वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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तथा च कुर्वन् अपि निष्क्रियः च यः, सः आत्मवित् न अन्यः इति इह,
निश्चयः।" इति।।35।।
अनुवाद- यह तो (ध्यान से) उठने के समय मांस, रक्त और
मल-मूत्रादि के पात्ररूप शरीर द्वारा, अन्धता, मन्दता एवं अपटुत्व आदि की
पात्ररूप इन्द्रियसमूह से, भूख, प्यास, शोक, मोहादि के भाजन अन्तःकरण
के माध्यम से पूर्व-पूर्ववासना द्वारा किए जाने वाले कर्मों एवं ज्ञानविरुद्ध
प्रारब्धकर्मों के फलों को देखता हुआ भी, अपने यथार्थभाव का परित्याग
कर देने से उन्हें यथार्थरूप में नहीं देखता है।
जिसप्रकार 'यह जादू है' इसप्रकार जानने वाला व्यक्ति उस जादू को
देखता हुआ भी 'यह सत्य है' इसरूप में नहीं देखता है। जैसाकि—'आँख
होते हुए भी अंधे के समान, कान होने हुए भी बहरे के समान' इत्यादि
श्रुति का वचन भी प्रमाण है। कहा भी गया है--
सुषुप्ति के समान जो जाग्रत अवस्था में भी सब जगह अद्वैत को ही
देखता है। द्वैत को देखता हुआ भी उसमें विद्यमान अद्वैत का ही दर्शन
करता है तथा जो कर्म करते हुए भी निष्क्रिय है। वही इस लोक में
आत्मज्ञानी है, अन्य कोई नहीं, यह निश्चित है।।
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को समझने से पहले फल
की दृष्टि से कर्मों के तीन प्रकारों का समझना आवश्यक है (1) सञ्चित-
कर्म (2) क्रियमाणकर्म (3) प्रारब्धकर्म। अनादिकाल में किए गए कर्म
जिनका फल अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है, सञ्चितकर्म कहलाते हैं। मन,
वाणी एवं कर्म द्वारा वर्तमानजन्म में किए जा रहे कर्म-क्रियमाण कर्मों की
श्रेणी में आते हैं; क्रियापूर्ण होने के पश्चात् ये ही सञ्चितकर्म हो जाते हैं।
इसके अतिरिक्त चिरकाल के सञ्चितकर्म, जब फलोन्मुख होकर शुभ
अथवा अशुभ फल प्रदान करने में तत्पर रहते हैं, तब वे ही प्रारब्धकर्म
कहलाते हैं। क्रियमाण, सञ्चित एवं प्रारब्धकर्मों का यह चक्र व्यक्ति अथवा
प्रत्येक जीव के जीवन में निरन्तर चलता रहता है।
इसके अतिरिक्त संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—प्रथम, बन्धनों
से युक्त, द्वितीयबन्धनों से मुक्त, इसीको जीवन्मुक्त भी कहा गया है। यद्यपि
इनमें प्रथम प्रकार के बन्धनयुक्त जीवों की संख्या सर्वाधिक है। ये दोनों ही
शरीर एवं इन्द्रियों द्वारा दैनिकव्यवहार करते हैं, किन्तु किए जाने वाले कार्यों
के प्रति दोनों की मनःस्थिति एवं चिन्तन में बहुत बड़ा अन्तर होता है।