वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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(१) लय-समाधि की अवस्था में साधक अपनी बाह्य एवं आन्तरिक
इन्द्रियों को सांसारिकविषयों से हटाकर, अन्तरात्मा परमशुद्धचैतन्य की ओर
उन्मुख होने का प्रयास करता है, किन्तु प्रत्यगात्मा के स्वरूप की प्रतीति के
अभाव में तन्द्रावश निद्रा के वशीभूत हो जाता है। इसलिए अद्वितीयवस्तु
ब्रह्मप्राप्तिरूप निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में इसे ‘लय' नामक प्रथम विघ्न
बताया गया है। इस स्थिति में चित्तवृत्ति वस्तुतः शब्दादि बाह्यविषयों को भी
आलस्य के कारण ग्रहण नहीं कर पाती है। साथ ही इसीकारण प्रत्यगात्मा
का स्वरूप भी अवभासित न होने से चित्तवृत्ति लगभग निवृत्त ही हो जाती
है। वस्तुतः लय में स्थित साधक की उपमा हम ऐसे यात्री से दे सकते हैं
जो चलते-चलते थकान के कारण मार्ग में ही निद्रा के आगोश में समाकर
अपने लक्ष्य को विस्मृत कर बैठा हो।
(२) विक्षेप-अद्वितीयवस्तु परब्रह्म को प्राप्त करने के लिए जब
चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी होती है, किन्तु वहाँ उसके दर्शन न करके पुनः बाह्य
वस्तुओं को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाती है। इसप्रकार की स्थिति को
निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में 'विक्षेप' नामक विघ्न के रूप में कहा गया
है। विक्षेप में स्थित प्रमाता की उपमा हम ऐसे पक्षी से दे सकते हैं, जो
फलदारवृक्ष पर बैठा हुआ है, किन्तु अच्छे फल खाने की अभिलाषा से
अन्य वृक्षों की ओर उड़ता है, किन्तु वहाँ अच्छे फल न पाकर पुनः अपने
पूर्ववृक्ष पर ही आ बैठता है।
(३) कषाय-लय और विक्षेप नामक दोनों प्रकार के विघ्नों के न होते
हुए भी जब साधक की चित्तवृत्ति राग आदि वासनाओं के वशीभूत होने के
कारण स्तब्ध हो जाती है, मानो ठहर सी जाती है। जिसके कारण उसका
अद्वितीयवस्तु परब्रह्म के दर्शन का प्रयास निष्फल हो जाता है। इस विघ्न
को 'कषाय' के नाम से जाना गया है। इसे समझाने के लिए प्रसिद्ध
टीकाकार नृसिंहसरस्वती ने इसप्रकार उदाहरण प्रस्तुत किया है-
जिसप्रकार कोई व्यक्ति राजा के दर्शन हेतु राजमहल की ओर प्रस्थान
करे, किन्तु मार्ग में द्वारपाल द्वारा रोक दिया जाए और द्वार पर ही खड़ा रह
जाए। ठीक इसीप्रकार शब्दादि बाह्यविषयों का परित्याग करके चित्तवृत्ति को
साधक अद्वितीयवस्तु की ओर प्रवृत्त करता है, किन्तु अतीत की अनुभूतियों
की परम्परा के कारण उसकी चित्तवृत्ति रागादि की वासना से जड़ सी हो
जाती है। यही कषाय है।