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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages
Page 282Permalink

२६८ वेदान्तसार
प्रपञ्चमात्र हैं अर्थात् नाममात्र के लिए ही हैं। वास्तविकस्थिति में ये सब
एकमात्र परमब्रह्म के ही अलग-अलग नाम हैं, जो उसकी महिमा का कथन
करने के लिए कहे गए हैं। इसीप्रकार सविकल्पकसमाधि में जो ज्ञाता, ज्ञान
और ज्ञेय की भिन्नता की प्रतीति होती है, वह तो नाममात्र के लिए है।
वास्तव में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय ये तीनों और कुछ नहीं, अपितु एकमात्र ब्रह्म
ही हैं। इसलिए इस समाधि में भिन्नता में भी एकता विद्यमान रहती है।
जबकि निर्विकल्पक-समाधि में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय का भेद ठीक
उसीप्रकार समाप्त हो जाता है, जिसप्रकार जल में नमक डालने पर वह
उसमें पूर्णरूप से घुल जाता है, उसकी अलग से प्रतीति नहीं होती है,
केवल जलमात्र ही प्रतीत होता है। अतः निर्विकल्पकसमाधि में उस
अद्वैतवस्तु परमब्रह्म के आकार से आकारित चित्तवृत्ति का अलग से आभास
होना पूरी तरह समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में केवल अद्वितीयवस्तु
परमब्रह्म मात्र शेष बचता है, जिसका साधक को निरन्तर भान होता रहता
है।
तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति की अवस्था की
भिन्नता को स्पष्ट करते हैं। यद्यपि निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति दोनों में
ही वृत्ति का आभास नहीं होता है तथापि समाधि में वृत्ति की स्थिति
विद्यमान रहती है, किन्तु जल में 'नमक के समान' उसका अद्वैततत्त्व
परमब्रह्म के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण अलग से आभासित नहीं होता
है। इसके विपरीत सुषुप्ति की अवस्था में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता
है, क्योंकि वहाँ अन्तःकरण अपने कारणभूत अज्ञान में विलीन हो जाता है।
इसलिए अन्तःकरण की वृत्तियों का पूर्णरूप से अभाव होना स्वाभाविक है।
अतः निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति अवस्था दोनों को अभिन्न प्रतिपादित
करना भ्रान्ति ही है।
विशेष-(1) समाधि के भेदद्वय-सविकल्पक एवं निर्विकल्पक को
सोदाहरण समझाने के बाद सुषुप्ति अवस्था से निर्विकल्पकसमाधि का भेद
बताया गया है।
(2) निर्विकल्पकसमाधि के विषय में पञ्चदशीकार का कथन इसप्रकार
है-
“ध्यातृ ध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम्।
निर्वात दीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते।।"

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समाधि-निरूपण २६९
(३) विद्वन्मनोरञ्जिनीकार स्वामी रामतीर्थ ने निर्विकल्पकसमाधि को
असम्प्रज्ञात समाधि बताते हुए, इसे आलम्बनरहित प्रतिपादित किया है।
(४) इससे पूर्व के गद्यखण्ड में प्रतिपादित श्रवण, मनन, निदिध्यासन
आदि का समाधि के साथ आपेक्षिकमहत्त्व आचार्य शङ्कर भी स्वीकार करते
हैं-
श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि।
निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम्॥
(५)प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-१
चित्र-५८
समाधि
सविकल्पक निर्विकल्पक
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय में भेद प्रतीति होते हुए भी ब्रह्म की प्रतीति | ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के भेद की प्रतीति का पूर्ण अभाव एकमात्र ब्रह्म की प्रतीति
मिट्टी के हाथी के समान भेदप्रतीति होते हुए भी मिट्टीमात्र की प्रतीति के समान | सुषुप्ति अवस्था से भिन्नता | जल में नमक घुलने पर एकाकार प्रतीति (जल) के रूप में ब्रह्म की प्रतीति
निर्विकल्पक समाधि में जल में नमक के समान वृत्ति की विद्यमानता रहती है। ब्रह्म के साथ उसके तादात्म्य के कारण आभास नहीं होता है। | सुषुप्ति में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता है।
अन्तःकरण के अपने कारणभूत अज्ञान में लय होने से।
अवतरणिका-समाधि के दो भेदों का उल्लेख करने के बाद अङ्ग एवं
उपाङ्गों का वर्णन करते हैं-
अस्याङ्गानि यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः। तत्र
"अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः"। "शौचसन्तोषतपः
स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः"। करचरणादिसंस्थानविशेषलक्षणानि
पद्मस्वस्तिकादीन्यासनानि। रेचकपूरककुम्भकलक्षणाः प्राणनिग्रहोपायाः

१. विस्तृत विवरण के लिए द्रष्टव्य भूमिका पृष्ठ...............।

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२७० वेदान्तसार
प्राणायामाः। इन्द्रियाणां स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणं प्रत्याहारः।
अद्वितीयवस्तुन्यन्तरिन्द्रियधारणं धारणा। तत्राद्वितीयवस्तुनि विच्छिद्य
विच्छिद्यान्तरिन्द्रियवृत्तिप्रवाहो ध्यानम्। समाधिस्तूक्तः सविकल्पक
एव॥३१॥
पदच्छेद-अस्य-अङ्गानि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार- धारणा-
ध्यान-समाधयः। तत्र “अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः यमाः”।
“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः”। कर-चरणादि-
संस्थान-विशेष-लक्षणानि पद्म-स्वस्तिकादीनि आसनानि। रेचक-पूरक-
कुम्भक-लक्षणाः प्राण-निग्रहोपायाः प्राणायामाः।
इन्द्रियाणाम् स्व-स्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणम् प्रत्याहारः। अद्वितीय-वस्तुनि-
अन्तः-इन्द्रियधारणम् धारणा। तत्र-अद्वितीय-वस्तुनि विच्छिद्य-विच्छिद्य-
अन्तःइन्द्रियवृत्तिप्रवाहः ध्यानम्। समाधिः तु उक्तः सविकल्पकः एव॥३१॥
अनुवाद-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और
समाधि इसके (आठ) अङ्ग हैं। उनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,
अपरिग्रह (ही) यम हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की
आराधना, नियम हैं। हाथ, पैर आदि की स्थितिविशेष के बोधक पद्म एवं
स्वस्तिक आदि आसन हैं। रेचक, पूरक, कुम्भक लक्षणों से युक्त प्राण को
नियन्त्रित करने के उपाय ही प्राणायाम हैं।
अपने-अपने विषयों से इन्द्रियों को निवृत्त कर लेना 'प्रत्याहार' है।
अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में अन्तरिन्द्रियों (मन, बुद्धि एवं चित्त) को नियोजित
करना 'धारणा' है। अन्तरिन्द्रियों (मन एवं बुद्धि आदि) को रुक-रुककर
उस अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में प्रवृत्त करना (ही) ध्यान है। समाधि तो
सविकल्पक ही है, जो ऊपर कही जा चुकी है।
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि के सहयोगी आठ
अङ्गों का उल्लेख करते हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि, ये ही निर्विकल्पकसमाधि के आठ अङ्ग हैं।
पुनः इन्हें क्रमशः स्पष्ट करते हैं-उपर्युक्त अङ्गों में से 'यम' नामक अङ्ग
के पुनः अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह ये पाँच उपाङ्ग माने
गए हैं।
इनमें किसी भी जीव को मन, वचन अथवा कर्म से कष्ट न पहुँचाना
ही 'अहिंसा' है। सदैव सत्यभाषण करना, झूठ न बोलना ही 'सत्य' है।
किसी की वस्तु न चुराना ही 'अस्तेय' कहा गया है। मन अथवा शरीर से
स्त्री की संगति न करना ही 'ब्रह्मचर्य' माना गया है। सांसारिक

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समाधि-निरूपण २७१
भौतिकपदार्थों का संग्रह न करना ही 'अपरिग्रह' माना गया है। स्पष्ट है कि,
इन सभी के माध्यम से व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित अर्थात् नियमित
करता है। इसीलिए ये यम के सहायक उपाङ्ग कहे गए हैं।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की आराधना करना ही नियमों
के अन्तर्गत माने गए हैं। यहाँ शौच से अभिप्राय शरीर एवं मन की शुद्धि से
ग्रहण करना चाहिए। जितना प्राप्त हो गया, उसी से जीवनयापन करना.
अधिक प्राप्त करने की इच्छा न करना ही संतोष है। शरीर को विपरीत
परिस्थितियों के भी अनुकूल बनाना, उनमें कष्ट का अनुभव न करना ही
तप है। इसीप्रकार वेदादि ब्रह्मविषयक ग्रन्थों का निरन्तर नियमितरूप से
अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। स्वाध्याय के पश्चात् परमब्रह्म का
श्रद्धापूर्वक चिन्तन, उसकी महिमा का कथन आदि प्राणिधान अर्थात् ईश्वर
की आराधना माना गया है।
शरीर को सात्त्विक, हल्का एवं तपयोग्य बनाए रखने के लिए, हाथ पैर
आदि की विशेष आकृति को प्रदर्शित करने वाले स्वस्तिक एवं पद्मासन
आदि आसन माने गए हैं। इनके अभ्यास से साधक का अपने शरीर एवं
मन पर नियन्त्रण होता है। अतः समाधि के लिए इनकी उपयोगिता मानी गई
है। प्राणवायु को धीरे-धीरे नासिकारन्ध्र से बाहर की ओर निकालना 'रेचक'
कहलाता है। इसीप्रकार शनैः शनैः उसे शरीर में खींचना 'पूरक' तथा
धैर्यपूर्वक उसे शरीर में रोकना 'कुम्भक' माना गया है। इन तीनों क्रियाओं
को पद्मासन लगाकर, क्रमशः धीरे-धीरे सम्पादित करना ही 'प्राणायाम' है।
ऐसा करने से प्राणवायु पर नियन्त्रण के साथ-साथ शरीर की शुद्धि तथा
सत्त्वगुण में वृद्धि होती है।
सामान्यतः इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं,
क्योंकि उनके भोग में प्रवृत्त रहना उनका स्वभाव है। इसमें मन भी इन्द्रियों
का ही साथ देता है, किन्तु अपनी अन्तःइन्द्रियों (मन, बुद्धि आदि) तथा
बाह्य इन्द्रियों को उनके अपने-अपने विषयों की ओर जाने से रोकना,
नियन्त्रित करना ही 'प्रत्याहार' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विषयों से
नियन्त्रित किए गए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीयवस्तु ब्रह्म में
लगाना ही धारणा है। इसीप्रकार अद्वितीयब्रह्म में नियोजित किया जाता हुआ
अन्तःकरण, जब इधर-उधर सांसारिक वस्तुओं की ओर जाता है। इसप्रकार
इधर-उधर भटकते हुए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीय वस्तु
परमब्रह्म में थोड़ा रुक-रुककर बार-बार प्रवृत्त करना ही ध्यान है। इसके

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२७२ वेदान्तसार
अतिरिक्त यहाँ बताई गई समाधि से अभिप्राय 'सविकल्पक' समाधि से है।
जिसका पूर्व में विस्तारपूर्वक कथन किया जा चुका है।
विशेष-(1) अङ्गानि-अङ्ग्यन्ते ज्ञायन्ते अमीभिरिति अङ्गानि' इत्यादि
व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विकल्पकसमाधि में सहायक होने के कारण इन्हें
अङ्ग कहा गया है।
(2) पातञ्जलसूत्र में भी इनकी संख्या आठ ही बतायी गई है।
(3) शङ्कराचार्य ने यम की इसप्रकार व्याख्या की है-
“सर्वं ब्रह्मेति विज्ञानादिन्द्रियग्रामसंयमः।
यमोऽयमिति सम्प्रोक्तोऽभ्यसनीयो मुहुर्मुहुः।।
(4) महर्षि पतञ्जलि ने पातञ्जलयोगदर्शन में समाधि के आठ अङ्गों
का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।
(5) धारणा के विषय में आचार्य नृसिंहसरस्वती का कथन इसप्रकार
है-
“सर्वेषां बुद्धिसाक्षितया विद्यमानेऽद्वितीयवस्तुनिचित्तनिक्षेपणं धारणा”
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार भी समझा जा
सकता है-
चित्र-५९
निर्विकल्पक समाधि के आठ अङ्ग
यम | नियम | आसन | प्राणायाम | प्रत्याहार | धारणा | ध्यान | समाधि
पद्मा-स्वस्तिकादि हाथ पैर की विशेष स्थिति
अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह | पूरक कुम्भक रेचक | अन्तःकरण को ब्रह्म में लगाना | ज्ञाता ज्ञान आदि के भेद
संयुक्त प्रक्रिया | आभासपूर्वक चित्तवृत्ति का तदाकार आकारित होना।
शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान
इन्द्रियों को स्व-स्व विषय से हटाना
अन्तःकरण को रुक-रुककर परब्रह्म की ओर प्रवृत्त करना।

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समाधि-निरूपण २७३
अवतरणिका- तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में आने वाले
विघ्नचतुष्टय को प्रस्तुत करते हैं-
एवमस्याङ्गिनो निर्विकल्पकस्य लयविक्षेपकषायरसास्वादलक्षणा
श्चत्वारो विघ्नाः सम्भवन्ति। लयस्तावदखण्डवस्त्वनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेर्निद्रा। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेन चित्तवृत्तेरन्यावलम्बनं विक्षेपः।
लयविक्षेपाभावेऽपि चित्तवृत्ते रागादिवासनया स्तब्धीभावादखण्ड-
वस्त्वनवलम्बनं कषायः। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेनापि चित्तवृत्तेः
सविकल्पकानन्दास्वादनं रसास्वादः। समाध्यारम्भसमये
सविकल्पकानन्दास्वादनं वा॥३२॥
पदच्छेद-एवम् अस्य अङ्गिनः निर्विकल्पकस्य लय-विक्षेप-कषाय-
रसास्वाद-लक्षणाः चत्वारः विघ्नाः सम्भवन्ति। लयः तावद्
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन चित्तवृत्तेः निद्रा। अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेः अन्य-अवलम्बनम् विक्षेपः। लयविक्षेप-अभावे अपि चित्तवृत्तेः
राग-आदि वासनया स्तब्धी-भावाद् अखण्डवस्तु-अनवलम्बनम् कषायः।
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन अपि चित्तवृत्तेः सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम्
रसास्वादः। समाधि-आरम्भसमये सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम् वा।।३२।।
अनुवाद-इसप्रकार इस मुख्य निर्विकल्पक (समाधि) के लय, विक्षेप,
कषाय और रसास्वाद (नामक) चार विघ्न होते हैं। अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का
आश्रय प्राप्त किए बिना, चित्तवृत्ति का निद्रा के वशीभूत होना तो 'लय'
(नामक विघ्न) है। अखण्डवस्तु को प्राप्त करने से पहले चित्तवृत्ति का
आनन्द (बाह्य सांसारिक) विषयों में अटक जाना 'विक्षेप' कहलाता है।
लय और विक्षेप के अभाव में भी चित्तवृत्ति का राग आदि संस्कारों से
जड़तावश अखण्डवस्तु (ब्रह्म) तक न पहुँच पाना ही कषाय है।
अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त किये बिना ही चित्तवृत्ति का
सविकल्पकसमाधि के आनन्द का आस्वादन ही 'रसास्वाद' (नामक विघ्न)
है अथवा समाधि के आरम्भिकसमय में 'सविकल्पकसमाधि के आनन्द से
ही संतुष्ट होना रसास्वाद' है।
'चन्द्रिका'- प्रमाता अधिकारी जब गुरु के उपदेश एवं श्रवण आदि
उपायों के अपने अभ्यास से सविकल्पक समाधि तक पहुँचकर, अपने
चरमलक्ष्य निर्विकल्पकसमाधि की ओर बढ़ता है तो इस मार्ग में उसे कुछ
व्यवधानों का सामना करना पड़ता है, जिनकी संख्या चार मानी गई है,
इनका विवरण क्रमशः इसप्रकार है-

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२७४ वेदान्तसार
(१) लय-समाधि की अवस्था में साधक अपनी बाह्य एवं आन्तरिक
इन्द्रियों को सांसारिकविषयों से हटाकर, अन्तरात्मा परमशुद्धचैतन्य की ओर
उन्मुख होने का प्रयास करता है, किन्तु प्रत्यगात्मा के स्वरूप की प्रतीति के
अभाव में तन्द्रावश निद्रा के वशीभूत हो जाता है। इसलिए अद्वितीयवस्तु
ब्रह्मप्राप्तिरूप निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में इसे ‘लय' नामक प्रथम विघ्न
बताया गया है। इस स्थिति में चित्तवृत्ति वस्तुतः शब्दादि बाह्यविषयों को भी
आलस्य के कारण ग्रहण नहीं कर पाती है। साथ ही इसीकारण प्रत्यगात्मा
का स्वरूप भी अवभासित न होने से चित्तवृत्ति लगभग निवृत्त ही हो जाती
है। वस्तुतः लय में स्थित साधक की उपमा हम ऐसे यात्री से दे सकते हैं
जो चलते-चलते थकान के कारण मार्ग में ही निद्रा के आगोश में समाकर
अपने लक्ष्य को विस्मृत कर बैठा हो।
(२) विक्षेप-अद्वितीयवस्तु परब्रह्म को प्राप्त करने के लिए जब
चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी होती है, किन्तु वहाँ उसके दर्शन न करके पुनः बाह्य
वस्तुओं को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाती है। इसप्रकार की स्थिति को
निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में 'विक्षेप' नामक विघ्न के रूप में कहा गया
है। विक्षेप में स्थित प्रमाता की उपमा हम ऐसे पक्षी से दे सकते हैं, जो
फलदारवृक्ष पर बैठा हुआ है, किन्तु अच्छे फल खाने की अभिलाषा से
अन्य वृक्षों की ओर उड़ता है, किन्तु वहाँ अच्छे फल न पाकर पुनः अपने
पूर्ववृक्ष पर ही आ बैठता है।
(३) कषाय-लय और विक्षेप नामक दोनों प्रकार के विघ्नों के न होते
हुए भी जब साधक की चित्तवृत्ति राग आदि वासनाओं के वशीभूत होने के
कारण स्तब्ध हो जाती है, मानो ठहर सी जाती है। जिसके कारण उसका
अद्वितीयवस्तु परब्रह्म के दर्शन का प्रयास निष्फल हो जाता है। इस विघ्न
को 'कषाय' के नाम से जाना गया है। इसे समझाने के लिए प्रसिद्ध
टीकाकार नृसिंहसरस्वती ने इसप्रकार उदाहरण प्रस्तुत किया है-
जिसप्रकार कोई व्यक्ति राजा के दर्शन हेतु राजमहल की ओर प्रस्थान
करे, किन्तु मार्ग में द्वारपाल द्वारा रोक दिया जाए और द्वार पर ही खड़ा रह
जाए। ठीक इसीप्रकार शब्दादि बाह्यविषयों का परित्याग करके चित्तवृत्ति को
साधक अद्वितीयवस्तु की ओर प्रवृत्त करता है, किन्तु अतीत की अनुभूतियों
की परम्परा के कारण उसकी चित्तवृत्ति रागादि की वासना से जड़ सी हो
जाती है। यही कषाय है।

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समाधि-निरूपण २७५
(४) रसास्वाद-रसास्वाद नामक विघ्न के ग्रन्थकार ने दो लक्षण किये
हैं। प्रथम के अनुसार-अद्वितीयवस्तु ब्रह्म की प्राप्ति न होने पर सम्पूर्ण
बाह्यप्रपञ्च की निवृत्ति होने से साधक को ब्रह्मानन्द के भ्रमवश जो
सविकल्पक आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रसास्वाद कहते हैं। द्वितीय
लक्षण के अनुसार-सविकल्पकसमाधि में स्थित साधक ज्यों ही निर्विकल्पक
समाधि की ओर अग्रसर होता है। उसी समय अनुभूत आनन्द से
अनिच्छावश ही संतुष्ट होकर ठहर जाता है। इसीको रसास्वाद नामक विघ्न
कहा जाता है।
विशेष-(1) पञ्चदशीकार ने रसास्वाद विघ्न की व्याख्या इसप्रकार की
है-
'मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः।
अखण्डैकरसं श्रुत्वा निष्प्रचारा बिभेत्यतः॥
(२) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६०
विघ्न चतुष्टय
┌───────────────┬────────────────┬────────────────┬─────────────────┐
लय विक्षेप कषाय रसास्वाद
│ │ │ │
┌─────────────┐ ┌──────────────┐ ┌──────────────┐ ┌─────────────────┐
│निद्रावस्था को│ │बाह्य सांसारिक│ │वासनावश रागादि│ │भ्रमवश सविकल्पक │
│प्राप्त होना │ │विषयों से │ │से स्तब्ध होना│ │आनन्द से ही │
│ │ │अवरुद्ध होना │ │ │ │सन्तुष्ट हो जाना │
└─────────────┘ └───────▲──────┘ └──────▲───────┘ └────────▲────────┘
│ │ │
┌─────┴─────────────┴─────────────────┴┐
│ अद्वितीय वस्तु के आश्रय │
│ से पूर्व चित्तवृत्ति का। │
└──────────────────────────────────────┘
अवतरणिका-तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि की स्थिति का कथन करते
हुए, उससे पूर्व चित्तवृत्ति में विघ्नों का प्रादुर्भाव होने पर उनके निवारण-
विषयक उपायों की कारिका प्रस्तुत करते हैं-
अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितं चित्तं निर्वातदीपवदचलं सदखण्ड-
चैतन्यमात्रमवतिष्ठते यदा तदा निर्विकल्पकः समाधिरित्युच्यते। तदुक्तम्-
“लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः।
सकषायं विजानीयाच्छमप्राप्तं न चालयेत्॥

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२७६ वेदान्तसार


नास्वादयेद्रसं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति,
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता" इति च॥३३॥
पदच्छेद-अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितम् चित्तम् निर्वातदीपवत् अचलम्
सद् अखण्डचैतन्यमात्रम् अवतिष्ठते यदा, तदा निर्विकल्पकः समाधिः इति
उच्यते। तद उक्तम्-
“लये सम्बोधयेत् चित्तम् विक्षिप्तम् शमयेत् पुनः।
सकषायम् विजानीयात् शमप्राप्तम् न चालयेत्॥
न आस्वादयेद् रसम् तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति,
“यथा दीपः निवातस्थः न इङ्गते सा उपमा स्मृता" इति च॥३३॥
अनुवाद-इन चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित चित्त, जब वायुरहित
प्रदेश में स्थित दीपक के समान अचल होकर अखण्डचैतन्यमात्र में स्थित
रहता है। तब निर्विकल्पकसमाधि है, ऐसा कहा जाता है। इसलिए कहा गया
है-
“लय में चित्त को सावधान करे, तत्पश्चात् (विक्षेप में) विक्षिप्त हुए
(चित्त) को शान्त करे, कषाययुक्त चित्त को विशेषरूप से समझाए तथा
स्थिरता (शम) को प्राप्त हुए चित्त को छेड़ना नहीं चाहिए।
इसके अतिरिक्त 'रसास्वाद' (की स्थिति) में रस का आस्वादन न करे
अपितु प्रज्ञा द्वारा (ठीक उसीप्रकार) स्वयं को पूर्णरूप से आसक्तिरहित करे।
जिसप्रकार वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता है। वह
साधक इसीप्रकार की उपमा वाला कहा गया है।"
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड से पूर्व बताए गए लय, विक्षेप, कषाय एवं
रसास्वाद नामक चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित होकर जब साधक,
पूर्णतया वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक की पूर्णरूप से स्थिर लौ के
समान, निश्चल एवं अखण्ड चैतन्यमात्ररूप में स्थित होता है, उसकी यही
अवस्था निर्विकल्पकसमाधि कहलाती है।
इस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करती हुई चित्तवृत्ति में यदि
विघ्नों का प्रादुर्भाव हो जाता है, तो उसके निवारण के उपाय हेतु ग्रन्थकार
आचार्य गौडपाद की कारिका को प्रस्तुत करते हैं-
सविकल्पकसमाधि की अवस्था में प्रत्यगात्मारूप ब्रह्म के ज्ञान की
प्रतीति न होने पर यदि आलस्य के कारण निद्रा की प्राप्तिरूप 'लय' नामक

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समाधि-निरूपण २७७
विघ्न आ जाए तो उसे दूर करने के लिए साधक को बार-बार चित्त को
उत्साहित करके जागृत करना चाहिए, क्योंकि निद्रामग्न होने पर वह
ब्रह्मप्राप्तिरूप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा।
पुनः अद्वितीय वस्तु ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए प्रवृत्त हुई चित्तवृत्ति
यदि सांसारिकविषयों को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाए, तो उसे सांसारिक
विषयों के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न करके शान्त करना चाहिए तथा धैर्य का
अवलम्बन करके पुनः उसी अद्वितीयवस्तु परमब्रह्म की ओर प्रेरित करना
चाहिए। ऐसा करने पर ही वह निर्विकल्पकसमाधि को प्राप्त करने में सक्षम
होगा।
इसप्रकार ब्रह्मेतर विषयों में लगा हुआ चित्त निरन्तर अभ्यासपूर्वक 'लय'
और 'विक्षेप' नामक विघ्नों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् कभी-कभी
अखण्डवस्तु के एकाकार की प्राप्ति न होने से स्तब्ध होकर जड़वत् हो
जाता है अथवा रागादि वासनावश बाह्यविषयों की ओर जाने लगता है, तो
कषायरूप इस विघ्न के उपस्थित होने पर साधक को सावधान हो जाना
चाहिए तथा यह सोचकर कि, 'इसके द्वारा अखण्डवस्तु की प्राप्ति नहीं हो
सकती है, अतः यह त्याज्य है', उसका परित्याग कर देना चाहिए।
इसप्रकार विचार करने से निरन्तर अभ्यास द्वारा जब चित्त 'शम' को
प्राप्त हो जाए तो उसे वहीं स्थिर कर देना चाहिए। उसके बाद उसे वहाँ से
विचलित करना लेशमात्र भी उचित नहीं है। अतः स्वयं को प्रज्ञा द्वारा
पूर्णतया आसक्तिरहित करके, साधक को ब्रह्मानन्द का आस्वादन करना
चाहिए। वस्तुतः साधक को सविकल्पकरस के आनन्दमात्र से स्वयं को
कृतार्थ नहीं समझना चाहिए, अपितु बुद्धिबल से सविकल्पक आनन्द से
अनासक्त रहने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए।
इसप्रकार के योगी के चित्त की उपमा ऐसे दीपक की पूर्णतया स्थिर लौ
के साथ दी गई है, जो पूरीतरह वायुरहित प्रदेश में रखा हुआ है। अर्थात्
जिसप्रकार पूर्णतया वायुरहितप्रदेश में रखे हुए दीपक की लौ लेशमात्र भी
परिचालित नहीं होती पूर्णतया निश्चल रहती है। ठीक उसीप्रकार सभीप्रकार
के विघ्नों को पार करके निर्विकल्पकसमाधि में स्थित साधक का चित्त भी
पूर्णतया निश्चल होकर अखण्डपरमानन्द का अनुभव करते हुए एकाकार की
अनुभूति करता है। इस विषय में आचार्य गौडपाद कहते हैं-

जीवन्मुक्त-निरूपण

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२७८ वेदान्तसार
“यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा।।”
विशेष-(1) निर्विकल्पकसमाधि में स्थित साधक के चित्त की उपमा
निर्वात-दीप के साथ अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है।
(2) निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में आने वाले विघ्नचतुष्टय के
निराकरण का उपाय बताया गया है।
(3) सविकल्पकसमाधि में प्राप्त आनन्द को भ्रमवश परमानन्द समझकर
वहीं पर नहीं अटकना चाहिए, अपितु ऐसी स्थिति में अपनी विवेकशील
प्रज्ञा का सहारा लेकर, साधक को अनासक्तभाव से आगे बढ़ना चाहिए।
(4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है।
चित्र-६१.
निर्विकल्प समाधि में साधक की चित्तवृत्ति
[पूर्णतया स्थिर लौ] [अखण्ड ब्रह्मानन्द में स्थित]
[वायुरहित प्रदेश] वत् (समान) [स्थिर चित्तवृत्ति]
[निर्वात दीपक]
अवतरणिका-तत्पश्चात् ग्रन्थकार वेदान्त की शिक्षा के परिणामस्वरूप
गुरु के आशीर्वाद से उत्कृष्ट अवस्था को प्राप्त, जीवन्मुक्त के लक्षण का
उल्लेख करते हैं-
अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते। जीवन्मुक्तो नाम स्वस्वरूपाखण्ड-
ब्रह्मज्ञानेन तदज्ञानबाधनद्वारा स्वस्वरूपाखण्डब्रह्मणि साक्षात्कृतेऽज्ञान-
तत्कार्यसञ्चितकर्मसंशयविपर्ययादीनामपि बाधितत्वादखिलबन्धरहितो
ब्रह्मनिष्ठः।
“भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे”॥
इत्यादिश्रुतेः॥३४॥
पदच्छेद-अथ जीवन्मुक्तलक्षणम् उच्यते। जीवन्मुक्तः नाम
स्व-स्वरूप-अखण्ड- ब्रह्मज्ञानेन तद् अज्ञान-बाधन द्वारा स्व-स्वरूप-अखण्ड

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जीवन्मुक्त-निरूपण २७९
ब्रह्मणि साक्षात्कृते अज्ञान-तत्- कार्य-सञ्चितकर्म-संशय-विपर्यय-आदीनाम्
अपि बाधितत्वाद् अखिल-बन्धरहितः ब्रह्मनिष्ठः।
“भिद्यते हृदय-ग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते च अस्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे”॥
इत्यादिश्रुतेः॥३४॥
अनुवाद-इसके बाद जीवन्मुक्त का लक्षण कहा जा रहा है। जीवन्मुक्त
वस्तुतः है, जो अपने ही स्वरूप अखण्डब्रह्म के ज्ञान द्वारा, उसमें स्थित
अज्ञान का नाश करके, अपने स्वरूप अखण्डब्रह्म के साक्षात्कार से, मूल
अज्ञान एवं उसके द्वारा उत्पन्न कार्य, सञ्चितकर्म, संशय, विपर्यय आदि को
समाप्त करके, सभीप्रकार के बन्धनों से मुक्त होकर एकमात्र (ब्रह्म) में
स्थित रहता है।
‘उस परब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर हृदय की गाँठ खुल जाती है,
सभीप्रकार के संशय विच्छिन्न हो जाते हैं तथा इसके सभी कर्मबन्धन
विनष्ट हो जाते हैं।’ इत्यादि श्रुति का वचन (भी इसमें प्रमाण है)।
‘चन्द्रिका’—सविकल्पक एवं निर्विकल्पकसमाधि का विस्तारपूर्वक
विवेचन करने के पश्चात् ग्रन्थकार, जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया है,
ऐसे व्यक्ति का लक्षण कहते हैं, जिसे यहाँ जीवन्मुक्त के नाम से कहा
गया है। जीवन्मुक्त साधक गुरु के उपदेश, श्रुतिवचन एवं स्वयं द्वारा किए
गए अभ्यास द्वारा, उस अद्वितीय परमब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इस
स्थिति में वह पूर्णरूप से आत्मा एवं ब्रह्म की एकता को भी समझ लेता
है। इसप्रकार के ज्ञान से उसका आत्मा में स्थित अज्ञान पूर्णरूप से नष्ट हो
जाता है, जिसके कारण उसे अद्वितीय परमब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है।
ऐसी अवस्था में सृष्टि का कारणस्वरूप मूल अज्ञान तथा उसके द्वारा उत्पन्न
सभी कार्यरूप संचितकर्म, संशय एवं विपर्यय आदि सभी विनष्ट हो जाते
हैं।
इसप्रकार सभी कर्मबन्धनों से रहित उसकी ब्रह्ममात्र में निष्ठा रह जाती
है। ऐसा ब्रह्मनिष्ठ ही वस्तुतः वेदान्त में ‘जीवन्मुक्त’ कहा गया है। अपनी
बात की पुष्टि हेतु ग्रन्थकार मुण्डकोपनिषद् के वचनों को उद्धृत करते हैं।
जिनका अभिप्राय है—
उस अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार होने के
पश्चात् साधक के हृदय की ग्रन्थि का विनाश हो जाता है अर्थात् उसकी

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२८० वेदान्तसार
बुद्धि में स्थित अविद्या के कारण उत्पन्न वासनात्मक-कामनाएँ पूर्णतया
विनष्ट हो जाती हैं। परिणामस्वरूप उसके सभीप्रकार के संशय समाप्त हो
जाते हैं। इसप्रकार के व्यक्ति के सभी सञ्चितकर्म दग्ध हो जाते हैं तथा
परमात्मज्ञान होने के पश्चात् किए जाते हुए, क्रियमाणकर्मों में कर्तापन का
अभाव होने के कारण वे भी बाधित हो जाते हैं अर्थात् उनसे होने वाला
पापपुण्य भी उसे नहीं लगता है। अतः वे कर्मबन्धन का कारण नहीं होते
हैं। केवल प्रारब्धकर्म ही शेष रहते हैं।¹ ऐसा व्यक्ति स्वयं को 'मैं ही ब्रह्म
हूँ' ऐसा अनुभव करता है।
विशेष-(1) ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्राप्ति का कथन किया गया है।
(2) यहाँ संशय से अभिप्राय-देहादि के अतिरिक्त शुद्धचैतन्यस्वरूप
आत्मा के अस्तित्व के सम्बन्ध में संदेह करने से ग्रहण करना चाहिए।
(3) देहादि को ही आत्मा मानना, इसप्रकार का विपरीत ज्ञान होना ही
विपर्यय है।
(4) कुछ विद्वानों ने ब्रह्मनिष्ठ में प्रयुक्त 'निष्ठ' शब्द को एकपरता के
स्थान पर 'नितरां स्थितिः' अर्थात् 'एकीभाव में स्थित होना' अर्थ में प्रयुक्त
माना है।
(5) ब्रह्मनिष्ठ पद की व्याख्या विद्वन्मनोरञ्जिनीकार इसप्रकार करते हैं-
'ब्रह्मनिष्ठं वेदान्तवेद्यब्रह्मात्मनावस्थितत्वम्'।
(6) जबकि सुबोधिनीकार का इस विषय में कहना है-
'ब्रह्मणि निष्ठा तदेकपरता यस्य स ब्रह्मनिष्ठः'
(7) सांसारिकव्यक्ति संसारगत बन्धनों से आबद्ध रहता है, जो उसके
जन्म-मरण के कारण बनते हैं; किन्तु जीवन्मुक्त सभीप्रकार के लौकिक एवं
पारलौकिकबन्धनों को पूर्णतया विखण्डित करके, निरन्तर सच्चिदानन्दस्वरूप
परब्रह्म में स्थित रहता है।
(8) परावर का प्रयोग यहाँ कारणकार्यरूप उस परमब्रह्म के लिए हुआ
है- पर अर्थात् कारणरूप अवर अर्थात् कार्यरूप परावर।
(9) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते
हैं-

  1. जीवन्मुक्त के विस्तृत एवं गहन अध्ययन के लिए द्रष्टव्य भूमिका पृष्ठ-95
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जीवन्मुक्त-निरूपण २८१
चित्र-६२
जीवन्मुक्त
।
ब्रह्मज्ञान द्वारा
अज्ञान एवं उसके द्वारा उत्पन्न सञ्चित कर्म संशय विपर्यय आदि सभी
पूर्णरूप से विनष्ट होकर
एकमात्र ब्रह्मनिष्ठ
तस्य
↓
हृदयग्रन्थि भिद्यते सर्वसंशयाः छिद्यन्ते कर्माणि च सर्वाणि क्षीयन्ते
अवतरणिका-तत्पश्चात् जीवन्मुक्त के व्यवहार को कहते हैं-
अयं तु व्युत्थानसमये मांसशोणितमूत्रपुरीषादिभाजनेन
शरीरेणान्ध्यमान्द्यापटुत्वादिभाजनेनेन्द्रियग्रामेणाशनया पिपासाशोक-
मोहादिभाजनेनान्तःकरणेन च पूर्वपूर्ववासनया क्रियमाणानि कर्माणि
भुज्यमानानि ज्ञानाविरुद्धारब्धफलानि च पश्यन्नपि बाधितत्वात्परमार्थतो
न पश्यति। यथेन्द्रजालमिति ज्ञानवांस्तदिन्द्रजालं पश्यन्नपि
परमार्थमिदमिति न पश्यति। “सचक्षुरचक्षुरिव सकर्णोऽकर्ण इव”
इत्यादिश्रुतेः। उक्तं च-
“सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं च पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः।
तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चय”
इति॥३५॥
पदच्छेद-अयम् तु व्युत्थानसमये मांस-शोणित-मूत्रपुरीषादि-भाजनेन
शरीरेण अन्ध्य-मान्द्य-अपटुत्वादि-भाजनेन इन्द्रियग्रामेण अशनया पिपासा-
शोक-मोहादि-भाजनेन अन्तःकरणेन च पूर्वपूर्ववासनया क्रियमाणानि कर्माणि
भुज्यमानानि ज्ञान-अविरुद्ध आरब्धफलानि च पश्यन् अपि बाधितत्वात्
परमार्थतः न पश्यति।
यथा 'इन्द्रजालम्' इति ज्ञानवान् तद् इन्द्रजालम् पश्यन् अपि परमार्थम्
इदम् इति न पश्यति। “सचक्षुः अचक्षुः इव सकर्णः अकर्णः इव”
इत्यादिश्रुतेः। उक्तम् च-
“सुषुप्तवत् जाग्रति यः न पश्यति, द्वयं च पश्यन् अपि च अद्वयत्वतः।

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२८२ वेदान्तसार

तथा च कुर्वन् अपि निष्क्रियः च यः, सः आत्मवित् न अन्यः इति इह,
निश्चयः।" इति।।35।।
अनुवाद- यह तो (ध्यान से) उठने के समय मांस, रक्त और
मल-मूत्रादि के पात्ररूप शरीर द्वारा, अन्धता, मन्दता एवं अपटुत्व आदि की
पात्ररूप इन्द्रियसमूह से, भूख, प्यास, शोक, मोहादि के भाजन अन्तःकरण
के माध्यम से पूर्व-पूर्ववासना द्वारा किए जाने वाले कर्मों एवं ज्ञानविरुद्ध
प्रारब्धकर्मों के फलों को देखता हुआ भी, अपने यथार्थभाव का परित्याग
कर देने से उन्हें यथार्थरूप में नहीं देखता है।
जिसप्रकार 'यह जादू है' इसप्रकार जानने वाला व्यक्ति उस जादू को
देखता हुआ भी 'यह सत्य है' इसरूप में नहीं देखता है। जैसाकि—'आँख
होते हुए भी अंधे के समान, कान होने हुए भी बहरे के समान' इत्यादि
श्रुति का वचन भी प्रमाण है। कहा भी गया है--
सुषुप्ति के समान जो जाग्रत अवस्था में भी सब जगह अद्वैत को ही
देखता है। द्वैत को देखता हुआ भी उसमें विद्यमान अद्वैत का ही दर्शन
करता है तथा जो कर्म करते हुए भी निष्क्रिय है। वही इस लोक में
आत्मज्ञानी है, अन्य कोई नहीं, यह निश्चित है।।
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को समझने से पहले फल
की दृष्टि से कर्मों के तीन प्रकारों का समझना आवश्यक है (1) सञ्चित-
कर्म (2) क्रियमाणकर्म (3) प्रारब्धकर्म। अनादिकाल में किए गए कर्म
जिनका फल अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है, सञ्चितकर्म कहलाते हैं। मन,
वाणी एवं कर्म द्वारा वर्तमानजन्म में किए जा रहे कर्म-क्रियमाण कर्मों की
श्रेणी में आते हैं; क्रियापूर्ण होने के पश्चात् ये ही सञ्चितकर्म हो जाते हैं।
इसके अतिरिक्त चिरकाल के सञ्चितकर्म, जब फलोन्मुख होकर शुभ
अथवा अशुभ फल प्रदान करने में तत्पर रहते हैं, तब वे ही प्रारब्धकर्म
कहलाते हैं। क्रियमाण, सञ्चित एवं प्रारब्धकर्मों का यह चक्र व्यक्ति अथवा
प्रत्येक जीव के जीवन में निरन्तर चलता रहता है।
इसके अतिरिक्त संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—प्रथम, बन्धनों
से युक्त, द्वितीयबन्धनों से मुक्त, इसीको जीवन्मुक्त भी कहा गया है। यद्यपि
इनमें प्रथम प्रकार के बन्धनयुक्त जीवों की संख्या सर्वाधिक है। ये दोनों ही
शरीर एवं इन्द्रियों द्वारा दैनिकव्यवहार करते हैं, किन्तु किए जाने वाले कार्यों
के प्रति दोनों की मनःस्थिति एवं चिन्तन में बहुत बड़ा अन्तर होता है।

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जीवन्मुक्त-निरूपण २८३
जीवन्मुक्त अज्ञान का विनाश हो जाने के कारण किए, जाने वाले कार्य
के प्रति कर्तापन से अथवा भोग की जा रही वस्तु के प्रति भोक्ताभाव से
पूर्णतया मुक्त होता है। इसलिए पूर्ववासना के कारण वर्तमानशरीर आदि से
किए जाने वाले क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों का वह साक्षिमात्र होता है,
क्योंकि वह उनमें कर्तापन के अभिमान से रहित होता है। यद्यपि दूसरों की
दृष्टि में वह इन सबका भोक्ता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में उसकी
स्थिति कमल के पत्ते पर स्थित जल की बूँद के समान होती है, जो पत्ते
पर रखी हुई भी उसमें लिप्त नहीं होती है।
इसीकारण वह रक्त एवं मांसादिपदार्थों द्वारा निर्मित मल-मूत्र आदि से
भरे इस शरीर द्वारा, अन्धभाव, मन्दभाव आदि से युक्त श्रोत्रादि इन्द्रियसमूह
से तथा शोक, मोह, भूख, प्यास आदि से व्याकुल हो जाने वाले
अन्तःकरण द्वारा पूर्ववासना के प्रभाव के कारण किए जाने वाले कर्म तथा
वर्तमानसमय में फलों की ओर उन्मुख प्रारब्धकर्मों के फलों के प्रति
यथार्थस्थिति से पूर्णतया परिचित हो जाने के कारण, उन्हें सत्य नहीं मानता
है। उन सभी कार्यों के प्रति उसकी मनःस्थिति को ग्रन्थकार एक उदाहरण
द्वारा समझाते हैं-
जीवन्मुक्त व्यक्ति क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों को, उनके फलों को देखते
हुए ठीक उसीप्रकार नहीं देखता है, जैसे- जादू को देखने वाला कोई
व्यक्ति जादूगर की बातों को जादू समझकर 'यह वास्तविक नहीं है',
इसप्रकार देखता हुआ भी नहीं देखता है, अर्थात् वह व्यक्ति उन कार्यों के
प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से पूर्णतया रहित रहता है, क्योंकि
ज्ञान द्वारा उससे सम्बन्धित अज्ञान समाप्त हो जाता है।
जबकि शरीर एवं इन्द्रियों के प्रति ममत्व एवं अहंभाव रखने के कारण
बद्धव्यक्ति अपने अज्ञान के कारणशरीर एवं इन्द्रियों द्वारा किए जाने वाले
कर्मों के प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से युक्त रहता है।
परिणामस्वरूप वह इनसे प्राप्त होने वाले अच्छे एवं बुरे फलों से भी बँध
जाता है एवं उन्हें भोगने के लिए बार-बार विभिन्नशरीरों को धारण करके
इस संसार में जन्म लेकर, आवागमन के चक्र में पड़ा सुख दुःख का भागी
होता है।
इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मज्ञान होने पर तत्त्वज्ञानी तुरन्त
शरीर का त्याग करके मोक्ष प्राप्त नहीं करता है, अपितु वस्त्र के जल जाने
पर भी कुछ समय तक उसमें होने वाली वस्त्रविषयकबुद्धि के समान,

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२८४ वेदान्तसार
भ्रमवश दिखायी देने वाले, दो चन्द्रमाओं की ज्ञाननिवृत्ति के समान
अज्ञानवश प्रतीत होने वाले देहादि के मिथ्या होने का निश्चय होने पर भी
पूर्वसंस्कारों के कारण प्रारब्धकर्मों के विनाशपर्यन्त उसके शरीर की स्थिति
बनी रहती है। जो इस शरीर द्वारा फलभोग के उपरान्त ही समाप्त होते हैं।
नित्यप्रति के दैनिककर्मों को यद्यपि जीवन्मुक्त व्यक्ति इसी शरीर द्वारा करता
है, किन्तु उन सभी के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव के अभाव के कारण, वे
उसके द्वारा किए जाते हुए भी न किए गए के समान ही रहते हैं, क्योंकि
वह उनके कर्मफल से आबद्ध नहीं रहता है। इसी बात को ग्रन्थकार ‘स
चक्षुरचक्षुरिव’ इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए परिपुष्ट करते हैं।
जीवन्मुक्त नेत्र होते हुए भी देखता नहीं है, कान होते हुए भी सुनता
नहीं है, इसका अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार जादूगर की क्रियाओं द्वारा
अनेक वस्तुओं को उत्पन्न होते प्रत्यक्षतः देखते हुए भी हम यह कहते हैं
कि यह सत्य नहीं है, दृष्टि का भ्रममात्र है। जले हुए वस्त्र को देखकर यह
वस्त्र है, इस क्षणिकप्रतीति के साथ उसमें मिथ्यात्व का आभास भी रहता
है। ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त इस संसार को देखता हुआ भी असत्य
मानकर नहीं देखता है। वार्तालाप करता हुआ वाणी एवं श्रवणेन्द्रिय का
प्रयोग करता हुआ भी नहीं करता है, क्योंकि इन सब क्रियाओं के प्रति
उसमें कर्तापन एवं अहंभाव का पूर्णतया अभाव रहता है।
इसके बाद ग्रन्थकार उपदेशसाहस्री में दिए गए श्लोक को उद्धृत करके
जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप को कहते हैं-“जो व्यक्ति ब्रह्म एवं आत्मा के
एकत्व को भलीभांति समझ लेता है। सभीप्रकार के भेदभाव से रहित हुआ
वह सुषुप्ति अवस्था के समान ही जाग्रत अवस्था में भी द्वैतभाव को समाप्त
कर देता है। वस्तुतः इसप्रकार के व्यक्ति को ही आत्मज्ञानी कहा गया है।”
इसे ‘अहं ब्रह्मास्मि’ एवं ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इत्यादि महावाक्यों की
अनुभूति हो जाती है। इस कारण उसकी दृष्टि में ब्रह्म के अतिरिक्त सम्पूर्ण
दृश्यमान चराचरजगत् एवं उसके कारण अज्ञान का पूर्णतया अभाव ही हो
जाता है। इसलिए लोकव्यवहार में कर्मों को करता हुआ भी वह उन्हें नहीं
करता है, क्योंकि कमल के पत्ते पर विराजमान जल की बूँद के समान, उन
सभी कार्यों से वह सर्वथा अलिप्त रहता है। वस्तुतः वही व्यक्ति ब्रह्मवेत्ता,
आत्मवेत्ता कहलाने का अधिकारी होता है, अन्य नहीं। इसमें लेशमात्र भी
संदेह नहीं है।

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जीवन्मुक्त-निरूपण २८५
विशेष-(1) जिसप्रकार धनुर्धारी द्वारा चलाए गए बाण में फेंकने वाले
की शक्तिपर्यन्त वह भूमि पर नहीं गिरता है, ठीक उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों के
फलभोगपर्यन्त जीवन्मुक्त का शरीर विनष्ट नहीं होता है।
(2) 'व्युत्थान समये' से अभिप्राय ज्ञानप्राप्ति से होने वाली 'जाग्रति'
रूप अर्थ से ग्रहण करना चाहिए।
(3) शरीरनिर्माण में मांस-शोणित-मूत्रपुरीष आदि का उल्लेख शरीर के
प्रति होने वाले वैराग्यभाव की अभिव्यक्ति हेतु सप्रयोजन किया गया है।
(4) वेदान्त के अनुसार भूख एवं प्यास वस्तुतः प्राणों के कार्य हैं,
किन्तु यहाँ उन्हें अन्तःकरण के कार्य कहा गया है। इसे विद्वानों ने सांख्य
का प्रभाव माना है।
(5) प्रस्तुत अंश में जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप एवं सांसारिकव्यवहार के
प्रति उसके चिन्तन का कथन करने के कारण 'बद्धव्यक्ति' के क्रियाकलापों
की व्यञ्जना से प्रतीति हो रही है।
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६३
जीवन्मुक्त की दृष्टि (व्यवहार)
शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण
रुधिर मांस मलमूत्र मन्दत्व, अन्धत्व एवं शोक, मोह एवं भूख
का पात्र कुण्ठत्व कापात्र प्यास का पात्र
वैराग्य भाव
सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन इसके द्वारा किए जा रहे सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन
कार्यों के प्रति कर्तापन
एवं अहंभाव का अभाव
अवतरणिका-पुनः अपने द्वारा किए गए कर्मों के प्रति जीवन्मुक्त द्वारा
शुभ-अशुभ भावनाओं के अभाव को कहते हैं-
अस्य ज्ञानात्पूर्वं विद्यमानानामेवाहारविहारादीनामनुवृत्तिवच्छुभ-
वासनानामेवानुवृत्तिर्भवति शुभाशुभयोरौदासीन्यं वा। तदुक्तम्-
“बुद्धाद्वैतसतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि।
शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षण” इति।
“ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतर” इति॥३६॥

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२८६ वेदान्तसार
पदच्छेद-अस्य ज्ञानात् पूर्वम् विद्यमानानाम् एव आहार-विहार-आदीनाम्-
अनुवृत्ति-वत्, शुभवासनानाम् एव अनुवृत्तिः भवति, शुभ-अशुभयोः
औदासीन्यम् वा। तद् उक्तम्-
“बुद्ध-अद्वैत-सतत्त्वस्य यथा-इष्ट-आचरणम् यदि।
शुनाम् तत्त्वदृशाम् च एव कः भेदः अशुचिभक्षणे” इति।
“ब्रह्मवित्त्वम् तथा मुक्त्वा सः आत्मज्ञः न च इतरः” इति।।36।।
अनुवाद-इस (ब्रह्मज्ञानी) के आत्मज्ञान से पूर्व विद्यमान आहार, विहार
आदि की परम्परा के समान, केवल शुभवासनाओं का ही क्रम जारी रहता
है अथवा शुभ एवं अशुभ इन दोनों में उसका उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता
है। इसीलिए कहा गया है-
अद्वैत को तत्त्वरूप से जानने वाले (आत्मज्ञानियों) का यदि इच्छानुसार
आचरण होता तो, तत्त्वज्ञों की भी कुत्ते के समान शुद्ध-अशुद्ध के भक्षण में
भिन्नता नहीं होती। 'यह ब्रह्मज्ञान है' उसप्रकार की भावना का परित्याग
करने वाला व्यक्ति ही वह 'आत्मज्ञानी' है, अन्य कोई नहीं।
'चन्द्रिका'-इससे पूर्व ग्रन्थकार ने प्रतिपादित किया कि 'जीवन्मुक्त'
अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव से पूर्णतया
रहित होकर सर्वत्र अद्वैत का दर्शन करता है, किन्तु इसी प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी
द्वारा यह शङ्का करने पर कि यदि जीवन्मुक्त कर्म करते हुए स्वयं को कर्ता
नहीं मानता है, इसीलिए वह कर्मबन्धन से मुक्त रहता है, क्योंकि उसके
द्वारा किए जाने वाले कार्यों के पाप एवं पुण्य का वह भागी नहीं होता।
ऐसी स्थिति में तो वह अपनी इच्छानुसार अच्छे बुरे, सभीप्रकार के कार्य
करने में स्वतन्त्र होगा? क्या यह मानना उचित है?
इसी शङ्का के उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं कि तत्त्ववेत्ता ब्रह्मज्ञान से पूर्व
सांसारिकस्थिति में श्रेष्ठविचारों के साथ-साथ सदाचरण भी करता है। उन्हीं
का अनुसरण वह इस स्थिति को प्राप्त करने के उपरान्त भी करता रहता है,
अर्थात् स्वच्छ आचरण के परित्याग का सङ्कल्प तो वह वस्तुतः आत्मज्ञान
से पूर्व प्रारम्भिककाल में ही कर चुका है। अतः सिद्धि के पश्चात् उसमें
इच्छानुसार अशुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति की सम्भावना लेशमात्र भी नहीं रहती
है। आत्मसिद्धि ही वस्तुतः उसके शुभचिन्तन एवं कर्मों की परिचायक है।
साथ ही दीर्घकालीन अभ्यास के कारण इच्छानुसार स्वच्छन्द आचरण के

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जीवन्मुक्त-निरूपण २८७
संस्कार ही वास्तव में विनष्ट हो जाते हैं। इसलिए तत्त्वज्ञान के पश्चात्
जीवन्मुक्तदशा में भी शुभवासनाओं की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप वह शुभ-
कर्मों में ही प्रवृत्त होता है, अशुभ कर्मों में नहीं।
पुनः जीवन्मुक्त की अग्रिम उत्कृष्ट अवस्था को कहते हैं-कुछ समय
पश्चात् निरन्तर अभ्यास के परिणामस्वरूप शुभ-अशुभ दोनों प्रकार की
भावनाओं के प्रति उसमें उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता है, जो वस्तुतः इसकी
उत्कृष्टता का ही द्योतक है। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन्मुक्त
अवस्था में व्यक्ति यदि किसी भी कार्य में प्रवृत्त होता भी है तो,
संस्कारवश उसकी प्रवृत्ति शुभकार्यों में ही होगी अथवा फिर शुभ-अशुभ के
प्रति उसका उदासीनभाव रहेगा। अतः उसके द्वारा अशुभकर्मविषयक शङ्का
करना पूर्णतया निराधार एवं भ्रामक है, क्योंकि तत्त्वज्ञान होने पर भी यदि
वह अशुभकर्मों में प्रवृत्त होता है तो ऐसी स्थिति में हम मूर्ख एवं
आत्मज्ञानी इन दोनों में भेद ही नहीं कर सकेंगे।
अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में उद्धृत
करते हुए कहते हैं कि जिन तत्त्ववेत्ताओं ने अखण्डब्रह्म को भलीप्रकार
समझ लिया है, वे कभी भी स्वेच्छानुसार आचरण नहीं करते हैं और यदि
ऐसा नहीं होता तो जिसप्रकार कुत्ता भक्ष्य-अभक्ष्य के बारे में नहीं जानता है
तथा अपनी भूख के अनुसार किसी भी प्रकार की वस्तु को खाने में प्रवृत्त
हो जाता है, ठीक उसीप्रकार तत्त्ववेत्ता भी शुद्ध-अशुद्ध का ध्यान न रखते
हुए प्रत्येक कार्य में प्रवृत्त होता, जबकि ऐसा देखा नहीं गया है। अतः हम
निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि ब्रह्मज्ञानी का आचरण स्वच्छन्द नहीं होता
है। या तो उसकी प्रवृत्ति शुभकर्मों में होती है या फिर शुभ-अशुभ के प्रति
उसका उदासीनभाव रहता है।
इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए जीवन्मुक्त की
एक अन्य विशेषता का भी कथन करते हैं कि ब्रह्मवेत्ता जहाँ अपने कर्तापन
के भाव को समाप्त कर देता है वहीं 'मैं आत्मज्ञानी हूँ' इसप्रकार के
अहंभाव को भी वह त्याग देता है। इन दोनों भावनाओं के परित्याग की
स्थिति में ही वह सच्चा ब्रह्मज्ञानी अथवा जीवन्मुक्त कहलाने का अधिकारी
बनता है, अन्यथा नहीं।
विशेष-(1) यहाँ प्रयुक्त अन्तिमपंक्ति उपदेशसाहस्री से उद्धृत है, जहाँ
इन भावों को इसप्रकार अभिव्यक्त किया गया है-