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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 282 of 314

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Page 282

२६८ वेदान्तसार
प्रपञ्चमात्र हैं अर्थात् नाममात्र के लिए ही हैं। वास्तविकस्थिति में ये सब
एकमात्र परमब्रह्म के ही अलग-अलग नाम हैं, जो उसकी महिमा का कथन
करने के लिए कहे गए हैं। इसीप्रकार सविकल्पकसमाधि में जो ज्ञाता, ज्ञान
और ज्ञेय की भिन्नता की प्रतीति होती है, वह तो नाममात्र के लिए है।
वास्तव में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय ये तीनों और कुछ नहीं, अपितु एकमात्र ब्रह्म
ही हैं। इसलिए इस समाधि में भिन्नता में भी एकता विद्यमान रहती है।
जबकि निर्विकल्पक-समाधि में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय का भेद ठीक
उसीप्रकार समाप्त हो जाता है, जिसप्रकार जल में नमक डालने पर वह
उसमें पूर्णरूप से घुल जाता है, उसकी अलग से प्रतीति नहीं होती है,
केवल जलमात्र ही प्रतीत होता है। अतः निर्विकल्पकसमाधि में उस
अद्वैतवस्तु परमब्रह्म के आकार से आकारित चित्तवृत्ति का अलग से आभास
होना पूरी तरह समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में केवल अद्वितीयवस्तु
परमब्रह्म मात्र शेष बचता है, जिसका साधक को निरन्तर भान होता रहता
है।
तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति की अवस्था की
भिन्नता को स्पष्ट करते हैं। यद्यपि निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति दोनों में
ही वृत्ति का आभास नहीं होता है तथापि समाधि में वृत्ति की स्थिति
विद्यमान रहती है, किन्तु जल में 'नमक के समान' उसका अद्वैततत्त्व
परमब्रह्म के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण अलग से आभासित नहीं होता
है। इसके विपरीत सुषुप्ति की अवस्था में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता
है, क्योंकि वहाँ अन्तःकरण अपने कारणभूत अज्ञान में विलीन हो जाता है।
इसलिए अन्तःकरण की वृत्तियों का पूर्णरूप से अभाव होना स्वाभाविक है।
अतः निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति अवस्था दोनों को अभिन्न प्रतिपादित
करना भ्रान्ति ही है।
विशेष-(1) समाधि के भेदद्वय-सविकल्पक एवं निर्विकल्पक को
सोदाहरण समझाने के बाद सुषुप्ति अवस्था से निर्विकल्पकसमाधि का भेद
बताया गया है।
(2) निर्विकल्पकसमाधि के विषय में पञ्चदशीकार का कथन इसप्रकार
है-
“ध्यातृ ध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम्।
निर्वात दीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते।।"