वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२८६ वेदान्तसार
पदच्छेद-अस्य ज्ञानात् पूर्वम् विद्यमानानाम् एव आहार-विहार-आदीनाम्-
अनुवृत्ति-वत्, शुभवासनानाम् एव अनुवृत्तिः भवति, शुभ-अशुभयोः
औदासीन्यम् वा। तद् उक्तम्-
“बुद्ध-अद्वैत-सतत्त्वस्य यथा-इष्ट-आचरणम् यदि।
शुनाम् तत्त्वदृशाम् च एव कः भेदः अशुचिभक्षणे” इति।
“ब्रह्मवित्त्वम् तथा मुक्त्वा सः आत्मज्ञः न च इतरः” इति।।36।।
अनुवाद-इस (ब्रह्मज्ञानी) के आत्मज्ञान से पूर्व विद्यमान आहार, विहार
आदि की परम्परा के समान, केवल शुभवासनाओं का ही क्रम जारी रहता
है अथवा शुभ एवं अशुभ इन दोनों में उसका उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता
है। इसीलिए कहा गया है-
अद्वैत को तत्त्वरूप से जानने वाले (आत्मज्ञानियों) का यदि इच्छानुसार
आचरण होता तो, तत्त्वज्ञों की भी कुत्ते के समान शुद्ध-अशुद्ध के भक्षण में
भिन्नता नहीं होती। 'यह ब्रह्मज्ञान है' उसप्रकार की भावना का परित्याग
करने वाला व्यक्ति ही वह 'आत्मज्ञानी' है, अन्य कोई नहीं।
'चन्द्रिका'-इससे पूर्व ग्रन्थकार ने प्रतिपादित किया कि 'जीवन्मुक्त'
अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव से पूर्णतया
रहित होकर सर्वत्र अद्वैत का दर्शन करता है, किन्तु इसी प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी
द्वारा यह शङ्का करने पर कि यदि जीवन्मुक्त कर्म करते हुए स्वयं को कर्ता
नहीं मानता है, इसीलिए वह कर्मबन्धन से मुक्त रहता है, क्योंकि उसके
द्वारा किए जाने वाले कार्यों के पाप एवं पुण्य का वह भागी नहीं होता।
ऐसी स्थिति में तो वह अपनी इच्छानुसार अच्छे बुरे, सभीप्रकार के कार्य
करने में स्वतन्त्र होगा? क्या यह मानना उचित है?
इसी शङ्का के उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं कि तत्त्ववेत्ता ब्रह्मज्ञान से पूर्व
सांसारिकस्थिति में श्रेष्ठविचारों के साथ-साथ सदाचरण भी करता है। उन्हीं
का अनुसरण वह इस स्थिति को प्राप्त करने के उपरान्त भी करता रहता है,
अर्थात् स्वच्छ आचरण के परित्याग का सङ्कल्प तो वह वस्तुतः आत्मज्ञान
से पूर्व प्रारम्भिककाल में ही कर चुका है। अतः सिद्धि के पश्चात् उसमें
इच्छानुसार अशुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति की सम्भावना लेशमात्र भी नहीं रहती
है। आत्मसिद्धि ही वस्तुतः उसके शुभचिन्तन एवं कर्मों की परिचायक है।
साथ ही दीर्घकालीन अभ्यास के कारण इच्छानुसार स्वच्छन्द आचरण के