वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 286 of 314
Read in context२७२ वेदान्तसार
अतिरिक्त यहाँ बताई गई समाधि से अभिप्राय 'सविकल्पक' समाधि से है।
जिसका पूर्व में विस्तारपूर्वक कथन किया जा चुका है।
विशेष-(1) अङ्गानि-अङ्ग्यन्ते ज्ञायन्ते अमीभिरिति अङ्गानि' इत्यादि
व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विकल्पकसमाधि में सहायक होने के कारण इन्हें
अङ्ग कहा गया है।
(2) पातञ्जलसूत्र में भी इनकी संख्या आठ ही बतायी गई है।
(3) शङ्कराचार्य ने यम की इसप्रकार व्याख्या की है-
“सर्वं ब्रह्मेति विज्ञानादिन्द्रियग्रामसंयमः।
यमोऽयमिति सम्प्रोक्तोऽभ्यसनीयो मुहुर्मुहुः।।
(4) महर्षि पतञ्जलि ने पातञ्जलयोगदर्शन में समाधि के आठ अङ्गों
का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।
(5) धारणा के विषय में आचार्य नृसिंहसरस्वती का कथन इसप्रकार
है-
“सर्वेषां बुद्धिसाक्षितया विद्यमानेऽद्वितीयवस्तुनिचित्तनिक्षेपणं धारणा”
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार भी समझा जा
सकता है-
चित्र-५९
निर्विकल्पक समाधि के आठ अङ्ग
यम | नियम | आसन | प्राणायाम | प्रत्याहार | धारणा | ध्यान | समाधि
पद्मा-स्वस्तिकादि हाथ पैर की विशेष स्थिति
अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह | पूरक कुम्भक रेचक | अन्तःकरण को ब्रह्म में लगाना | ज्ञाता ज्ञान आदि के भेद
संयुक्त प्रक्रिया | आभासपूर्वक चित्तवृत्ति का तदाकार आकारित होना।
शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान
इन्द्रियों को स्व-स्व विषय से हटाना
अन्तःकरण को रुक-रुककर परब्रह्म की ओर प्रवृत्त करना।