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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 287 of 314

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Page 287

समाधि-निरूपण २७३
अवतरणिका- तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में आने वाले
विघ्नचतुष्टय को प्रस्तुत करते हैं-
एवमस्याङ्गिनो निर्विकल्पकस्य लयविक्षेपकषायरसास्वादलक्षणा
श्चत्वारो विघ्नाः सम्भवन्ति। लयस्तावदखण्डवस्त्वनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेर्निद्रा। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेन चित्तवृत्तेरन्यावलम्बनं विक्षेपः।
लयविक्षेपाभावेऽपि चित्तवृत्ते रागादिवासनया स्तब्धीभावादखण्ड-
वस्त्वनवलम्बनं कषायः। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेनापि चित्तवृत्तेः
सविकल्पकानन्दास्वादनं रसास्वादः। समाध्यारम्भसमये
सविकल्पकानन्दास्वादनं वा॥३२॥
पदच्छेद-एवम् अस्य अङ्गिनः निर्विकल्पकस्य लय-विक्षेप-कषाय-
रसास्वाद-लक्षणाः चत्वारः विघ्नाः सम्भवन्ति। लयः तावद्
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन चित्तवृत्तेः निद्रा। अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेः अन्य-अवलम्बनम् विक्षेपः। लयविक्षेप-अभावे अपि चित्तवृत्तेः
राग-आदि वासनया स्तब्धी-भावाद् अखण्डवस्तु-अनवलम्बनम् कषायः।
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन अपि चित्तवृत्तेः सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम्
रसास्वादः। समाधि-आरम्भसमये सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम् वा।।३२।।
अनुवाद-इसप्रकार इस मुख्य निर्विकल्पक (समाधि) के लय, विक्षेप,
कषाय और रसास्वाद (नामक) चार विघ्न होते हैं। अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का
आश्रय प्राप्त किए बिना, चित्तवृत्ति का निद्रा के वशीभूत होना तो 'लय'
(नामक विघ्न) है। अखण्डवस्तु को प्राप्त करने से पहले चित्तवृत्ति का
आनन्द (बाह्य सांसारिक) विषयों में अटक जाना 'विक्षेप' कहलाता है।
लय और विक्षेप के अभाव में भी चित्तवृत्ति का राग आदि संस्कारों से
जड़तावश अखण्डवस्तु (ब्रह्म) तक न पहुँच पाना ही कषाय है।
अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त किये बिना ही चित्तवृत्ति का
सविकल्पकसमाधि के आनन्द का आस्वादन ही 'रसास्वाद' (नामक विघ्न)
है अथवा समाधि के आरम्भिकसमय में 'सविकल्पकसमाधि के आनन्द से
ही संतुष्ट होना रसास्वाद' है।
'चन्द्रिका'- प्रमाता अधिकारी जब गुरु के उपदेश एवं श्रवण आदि
उपायों के अपने अभ्यास से सविकल्पक समाधि तक पहुँचकर, अपने
चरमलक्ष्य निर्विकल्पकसमाधि की ओर बढ़ता है तो इस मार्ग में उसे कुछ
व्यवधानों का सामना करना पड़ता है, जिनकी संख्या चार मानी गई है,
इनका विवरण क्रमशः इसप्रकार है-