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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 292 of 314

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Page 292

२७८ वेदान्तसार
“यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा।।”
विशेष-(1) निर्विकल्पकसमाधि में स्थित साधक के चित्त की उपमा
निर्वात-दीप के साथ अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है।
(2) निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में आने वाले विघ्नचतुष्टय के
निराकरण का उपाय बताया गया है।
(3) सविकल्पकसमाधि में प्राप्त आनन्द को भ्रमवश परमानन्द समझकर
वहीं पर नहीं अटकना चाहिए, अपितु ऐसी स्थिति में अपनी विवेकशील
प्रज्ञा का सहारा लेकर, साधक को अनासक्तभाव से आगे बढ़ना चाहिए।
(4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है।
चित्र-६१.
निर्विकल्प समाधि में साधक की चित्तवृत्ति
[पूर्णतया स्थिर लौ] [अखण्ड ब्रह्मानन्द में स्थित]
[वायुरहित प्रदेश] वत् (समान) [स्थिर चित्तवृत्ति]
[निर्वात दीपक]
अवतरणिका-तत्पश्चात् ग्रन्थकार वेदान्त की शिक्षा के परिणामस्वरूप
गुरु के आशीर्वाद से उत्कृष्ट अवस्था को प्राप्त, जीवन्मुक्त के लक्षण का
उल्लेख करते हैं-
अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते। जीवन्मुक्तो नाम स्वस्वरूपाखण्ड-
ब्रह्मज्ञानेन तदज्ञानबाधनद्वारा स्वस्वरूपाखण्डब्रह्मणि साक्षात्कृतेऽज्ञान-
तत्कार्यसञ्चितकर्मसंशयविपर्ययादीनामपि बाधितत्वादखिलबन्धरहितो
ब्रह्मनिष्ठः।
“भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे”॥
इत्यादिश्रुतेः॥३४॥
पदच्छेद-अथ जीवन्मुक्तलक्षणम् उच्यते। जीवन्मुक्तः नाम
स्व-स्वरूप-अखण्ड- ब्रह्मज्ञानेन तद् अज्ञान-बाधन द्वारा स्व-स्वरूप-अखण्ड