आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ५१८
करो मनोरथ पूरण हमरे सबविधि माननीय हनुमान ॥
छूटि सुमिरनी गै हनुमत कै ऊदन हरण सुनो अब ज्वान ५
अथ कथाप्रसंग ॥
'एक समैया की बातें हैं परिगै पर्व दशहरा आय ॥
सुनवाँ बोली तब ऊदन ते साँची सुनो बनाफरराय १
मोरि लालसा यह डोलति है मज्जन करों बिठूरै जाय ॥
आयसु लैके तुम दादा की देवर मोहिं देउ हनवाय २
यह मन भायगई ऊदन के आल्हा महल पहुँचे जाय ॥
हाथ जोरि अरु बिनती करिकै बोला तहाँ लहुरवाभाय ३
सुनवाँ भौजी की इच्छा है हमको गंग देउ हनवाय ॥
आयसु पावैं जो दादा की तौ हम जायँ बिठूरै धाय ४
इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच लहुरवा भाय ॥
देश देश.के राजा अइहैं करिहौं कलह तहाँपर जाय ५
त्यहिते बैठो घर अपने मा ऊदन साँच दीन बतलाय ॥
पर्व दशहरा की फिरि अइहै औरे साल हनायो जाय ६
इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा सुनो बनाफरराय ॥
पगिया हमरी कछु अरुझीना जो तहँ रारि मचैवे जाय ७
बाचा हारे हम भौजी ते तुमको गंग देब हनवाय ॥
मोहिं भरोसा है दादा को करिहौ पूर मनोरथ भाय ८
बातें सुनिकै बघऊदन की दीन्ह्यो हुकुम बनाफरराय ॥
'हुकुम पायकै ऊदन ठाकुर लीन्हीं तुरत फौज सजवाय ६
सजी पालकी तहँ ठाढ़ी थीं सुनवाँ फुलवा भई सवार ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया औ जगनायक भयो तयार १०
सवालाख दल ऊदन लैके तुरतै कूच दीन करवाय ॥