आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हखण्ड । ५१२
चारहु राजा गाँजर वाले बारह कुँवर बनौधाकेर २११
इन के सँगमा लाखनि राना मल्हना द्वार पहुँचे आय ॥
कीनि आरती चन्द्रावलि तहँ भीतरगये कनौजीराय २१२
संग पतोहुन को लै कै फिरि द्यावलिगर्ड तड़ाका धाय ॥
आल्हा ऊदन इन्दल तीनों येऊ फेरि पहुँचेजाय २१३
बड़ी कसमसि भै महलन मा बैठ सबै महा सुखपाय ॥
बारहु रानी परिमालिक की मल्हनामहल गईसबआय २१४
बड़ी खुशाली भै मल्हना के फूले अङ्ग न सकै समाय ॥
बेटी बोली चन्द्रावलि तब मानों साँच लहुरवाभाय २१५
जबते छाँड़्यो नगर मोहोबा जबते मरे बीर मलखान ॥
तबते ईजति ये ताके हैं लुच्चा दिल्ली के चौहान २१६
जोना अवतिउ ऊदन भैया पिरथी लूटि लेत करवाय ॥
धर्म रखैया सब मोहवे के युगयुगजियौबनाफरराय २१७
सुनिकै बातें चन्द्रावलि की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥
काहहकीकति थी पिरथी की मोहबाशहर लेत लुटवाय २१८
मिला भेंट करि सब काहुन सों सबहिन कूच दीन करवाय ॥
जहाँ कचहरी परिमालिक की आल्हा सहित पहुँचेआय २१९
खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने बैठे तहँ कनौजीराय ॥
राजा बोले तब आल्हा ते हमपरदया दीन बिसराय २२०
जबै बनाफर तुम मोहबेगे तबहीं चढ़ा पिथौराराय ॥
जूझिग ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय २२१
इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच बचन महराज ॥
सुनी तलाकें जब तुम्हरी हम मानो गिरी उपरते गाज २२२
माहिल भूपतिकी चुगुली सुनि हमरी देश निकासी कीन ॥