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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 285

समाधि-निरूपण २७१
भौतिकपदार्थों का संग्रह न करना ही 'अपरिग्रह' माना गया है। स्पष्ट है कि,
इन सभी के माध्यम से व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित अर्थात् नियमित
करता है। इसीलिए ये यम के सहायक उपाङ्ग कहे गए हैं।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की आराधना करना ही नियमों
के अन्तर्गत माने गए हैं। यहाँ शौच से अभिप्राय शरीर एवं मन की शुद्धि से
ग्रहण करना चाहिए। जितना प्राप्त हो गया, उसी से जीवनयापन करना.
अधिक प्राप्त करने की इच्छा न करना ही संतोष है। शरीर को विपरीत
परिस्थितियों के भी अनुकूल बनाना, उनमें कष्ट का अनुभव न करना ही
तप है। इसीप्रकार वेदादि ब्रह्मविषयक ग्रन्थों का निरन्तर नियमितरूप से
अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। स्वाध्याय के पश्चात् परमब्रह्म का
श्रद्धापूर्वक चिन्तन, उसकी महिमा का कथन आदि प्राणिधान अर्थात् ईश्वर
की आराधना माना गया है।
शरीर को सात्त्विक, हल्का एवं तपयोग्य बनाए रखने के लिए, हाथ पैर
आदि की विशेष आकृति को प्रदर्शित करने वाले स्वस्तिक एवं पद्मासन
आदि आसन माने गए हैं। इनके अभ्यास से साधक का अपने शरीर एवं
मन पर नियन्त्रण होता है। अतः समाधि के लिए इनकी उपयोगिता मानी गई
है। प्राणवायु को धीरे-धीरे नासिकारन्ध्र से बाहर की ओर निकालना 'रेचक'
कहलाता है। इसीप्रकार शनैः शनैः उसे शरीर में खींचना 'पूरक' तथा
धैर्यपूर्वक उसे शरीर में रोकना 'कुम्भक' माना गया है। इन तीनों क्रियाओं
को पद्मासन लगाकर, क्रमशः धीरे-धीरे सम्पादित करना ही 'प्राणायाम' है।
ऐसा करने से प्राणवायु पर नियन्त्रण के साथ-साथ शरीर की शुद्धि तथा
सत्त्वगुण में वृद्धि होती है।
सामान्यतः इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं,
क्योंकि उनके भोग में प्रवृत्त रहना उनका स्वभाव है। इसमें मन भी इन्द्रियों
का ही साथ देता है, किन्तु अपनी अन्तःइन्द्रियों (मन, बुद्धि आदि) तथा
बाह्य इन्द्रियों को उनके अपने-अपने विषयों की ओर जाने से रोकना,
नियन्त्रित करना ही 'प्रत्याहार' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विषयों से
नियन्त्रित किए गए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीयवस्तु ब्रह्म में
लगाना ही धारणा है। इसीप्रकार अद्वितीयब्रह्म में नियोजित किया जाता हुआ
अन्तःकरण, जब इधर-उधर सांसारिक वस्तुओं की ओर जाता है। इसप्रकार
इधर-उधर भटकते हुए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीय वस्तु
परमब्रह्म में थोड़ा रुक-रुककर बार-बार प्रवृत्त करना ही ध्यान है। इसके