तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों-
(मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों-
समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा
| नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका
नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही
एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष
| प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग'
अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म-
स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही
| मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना
त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ?
न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म
कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें
| किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले
फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो
विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी
अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें
| जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए
ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना
कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट
| कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका
कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है ।
रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले
५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]”
| “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए
(आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर
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अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७
स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों
शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके
| सद्भावकी सिद्धि होती ही है ।
इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों
| प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों-
क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म
| हैं-ऐसी बात हो तो ?
न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें
| न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा
णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द
| अनिष्टका ही सूचक है। नित्य-
विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो
प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है
| उसका नाश करनेके लिये ही
परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके
| कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये
गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते।
यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका
| फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन
र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी
| वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे,
प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो
विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका
| फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध-
कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे
उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है।
| विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका
धो युक्तः । | ही होना उचित है।
तै० उ० ३-४-
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