आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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नदीबेतवाकासमर । ५१३ २१
जूझिगे ठाकुर सिरसा वाले तबहूं खबरि आपनहिं लीन २२३
खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर देत फुकवाय ॥
चढ़िकै मारत हम पिरथी का साँची सुनो चँदेलेराय २२४
द्यावलि बिरमा सम माता ना ना जग भायसरिस मलखान ॥
ब्रह्मा ठाकुर के ब्याहे मा हाथी द्वार पछारा ज्वान २२५
पहिलि लड़ाई मै माड़ौगढ़ दूसर नैनागढ़ मैदान ॥
तिसरि लड़ाई मै पथरीगढ़ ब्याहे गये तहाँ मलखान २२६
चौथि लड़ाई मै दिल्ली मा पाँचो नरवर का मैदान ॥
इन्दल ब्याह हरण छठयें मा तहँपर भयो घोर घमसान २२७
सतौं लड़ाई मै बौरीगढ़ आठों बूँदी का मैदान ॥
नव दश बार लड़े रण नाहर तब मरिगये बीर मलखान २२८
भुजा टूटिगै इक आल्हा की हैंगा बली बीर चौहान ॥
स्वप्ना हैगे अब दुनिया मा हमका आजु बीरमलखान २२६
यहु दुख पावा तुम्हरी दिशि ते मानो साँच चँदेलेराय ॥
सवन चिरैया ना घर छोड़ै नानिजरा बणिजकोजाय २३०
मोहिं निकारा तब मोहबे ते तुम्हरो काह बिगारा भाय ॥
जेयत मोहोबे हम आइत ना जो ना चढ़त पिथौरा धाय २३१
पाल्यो पोष्यो लरिकाई ते ताते लाज दीन बिसराय ॥
दूध पियायो मल्हना रानी तब यह रुजिया लहु रखा भाय २३२
अस समुझायो मोहिं माता जब तब सब क्रोध दीन बिसराय ॥
सुनिकै बातें ये आल्हा कीं कायल भये चँदेलेराय २३३
तबै बनाफर उदयसिंह जीं बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥
सुखसों सोवो अब मोहबे मा करिहै काह पिथौराराय २३४
जो कछु हैगा पाछे परिगा अब आगे का करो विचार ॥