आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयसिंहकाहरण । ५२१ ५
भारी गाथा नलराजा की देखो महाभारत में जाय ३५
द्वापर शकुनी के सँग खेल्यो कुन्ती पुत्र युधिष्ठिरराय ॥
हारि द्रौपदी महाराजा गे खैंचा चीर दुशासन आय ३६
मानिकै शासन दुर्योधन का पहुँचे बनोवास फिरिजाय ॥
काटिकै संकट महाराज सब कीन्हेनि महाभारत फिरि आय ३७
यहु दुखदाई पंसासारी खेलन लागि बनाफरराय ॥
जादू डारी सुभिया बेड़िनि भे तब सुवा लहुरवा भाय ३८
डारिकै पिंजरा मा ऊदन का सुभिया कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुँची फिरि दिल्ली मा जहँ पर बसैं पिथौरा राय ३६
जहाँ कचहरी दिल्लीपतिकी सुभिया गई यतन सों धाय ॥
करी बन्दगी महाराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४०
सुभिया बोली फिरि पिरथी ते राजन साँच देयँ बतलाय ॥
डारिकै जादू हम ऊदन पर औ मेला ते लई चुराय ४१
पै डर हमरे है आल्हा का स्वामी जगा देउ बतलाय ॥
डारिकै सिरकी हम दिल्ली मा निर्भय बसी पिथौरा राय ४२
इतना सुनिकै पिरथी बोले सुभिया कूच देउ करवाय ॥
जो सुनिपै हैं आल्हा ठाकुर हम ते रारि मचै हैं आय ४३
इतना सुनिकै सुभिया चलिभै डेरन फेरि पहुँची आय ॥
कूच करावा फिरि दिल्ली ते सब दरबार भँझावा जाय ४४
कहूँ ठिकाना जब लाग्योना सुन्नागढ़ै गयी तब धाय ॥
जहाँ कचहरी गजराजा की सुभिया तहाँ पहुँची जाय ४५
हाथ जोरिकै महाराजा के आपन हाल दीन बतलाय ॥
जगा चाहती हम सुन्नागढ़ यह इककाज हमारो आय ४६
इतना सुनिकै राजा बोले सुभिया कूच जाउ करवाय ॥