आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ , आल्हखण्ड । ५२२
जो सुनि पै हैं आल्हा ठाकुर हमते रारि मचै हैं आय ४७
सुनिकै बातें गजराजा की सुभिया कूच दीन करवाय ॥
झारखण्ड के फिरि जंगल मा डेराजाय दीन गड़वाय ४८
चौकी पहरा करि जादू के निर्भय बसी तहाँ सुखपाय ॥
सुनवाँ सोचै ह्याँ महलन मा आये नहीं लहुरा भाय ४६
पता लगावों मैं ऊदन का जावों देश देश को धाय ॥
यहै सोचिकै रानी सुनवाँ चिल्हियाबनीसरगमड़राय ५०
पहिले ढूँढ़ा त्यहि बिठूर का पाछे गयी कामरू धाय ॥
सिलहट बिजहट मौरँग भुन्ता दिल्लीशहरलखा फिरिजाय ५१
पता न पायो जब ऊदन का पहुँची झारखण्ड में आय ॥
तहाँ पै डेराहैंड बेड़िनि के सुनवाँ बैठि बरगदे जाय ५२
पेड़ बरगदा के नीचे मा सुभिया पलँग लीन बिछवाय ॥
लैकै पिंजरा फिरि सुवना का मानुष तुरतै दीन बनाय ५३
खेलै चौपरि सँग ऊदन के सुभिया बोली बचन सुनाय ॥
व्याह हमारे सँगमा करिये मानो कही बनाफरराय ५४
भजिये अल्ला बिसमिल्ला को ऊदन रटो खुदाय खुदाय ॥
तब सुख पैहौ तुम देहीं का नाहीं खाल लेउँ खिचवाय ५५
खुदा खैरियत तुम्हरी करि हैं बिसमिल भलाकरी सबकाल ॥
बाबा आदम संकट टारी मेटी अली भली जंजाल ५६
बातें सुनिकै ये बेड़िनि की बोला देशराज का लाल ॥
खुदा खुदाई चहु दिखलावैं बिसमिलआयजायँततकाल५७
ऊदन व्याहैं नहिं बेड़िनि को कबहूँ राम नाम बिसराय ॥
देश आरिया के क्षत्री हम कैसे मुसलमान ह्वैजायँ ५८
जब छुइजावैं मुसलमान को तबहीं तुरत करें अस्नान ॥