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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 293 of 314

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Page 293

जीवन्मुक्त-निरूपण २७९
ब्रह्मणि साक्षात्कृते अज्ञान-तत्- कार्य-सञ्चितकर्म-संशय-विपर्यय-आदीनाम्
अपि बाधितत्वाद् अखिल-बन्धरहितः ब्रह्मनिष्ठः।
“भिद्यते हृदय-ग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते च अस्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे”॥
इत्यादिश्रुतेः॥३४॥
अनुवाद-इसके बाद जीवन्मुक्त का लक्षण कहा जा रहा है। जीवन्मुक्त
वस्तुतः है, जो अपने ही स्वरूप अखण्डब्रह्म के ज्ञान द्वारा, उसमें स्थित
अज्ञान का नाश करके, अपने स्वरूप अखण्डब्रह्म के साक्षात्कार से, मूल
अज्ञान एवं उसके द्वारा उत्पन्न कार्य, सञ्चितकर्म, संशय, विपर्यय आदि को
समाप्त करके, सभीप्रकार के बन्धनों से मुक्त होकर एकमात्र (ब्रह्म) में
स्थित रहता है।
‘उस परब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर हृदय की गाँठ खुल जाती है,
सभीप्रकार के संशय विच्छिन्न हो जाते हैं तथा इसके सभी कर्मबन्धन
विनष्ट हो जाते हैं।’ इत्यादि श्रुति का वचन (भी इसमें प्रमाण है)।
‘चन्द्रिका’—सविकल्पक एवं निर्विकल्पकसमाधि का विस्तारपूर्वक
विवेचन करने के पश्चात् ग्रन्थकार, जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया है,
ऐसे व्यक्ति का लक्षण कहते हैं, जिसे यहाँ जीवन्मुक्त के नाम से कहा
गया है। जीवन्मुक्त साधक गुरु के उपदेश, श्रुतिवचन एवं स्वयं द्वारा किए
गए अभ्यास द्वारा, उस अद्वितीय परमब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इस
स्थिति में वह पूर्णरूप से आत्मा एवं ब्रह्म की एकता को भी समझ लेता
है। इसप्रकार के ज्ञान से उसका आत्मा में स्थित अज्ञान पूर्णरूप से नष्ट हो
जाता है, जिसके कारण उसे अद्वितीय परमब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है।
ऐसी अवस्था में सृष्टि का कारणस्वरूप मूल अज्ञान तथा उसके द्वारा उत्पन्न
सभी कार्यरूप संचितकर्म, संशय एवं विपर्यय आदि सभी विनष्ट हो जाते
हैं।
इसप्रकार सभी कर्मबन्धनों से रहित उसकी ब्रह्ममात्र में निष्ठा रह जाती
है। ऐसा ब्रह्मनिष्ठ ही वस्तुतः वेदान्त में ‘जीवन्मुक्त’ कहा गया है। अपनी
बात की पुष्टि हेतु ग्रन्थकार मुण्डकोपनिषद् के वचनों को उद्धृत करते हैं।
जिनका अभिप्राय है—
उस अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार होने के
पश्चात् साधक के हृदय की ग्रन्थि का विनाश हो जाता है अर्थात् उसकी