरि बरगदा आय ॥
चील्ह रूप ह्वै उड़ि तहँनाते पहुँची फेरि मोहोबे जाय ७२
मानुष ह्वैकै फिरि महलनमा इन्दल पूत लीन बुलवाय ॥
कहि समुझावा सब इन्दल ते बप्पै खबरि जनावो जाय ७३
सुनिकै बातें ये माता की इन्दल पूत चला शिरनाय ॥
जहाँ कचहरी है आल्हा कै इन्दल पूत पहुँचा आय ७४
बड़े प्यार सों आल्हाठाकुर अपने पास लीन बैठाय ॥
फिरि शिर सूंघ्यो आल्हाठाकुर बोल्यो मधुरवचनमुसुकाय ७५
काह लालसा है बचुवा कै सो अब बेगि देउ बतलाय ॥
इतना सुनिकै इन्दलठाकुर कहिगा यथातथ्य सब गाय ७६
सुनिकै आल्हा बोलन लागे है यहु दुष्ट लहुरवा भाय ॥
करकति छाती दुख सुनिकै अब त्यहिते कैद छुड़ावब जाय ७७
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ॥
सजिगालश्करफिरिआल्हाका तुरतै कूच दीन करवाय ७८
बनिकै चिल्हिया सुनवाँ रानी आधे सरग रही मड़राय ॥
जाय बरगदा के फिरि पहुँची चुप्पे बैठि डारपै जाय ७६
डारि मशान दयो सुभियादल तुरतै पिंजरा लीन उठाय ॥
कछु दूरिचलि झारखण्ड ते फूँका मन्त्र तहाँपर जाय ८०
मानुष ह्वैकै फिरि बघऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय ॥
तब समुझावा रानी सुनवाँ लश्करगयो तुम्हारो आय ८१
चील्हरूप ह्वै रानी सुनवाँ बैठी एकडार पै जाय ॥
तहँने चलिकै ऊदन ठाकुर आगे मिले फौजमें आय ८२
लादू चौंरी सुभिया वाली सबियाँ हाल कहा समुझाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२५ ६
इतना सुनिकै सुभिया बेड़िनि तुरतै उठी तड़ाका धाय ८३
सहुवा बीरन को बुलवावा औ सब हाल दीन बतलाय ॥
करो तयारी समरभूमि की आये लड़न बनाफरराय ८४
खबरि फैलिगै यह बेड़ियन-मा हैंगे डेढ़ सहस तय्यार ॥
झीलम बखतर सबहिन पहिरा सबहिन बाँधिलीन हथियार ८५
कोउकोउबेड़ियाचढ़िहाथिनमा कोउ कोउ घोड़भये असवार ॥
बहुतक बेड़िया हैं पैदल मा लीन्हे हाथ ढाल तलवार ८६
गड़िगा तम्बू ह्वाँ आल्हा का भारी ध्वजा रहा फहराय ॥
बाजै डंका अहर्तंका का हाहाकार शब्दका छाय ८७
देवा ऊदन इन्द्दल ठाकुर तीनों भये बेगि तय्यार ॥
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ८८
दुहुँ दल तुरतै इकठौरी भे लागी चलन तहाँ तलवार ॥
कहुँ कहुँ भाला कहुँ कहुँ बरछी कहुँ कहुँ मारैं ज्वान् कटार ८६
कटि भुजदण्डै गिरैं खेत में उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ६०
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ॥
ना मुहँ फेरैं मोहबे वाले नादल बेड़ियनकात्यहिबार ६१
बड़े लड़ैया ई बेड़िया हैं इनते हारिगयी तलवार ॥
को गति वरणै तहँ इन्द्दल कै सबदिशिकरै भड़ाभड़मार ६२
सुनवाँ सुभिया कै वरणी में जादुन दऊ बड़ी हुशियार ॥
आगी पानी अरु आँधी की पुरियन होय तहाँपर मार ६३
चलै सिरोही रणमण्डल मा क्षत्री गरु करैं ललकार ॥
कहुँ ज्वालपकनि बिजली चमकनि तड़पै चहूँदिशा तलवार ६४
क्षत्री गाजैं डंका बाजैं बाजैं तहाँ शूर सरदार ॥

१० | आल्हाखण्ड | ५२६
को गति बरणै तहँ बेड़ियन कै उनतो भली मचाई रार ६५
इनहुन दुर्गति तिनकी कीन्ही कायर छोड़ि भागि मैदान ॥
कटि कटि कल्ला गिरैं बलेड़ा घैहा होयँ अनेकन ज्वान ६६
पाँचसै बेड़िया घायल हैगे सब दल रहिगा एकहजार ॥
तीनसै क्षत्रिय मोहबेवाले जूझे समर तहाँ त्यहिवार ६७
रानी सुनवाँ सुमिया बेड़िनि जादुन करैं तहाँपर रार ॥
कोऊ काहूते कमती ना दोऊ जादुन में हुशियार ६८
बीरमहम्मद की पुरिया को सुमिया छाँड़ि दीन त्यहिवार ॥
नारसिंह की जादू लैके सुनवाँ तजा तुरतललकार ९९
चिल्हिया हैकै सुनवाँ सुमिया दूनन खूब कीन मैदान ॥
लड़ते लड़ते दूनों चिल्हिया पहुँचींजायतुरतअसमान १००
लड़ते लड़ते द्वउ ऊपर ते नीचे गिरीं तड़ाका आय ॥
बड़ी लड़ाई भै पंजन ते अद्भुत समर कहानाजाय १०१
जहाँ लड़ाई द्वउ चिल्हियनकी इन्दल तहाँ पहुँचा आय ॥
सुनवाँ बोली तहँ इन्दल ते बेटा मूड़ देउ बगदाय १०२
इन्दल बोले तब सुनवाँ ते कैसे देवैं मूड़ गिराय ॥
जो हम मारैं यहि तिरिया को तौ रजपूती धर्मनशाय १०३
हाथ मेहरियन पर छाँड़ैं ना कबहूँ बीर समर में माय ॥
कैसे मारैं हम तिरिया को माता सोचो और उपाय १०४
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटा जूरा लेउ उड़ाय ॥
वातैं सुनिकै ये सुनवाँ की जूरा काटि लीन त्यहिठायाँ १०५
जीवन दान दीन सुमियाको सोऊ भागि तड़ाकाधाय ॥
जादू झूठी भई सुमिया की तबसोलागितहाँपछिताय १०६
ऊदन देबाकी मारुन मा बेड़िया भागे खेत बराय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२७ ११
जो कोउ भागतहै सम्मुख ते त्यहिना हनैं बनाफरराय १०७
मारे मारे तलवारिन ते बिड़िया चिरियाकरें निदान ॥
खेत छूटिगा सब बिड़ियन ते जीता उदयसिंह मैदान १०८
बाजे डंका अहंतंका के हैगा घोर शोर घमसान ॥
जितने क्षत्री मोहबेवाले डेरन आयगये ते ज्वान १०६
चील्ह रूप है सुनवाँ रानी महलन आयगयी तत्काल ॥
कूच करायो फिरि लश्कर को बेटा देशराज के लाल ११०
आल्हा ठाकुर पचशब्दा पर इन्द्ल पपिहापर असवार ॥
घोड़ बेंदुला पर ऊदन हैं कम्मरपरी नाँगि तलवार १११
यहु अलबेला भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥
घोड़ मनोहर पर सोहतहै रणमा बड़ालड़ैयाज्वान ११२
कैयो दिनकी मैजलि करिकै झुन्नागढ़ै पहुँचे आय ॥
गड़िगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी ध्वजारहा फहराय ११३
ढोल नगारा तुरही बाजीं हाहाकार शब्दगा छाय ॥
गा हरिकारा तब झुन्नागढ़ राजै खबरिजिनावा जाय ११४
आल्हा ऊदन मोहबे वाले धूरे परे हमारे आय ॥
आवैं फौजें झारखण्ड ते अबतो नगर मोहोबे जायँ ११५
सुनिकै बातें हरिकारा की पलकी तुरत लीन मँगवाय ॥
इशरत मुहरें इक हीरा लै पलकी चढ़ा तड़ाकाधाय ११६
जहाँ बनाफर आल्हा ठाकुर राजा तहाँ पहुँचा आय ॥
आदर करिकै आल्हा ठाकुर अपने पास लीन बैठाय ११७
द्वरि अशर्फी दी सम्मुखमा हीरा हाथ दीन पकराय ॥
सखियाँ गाया तब ऊदन की आल्हा यथातथ्यगे गाय ११८
बड़े प्रेम सों दोऊ ठाकुर बोलैं प्रीति रीति के भाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ५२८
बिदा मांगिकै फिरि आल्हासों राजा चढ़ा पालकी जाय ११६
गा महराजा मुन्नागढ़ मा तम्बुन स्वये बनाफरराय ॥
राति बसेरा करि मुन्नागढ़ भुरहीं कूच दीन करवाय १२०
कैयो दिनकी मैजलि करिकै मोहबे गये बनाफरराय ॥
सौसौ तोपैं दर्गी सलामी जबघरगयेउदयसिंहराय १२१
को गति वरणै त्यहि समयाकै हमरे बून कही ना जाय ॥
ऊदनहरण पूर अब ह्रैगा ध्यावैं तुम्हें शारदा माय १२२
कण्ठ में बैठो तुम महरानी भूले अक्षर देउ बताय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १२३
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२४
माथ नवावों पितु माता को जिनबल पूर कीन यह गाथ ॥
नहीं भरोसा निज भुजबल का स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ १२५
पूर तरंग यहाँ सों ह्रैगा सुमिरों तुम्हें भवानीकन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १२६
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबावूप्रागना-
रायणजीकीआज्ञानुसारउनामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृतऊदनहरण
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
उदयसिंहकाहरणसमाप्त ॥
इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥
बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्धवर्णन ॥
सवैया ॥
ब्याकुल गंध्रब नागसबै नरदेव अदेव लहे दुखभारा।
गोतनु धारि गयी पिरथी अरथी सँग देवन लै त्यहिबारा ॥
वाणि भई तबहीं नभते ललिते अवधेशके होब कुमारा ।
ध्यावत ब्रह्म सुरासुर जाहि स्वई प्रभु राम लियो अवतारा १
सुमिरन ॥
दोउ पद बन्दौं रामचन्द्र के जिनबल चलाजाउँ भवपार ॥
राम न होते जो दुनियामा बेड़ा कौन लगावत पार १
कौन समुन्दर को मथिडारत चौदारतन लेत निकराय ॥
कोथों मारत दशकन्धर को धारत कौन धर्मपथ आय २
कोथों तारत इनपापिन को जिनकीदशाकही ना जाय ॥
मारा मारा कहि तरिगे जो पापी बालमीकि असभाय ३
गीधअजामिलगतिगणिकाकी सबकोविदितभलीविधिआय ॥
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