Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 294 of 314

Read in context
Page 294

२८० वेदान्तसार
बुद्धि में स्थित अविद्या के कारण उत्पन्न वासनात्मक-कामनाएँ पूर्णतया
विनष्ट हो जाती हैं। परिणामस्वरूप उसके सभीप्रकार के संशय समाप्त हो
जाते हैं। इसप्रकार के व्यक्ति के सभी सञ्चितकर्म दग्ध हो जाते हैं तथा
परमात्मज्ञान होने के पश्चात् किए जाते हुए, क्रियमाणकर्मों में कर्तापन का
अभाव होने के कारण वे भी बाधित हो जाते हैं अर्थात् उनसे होने वाला
पापपुण्य भी उसे नहीं लगता है। अतः वे कर्मबन्धन का कारण नहीं होते
हैं। केवल प्रारब्धकर्म ही शेष रहते हैं।¹ ऐसा व्यक्ति स्वयं को 'मैं ही ब्रह्म
हूँ' ऐसा अनुभव करता है।
विशेष-(1) ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्राप्ति का कथन किया गया है।
(2) यहाँ संशय से अभिप्राय-देहादि के अतिरिक्त शुद्धचैतन्यस्वरूप
आत्मा के अस्तित्व के सम्बन्ध में संदेह करने से ग्रहण करना चाहिए।
(3) देहादि को ही आत्मा मानना, इसप्रकार का विपरीत ज्ञान होना ही
विपर्यय है।
(4) कुछ विद्वानों ने ब्रह्मनिष्ठ में प्रयुक्त 'निष्ठ' शब्द को एकपरता के
स्थान पर 'नितरां स्थितिः' अर्थात् 'एकीभाव में स्थित होना' अर्थ में प्रयुक्त
माना है।
(5) ब्रह्मनिष्ठ पद की व्याख्या विद्वन्मनोरञ्जिनीकार इसप्रकार करते हैं-
'ब्रह्मनिष्ठं वेदान्तवेद्यब्रह्मात्मनावस्थितत्वम्'।
(6) जबकि सुबोधिनीकार का इस विषय में कहना है-
'ब्रह्मणि निष्ठा तदेकपरता यस्य स ब्रह्मनिष्ठः'
(7) सांसारिकव्यक्ति संसारगत बन्धनों से आबद्ध रहता है, जो उसके
जन्म-मरण के कारण बनते हैं; किन्तु जीवन्मुक्त सभीप्रकार के लौकिक एवं
पारलौकिकबन्धनों को पूर्णतया विखण्डित करके, निरन्तर सच्चिदानन्दस्वरूप
परब्रह्म में स्थित रहता है।
(8) परावर का प्रयोग यहाँ कारणकार्यरूप उस परमब्रह्म के लिए हुआ
है- पर अर्थात् कारणरूप अवर अर्थात् कार्यरूप परावर।
(9) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते
हैं-

  1. जीवन्मुक्त के विस्तृत एवं गहन अध्ययन के लिए द्रष्टव्य भूमिका पृष्ठ-95