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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished261 pages

८२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

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८२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

विद्याकर्मणी मोक्षप्रतिबन्ध- | विद्या और कर्म—ये दोनों मोक्षके
| प्रतिबन्धके हेतुओंको निवृत्त करने-
हेतुनिवर्तके इति चेत्-न, कर्मणः | वाले हैं [ मोक्षके स्वरूपको उत्पन्न
| करनेवाले नहीं हैं; अतः जिस
फलान्तरदर्शनात् । उत्पत्तिसं- | प्रकार प्रध्वंसाभाव कृतक होनेपर
| भी नित्य है उसी प्रकार उन प्रति-
| बन्धोंकी निवृत्ति भी नित्य ही होगी ]
स्कारविकाराप्तयो हि फलं | —यदि ऐसा कहो तो यह कथन
| ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोंका तो
कर्मणो दृश्यते । उत्पत्त्यादिफल- | अन्य ही फल देखा गया है । उत्पत्ति,
| संस्कार, विकार और आप्ति-ये
विपरीतश्च मोक्षः । | कर्मके फल देखे गये हैं । किन्तु
| मोक्ष उत्पत्ति आदि फलसे विपरीत है ।
गतिश्रुतेराप्य इति चेत् । | पूर्व०—गतिप्रतिपादिका श्रुतियों-
“सूर्यद्वारेण”, “तयोर्ध्वमायन्” | से तो मोक्ष आप्य सिद्ध होता
| है—"सूर्यद्वारसे”, “उस सुषुम्ना
(क० उ० २ । ३ । १६) इत्ये- | नाडीद्वारा ऊर्ध्वलोकोंको जानेवाला”
वमादिगतिश्रुतिभ्यः प्राप्यो मोक्ष | आदि गतिप्रतिपादिका श्रुतियोंसे
इति चेत् । | जाना जाता है कि मोक्ष प्राप्य है ।
न; सर्वगतत्वाद्गन्तृभिश्चा- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है;
नन्यत्वादाकाशादिकारणत्वात्स- | क्योंकि ब्रह्म सर्वगत, गमन करने-
| वालोंसे अभिन्न और आकाशादि-
र्वगतं ब्रह्म । ब्रह्माव्यतिरिक्ताश्च | का भी कारण होनेसे सर्वगत
सर्वे विज्ञानात्मानः । अतो ना- | है तथा सम्पूर्ण विज्ञानात्मा ब्रह्मसे
प्यो मोक्षः । गन्तुरन्यद्धिभिन्नं | अभिन्न हैं; इसलिये मोक्ष आप्य
| नहीं है । गमन करनेवालेसे पृथक्
देशं प्रति भवति गन्तव्यम् । न | अन्य देशमें ही गमन करने योग्य हुआ
हि येनैवाव्यतिरिक्तं यत्तत्तेनैव | करता है । जो जिससे अभिन्न होता

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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
गम्यते । तदनन्यत्वप्रसिद्धेश्च । है उसीसे वह गन्तव्य नहीं होता ।
"तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" और उसकी अनन्यता तो "उसे
(तै० उ० २।६।१) "क्षेत्रज्ञं रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया"
चापि मां विद्धि" (गीता १३।२) "सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ भी तू मुझको
इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः । ही जान" इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होती है ।
गत्यैश्वर्यादिश्रुतिविरोध इति पूर्व०-[ ऐसा माननेसे तो ]
चेत् । अथापि स्याद्यद्यप्राप्यो गति और ऐश्वर्यका प्रतिपादन करने-
मोक्षस्तदा गतिश्रुतीनां "स वाली श्रुतियोंसे विरोध होगा—अच्छा,
एकधा" (छा०उ०७।२६।२) यदि मोक्ष अप्राप्य ही हो तो भी
गतिश्रुति तथा "वह एकरूप होता है",
"स यदि पितृलोककामो भवति" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला
(छा० उ० ८।२।१) "स्त्री- होता है" "वह स्त्री और यानोंके
भिर्वा यानैर्वा" (छा० उ० ८। साथ रमण करता है" इत्यादि
१२।३) इत्यादिश्रुतीनां च श्रुतियोंका व्याकोप (बाध) हो
कोपः स्यादिति चेत् । जायगा ।
न; कार्यब्रह्मविषयत्वात्ता- सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वे तो
साम् । कार्ये हि ब्रह्मणि स्त्र्या- कार्य ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं ।
दयः स्युर्न कारणे । "एकमेवा- स्त्री आदि तो कार्य ब्रह्ममें ही हो
द्वितीयम्" (छा० उ० ६।२। सकती हैं, कारण ब्रह्ममें नहीं; जैसा
१) "यत्र नान्यत्पश्यति" कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म" "जहाँ
(छा० उ० ७। २४। १) कोई और नहीं देखता" "तब
"तत्केन कं पश्येत्" (बृ० उ० किसके द्वारा किसे देखे" इत्यादि
२।४।१४, ४।५।१५) श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri