वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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प्राणायामाः। इन्द्रियाणां स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणं प्रत्याहारः।
अद्वितीयवस्तुन्यन्तरिन्द्रियधारणं धारणा। तत्राद्वितीयवस्तुनि विच्छिद्य
विच्छिद्यान्तरिन्द्रियवृत्तिप्रवाहो ध्यानम्। समाधिस्तूक्तः सविकल्पक
एव॥३१॥
पदच्छेद-अस्य-अङ्गानि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार- धारणा-
ध्यान-समाधयः। तत्र “अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः यमाः”।
“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः”। कर-चरणादि-
संस्थान-विशेष-लक्षणानि पद्म-स्वस्तिकादीनि आसनानि। रेचक-पूरक-
कुम्भक-लक्षणाः प्राण-निग्रहोपायाः प्राणायामाः।
इन्द्रियाणाम् स्व-स्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणम् प्रत्याहारः। अद्वितीय-वस्तुनि-
अन्तः-इन्द्रियधारणम् धारणा। तत्र-अद्वितीय-वस्तुनि विच्छिद्य-विच्छिद्य-
अन्तःइन्द्रियवृत्तिप्रवाहः ध्यानम्। समाधिः तु उक्तः सविकल्पकः एव॥३१॥
अनुवाद-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और
समाधि इसके (आठ) अङ्ग हैं। उनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,
अपरिग्रह (ही) यम हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की
आराधना, नियम हैं। हाथ, पैर आदि की स्थितिविशेष के बोधक पद्म एवं
स्वस्तिक आदि आसन हैं। रेचक, पूरक, कुम्भक लक्षणों से युक्त प्राण को
नियन्त्रित करने के उपाय ही प्राणायाम हैं।
अपने-अपने विषयों से इन्द्रियों को निवृत्त कर लेना 'प्रत्याहार' है।
अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में अन्तरिन्द्रियों (मन, बुद्धि एवं चित्त) को नियोजित
करना 'धारणा' है। अन्तरिन्द्रियों (मन एवं बुद्धि आदि) को रुक-रुककर
उस अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में प्रवृत्त करना (ही) ध्यान है। समाधि तो
सविकल्पक ही है, जो ऊपर कही जा चुकी है।
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि के सहयोगी आठ
अङ्गों का उल्लेख करते हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि, ये ही निर्विकल्पकसमाधि के आठ अङ्ग हैं।
पुनः इन्हें क्रमशः स्पष्ट करते हैं-उपर्युक्त अङ्गों में से 'यम' नामक अङ्ग
के पुनः अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह ये पाँच उपाङ्ग माने
गए हैं।
इनमें किसी भी जीव को मन, वचन अथवा कर्म से कष्ट न पहुँचाना
ही 'अहिंसा' है। सदैव सत्यभाषण करना, झूठ न बोलना ही 'सत्य' है।
किसी की वस्तु न चुराना ही 'अस्तेय' कहा गया है। मन अथवा शरीर से
स्त्री की संगति न करना ही 'ब्रह्मचर्य' माना गया है। सांसारिक