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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

About this granth

This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.

Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.

Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.

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२२० स्पन्दकारिका
अवस्थायें कितनी ही बदलती जायें किन्तु अवस्था नहीं बदलता । 'जाग्रत'
'स्वप्न', 'सुषुप्ति', 'तुर्य', 'तुर्यातीत' अवस्थाओं में अवस्थाता (प्रमाता = पशु) किन-
किन रूपों में अवस्थित होता है ?

अवस्थाआत्मा का स्वरूप-धारणअनुभविता
१. जाग्रत अवस्थाआत्मा = ज्ञेयपदार्थों का रूप धारण करने वालीआत्मा
२. स्वप्नावस्थाआत्मा = ज्ञान का रूप धारण करने वालीआत्मा
३. सुषुप्ति और तुर्यावस्थाआत्मा = चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान होने वालीआत्मा
(१) 'ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे जाग्रतत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम् ।'
(२) 'सुषुप्ततुर्यात्मके पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः ।'
(३) 'न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥'—'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट)
'ज्ञानरूपता' = स्वप्नावस्था से सम्बद्ध है ॥
'ज्ञेयरूपता' = जाग्रतावस्था से सम्बद्ध है ॥
'जाग्रत' 'स्वप्न' 'सुषुप्ति' = ध्यान-धारणा-समाधि ॥
'ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥' (का० १८)
(१) जाग्रत अवस्था में शक्ति का स्पन्दन (स्फुरणा) का रूप = 'ज्ञेयता' ।
(२) स्वप्नावस्था में शक्ति-स्फुरण संकल्प विकल्पात्मक 'ज्ञप्ति' ॥
(३) सुषुप्ति अवस्था में शाक्त स्फुरणा चिन्मय है किन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है ।
(४) तुर्यावस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी नहीं रहते अतः इसमें शक्ति स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ।
जाग्रत अवस्था—मेयभूमिरियं मुख्या जाग्रदाख्या' (तं० १०.२४०) ।
प्रमेयभूमिका के रूप में यह अवस्था मुख्य अवस्था है । विमर्श शक्ति (संवित् भट्टारिका) प्रमेय भूमिका पर अवरोहरण करती हुई प्रमेय, प्रमाण, प्रमा, एवं प्रमाता बन कर विश्व के रूप में स्पंदित होती है । इस अवस्था में वेद्य पदार्थ व्यावहारिक सत्य है अन्तः संवेदन ही वेद्य पदार्थ के रूप में रूपान्तरित होता है । इस अवस्था में स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति ही ज्ञेय (प्रमेय) बनकर प्रस्तुत करती है । आन्तर घट पट आदि वेद्य पदार्थों का अवभासन ही बाह्य घट, पट है—
'तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तः प्रवेदने ।
संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ॥
यन्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते ।
कथञ्चिदप्यधिष्ठातृ भावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥
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प्रथमः निष्यन्दः २२१
यह अवस्था अधिष्ठातृ नही अधिष्ठेय अवस्था है—
यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रतमुदाहृतम् ॥ (तं० १०.२३१)
स्वप्नावस्था—इस अवस्था में संवित् भट्टारिका विमर्श शक्ति वैकल्पिक ज्ञानरूप
में स्पन्दायमान होकर जाग्रत अवस्था के ही घट पटादिक प्रमेय पदार्थों को संकल्परूप से
अवभासित करती है । वही प्रमेय, प्रमाता, प्रमा सभी कुछ (स्वप्न में) बनकर अवस्थित
होती है । 'जाग्रतावस्था' प्रमेयप्रधान (ज्ञेय प्रमुख) होने के कारण 'प्रमेयपद' एवं
स्वप्नावस्था ज्ञानप्रधान होने के कारण 'प्रमाण पद'—कहलाती हैं । यह अधिष्ठानावस्था
है । निर्मल सुषुप्ति क्या है? स्वप्नावस्था के कारण उकार का मकार में, अभिमान के
कारण का बुद्धि में लय, बुद्धि आदि तीनों के प्रेरक मकारादि तीनों का सुषुप्तिस्थान भूत
तालूमूल में देहेन्द्रियवृत्तिरहित ज्ञेय-ज्ञातृ-ज्ञान की त्रिपुटी के रूप में अवस्थान ही 'निर्मल
सुषुप्ति' है । —'शैवपरिभाषा' ।
मुख्य सुषुप्ति अवस्था—यह पूर्णस्वाप की अवस्था है । यह प्रगाढ़ निद्रा नहीं है ।
यह समाधि की अवस्था है । इसे सुषुप्ति की अवस्था इसलिए कहते हैं क्योंकि—जाग्रत
एवं स्वप्न का अनुभविता चिन्मात्र रूप में स्थित रहकर जाग्रत के 'ज्ञेयरूप' एवं स्वप्न
के 'ज्ञानरूप' वेद्य पदार्थों के प्रति सुप्त हो जाता है । इसकाल में वेद्यता पूर्णतया
विगलित होकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है अपितु तब तक संस्कार रूप में
वर्तमान, रहती है । इसे ही 'मुख्य मातृ दशा' भी कहा गया है । इस अवस्था में
ज्ञेयरूपता एवं वैकल्पिक ज्ञानरूपता के समस्त क्षोभ शान्त हो जाने के कारण प्रमाता
मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहता है । अधिष्ठातास्वरूप (अन्तः संवेदनात्मक) प्रमेय-
भाव (बाह्य प्रमेय विश्व बीज) संस्कार रूपात्मक बन कर मानों गंभीर निद्रा में निमग्न हो
जाते हैं ।
यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
निर्मल जाग्रतावस्था (शैवपरिभाषा)—अकार-उकार-मकार-विन्दु-नाद से अधि-
ष्ठित शिवशक्तियोग से निर्मलान्तःकरण आत्मा हृदय में स्थित रहकर समस्त दृश्यमान
प्रपंच को शिवाकारतया वैषयिक सुख को स्वरूपानन्दतया अनुभव करता है और यह
अनुभव ही है—निर्मल जाग्रत अवस्था ॥ निर्मल स्वप्न क्या है? जाग्रतावस्था के कारण
अकार का उकार में, बाह्यविषयों के ग्राहक मन का अहंकार में, अहंकारादि-चतुष्टय
उकारादि चतुष्टय के साथ कण्ठ में 'सोऽहं' भावना के साथ अवस्थान ही निर्मल स्वप्न है।
तुर्यावस्था—सुषुप्तिकाल का प्रमाता जागृतावस्था में प्रमाता होते हुए भी
सुषुप्तिकालीन अनुभवों को जागृतावस्था में अनुभव नहीं कर पाता । सुषुप्तिकाल का
अन्त होते ही संस्कारानुगत वेद्यता पुनः उदित हो जाती है और चिन्मात्ररूपता भेदावृत हो
जाती है । इस समय विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं रह जाते । यह विशुद्ध
प्रमारूपा है—

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२२२ स्पन्दकारिका
'यत् प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम्।
पूर्णता गमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ॥—तत्तुर्यमुच्यते ॥ (तं०)
यही है शिवभाव में प्रवेश का द्वार। इस स्तर पर मायीय औदासीन्य शान्त हो
जाता है। स्पन्द सूत्र में इसे ही—ज्ञान क्रिया की शाश्वत स्पन्दात्मिका (शाक्त भूमिका)
विमर्श भूमिका कहा गया है। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थायें तुर्या में लय हो
जाती हैं और प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में, प्रमाता प्रमा में लय हो जाते हैं। यह
अवस्था साक्षात् शाक्त समावेशात्मक अभेद व्याप्ति की अवस्था है। यह चिन्मात्रस्वरूप
अवस्था है यह तीनों अवस्थाओं में व्याप्त रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है। तीनों
अवस्थायें इसी तुर्यावस्था में लयीभूत हो जाती हैं। यह अवस्था विशुद्ध प्रमारूप है और
रजशून्य, विमल, अखण्ड एवं चिन्मात्र है। यही मातृदशा भी है—
'मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ॥'
सुषुप्ति की अवस्था के लक्षण निम्नांकित हैं—
१) अनुभूतौ विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ॥ (तं०)
२) यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम्।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णीभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
तुर्यावस्था वह अकथ्यावस्था है जहाँ मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं
रह जाते। यह अवस्थात्रय का लयीभाव है। यहाँ प्रमेय प्रमाण में एवं प्रमाण प्रमाता में
लय हो जाता है—'मेयं माने मतरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम्। विश्राम्यति ... ॥'
यही है शक्तिसमावेद + शाक्तसमावेश युक्त अभेद व्याप्ति की दशा भी यही है—
'शक्तिसमावेशा ह्यसौ मतः ॥' (तं०) ॥
गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पन्द का अन्तर्सम्बन्ध—
गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ १९ ॥
गुणादि स्पन्दों (विशेष स्पन्दों) के प्रवाहों के 'सामान्य स्पंद' (प्रतिष्ठित स्पन्द) पर
आश्रित होने के कारण वे सदा उनसे ही अपना अस्तित्त्व प्राप्त करते हैं। (ये अनन्त एवं
नित्य प्रवहमान गुणादि विशेष स्पंद) तत्त्वज्ञों के (स्वरूप के) आच्छादक (परिपन्थी) नहीं
बना करते ॥ १९ ॥

  • सरोजिनी *
    स्पन्द अहं विमर्शात्मक हैं। 'स्पंद' विश्वोन्मुखी सङ्कल्पात्मक उन्मुखता है। इसका
    स्वरूप 'अहं प्रत्यविमर्श' है। 'स्पन्द' विमर्शरूप, उच्छलाना पूर्ण एवं सङ्कल्पात्मक हैं।
    अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं' के रूप में विमर्श करते हुए सर्वत्र अपनी
    ही अनुभूति 'पूर्णाहन्ता' है।
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प्रथमः निष्यन्दः २२३
गुणस्पन्दों के अनन्त प्रवाह हैं। स्पन्दशक्ति का प्रथम बहिर्मुखी निष्पंद प्राण हैं।
गुणस्पन्द = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण के स्पन्द ॥
अनन्त रूप में प्रवहमान अनन्त प्रकारक विकल्प-प्रत्यय ही विशेष स्पंद है।
निष्यन्द = प्रवाह । अपरिपन्थी = अनाच्छादक ॥ 'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—१.
सामान्य स्पंद, २. विशेष स्पंद। प्रतिष्ठित स्पन्द एवं अप्रतिष्ठित स्पन्द भी इन्हीं के
पर्याय हैं। गुणादिस्पंद ही विशेष स्पंद हैं।
अब ग्रन्थकार इस तथ्य को प्रतिपादित करता है कि सुप्रबुद्ध योगी को जागृति-
स्वप्न-सुषुप्ति, आदि-मध्य-अन्त आदि कोई भी अवस्था साधना-मार्ग में बाधा नहीं
पहुँचा पातीं। १
गुण = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण।
निष्यन्द-प्रवाह। ब्रह्माण्ड का बुच्छादितुच्छ पदार्थ से लेकर महनीय पदार्थ भी
स्पन्द शक्ति का ही एक प्रवाह है। स्पंद की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ जो कि गुणों के साथ
आरंभ होती हैं एवं जिनकी सत्ता व्यापक स्पंद तत्त्व पर आधृत है—ज्ञाता का विरोध
कभी नहीं करतीं। २
गुण = प्रकृति के गुणत्रय। मायातत्त्वावस्थित तीन गुण। 'स्वच्छन्दतन्त्र' में कहा
गया है—
अधश्छादयन् मूर्ध्वं च रक्तं शुक्लं विचिन्तयेत्।
मध्ये तमो विजानीयात् गुणास्त्वेते व्यवस्थिताः ॥ (२।६५) ॥
परिपन्थी = स्वस्वभावाच्छादक, विरोधी।
ज्ञ = सुप्रबुद्ध।
निष्यन्द = नीलसुखादि। स्पन्दों के प्रसर।
स्पन्द = कलादिक्षित्यन्त तत्त्व।
संश्रयात् = आश्रय ग्रहण करने से । ३
पारमेश्वरी, ज्ञान-क्रिया-माया शक्तित्रितय द्वारा सदाशिव आदि पद में स्फुरित होकर
सङ्कोच के प्रकर्ष द्वारा, सतोगुण—रजोगुण एवं तमोगुण रूपी क्रीड़ाशरीर का आश्रय
लेती है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' (३।३।४) में कहा गया है—
स्वांगरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या।
माया तृतीयेव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ (३।३।४) ४
शाश्वत एवं स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति जब बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होती है
तब उसका सर्वप्रथम परिणामन—प्राण के रूप में ही होता है।
'तेनाहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता ॥ (तं० ६.१२)


१-४. स्पन्दनिर्णय।

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२२४ स्पन्दकारिका
तस्योपलब्धिर्योक्ता सा गुणस्पन्दादिभिः स्थितैः ।
कुतस्त्या चेति साशंका ये तान् प्रत्युच्यते त्विदम् ॥
प्रश्न यह उठता है कि जब गुणस्पन्दादि अनेक पदार्थ स्थित हैं तब उसकी
उपलब्धि कहाँ । इस शंका पंक का प्रक्षालन करते हुए ग्रन्थकार—'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः
.... परिपन्थिनः ॥' कारिका कहता है ।
सत्त्व, रज एवं तम ये तीनों गुण एवं महान्, अहंकार आदि के जो स्पंद हैं उन्हीं
के निष्यन्द (प्रवाह)—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगें हैं । वे सामान्य स्पन्द के
अन्तर्लीन अनन्त विशेषों का आलम्बन प्राप्त करके ही सत्तावान् होते हैं । अतः तत्त्वज्ञ
योगी के स्वरूप में उनसे कोई व्यवधान नहीं पड़ता । वे योगी के विरोधी नहीं, प्रत्युत्
स्वरूप के विलास हैं । जैसे पुष्प का रस उसके स्वभाव का आच्छादक नहीं है उसी
प्रकार स्पन्द के निष्पंद अरविन्द के मकरन्द के समान ही हैं । एकसिद्ध ने कहा भी है—
'प्रकाश के राजमहल में प्रकाश्य वस्तु दिखाई नहीं पड़ती । अनन्त संविद् में
संवेद्य भी संविद्रूप है'—
'यद्गतप्रकाशभवने प्रकाश्यविषयो न दृश्यते मातः ।
संपर्कात्तव तद्वत् संविद्वेद्ये न भाव्यते जातु ॥'
'मातंगपारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह
जो विस्तीर्ण मार्ग है, वह चिद्वस्तु से सिद्ध होता है और उसी से जाना जाता है ।
गीता में भी कहा गया है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतत्तरन्ति ते ॥' (७।१४)१
गुणादि = सतोगुण रजो गुण एवं तमोगुण । ये गुणादि स्पन्द के निष्यन्द ही हैं
जो कि ज्ञाता पुरुष के परिपंथी (विरोधी) हैं ।
स्पन्दानाम = क्षेत्रज्ञ की ज्ञानादिक शक्तियों के ।
निष्यन्द = नाना अर्थों की ओर उन्मुख होने से प्रसृत प्रवाहों का समूह अर्थात्
विभिन्न प्रत्यय ही हैं 'स्पन्दनिष्यन्दः' 'निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसुताः प्रवाहा भिन्नाः
प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥'
गुणादि = गुण आदि ॥ महत्तत्त्व (प्रधान) जिससे किये गुणत्रय आविर्भूत होते हैं
तथा गुणत्रय ॥
सुखादिक से युक्त होने के कारण सत्त्वादिमय गुणादिक—
स्पन्दनिष्यन्द—'अहं सुखी, दुःखी मूढः' आदि अनेक प्रकार के ज्ञान-भेद । ये
किस रूप के हैं? 'सामान्यस्पन्दसंश्रयात् लब्धात्मलाभाः ॥' हैं ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलदेवाचार्य ।

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प्रथमः निष्यन्दः २२५
सामान्य अर्थात् सर्वव्यापक अन्तर्लीन अनन्त विशेष स्पन्द वाले एवं शक्ति-
स्फुरित परतत्त्व ।
संश्रयात्—सम्यक् रूप से अनन्यशरणतया श्रयण करने भजन करने के कारण ।
लब्धात्मलाभाः = जिन्होंने आत्मा का लाभ प्राप्त कर लिया हो वे लोग । लब्धः
आसादित । प्राप्त ।। (अपने स्वस्वरूप का लाभ या साक्षात्कार ।) 'ज्ञस्य' = ज्ञाता का ।
परमेश्वरानुग्रह से उदित हेयोपादेय प्रत्ययों के प्रमाताओं के भाव का । 'सामान्य स्पन्द' ही
परमेश्वर की मुख्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित निर्विकल्पप्रतिपत्ति (निर्विकल्प समाधि के) है
'सामान्यस्पन्द एवं परमेश्वरमुख्यशक्तित्वेन'¹ ।
तात्पर्य यह है कि जो कोई जिस किसी भी मायीय प्रमाता के सुखाद्यात्मक होने के
कारण जो गुणमय स्पन्दनिष्यन्द (जो कि प्रत्ययसंधान हैं) प्रसृत हो रहे हैं वे सभी एक ही
सामान्य स्पन्द का आश्रय लेकर उस आत्मतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं । जो 'प्रबुद्ध' हैं
उनके उदय से अभिज्ञ (प्रज्ञा पात्र) होने के कारण उन नित्योद्योगी लोगों के लिए ये
उत्पन्न नहीं होते । जो 'अप्रबुद्ध' हैं वे तो दुर्निवार प्रसर हैं । अप्रबुद्ध कौन हैं? पारमेश्वर
परानुग्रह से परित्यक्त होने से जिनकी प्रगाढ़ अज्ञाननिद्रा एवं धी (प्रज्ञा) विगलित (विनष्ट)
नहीं हो सकी वे ही हैं अप्रबुद्ध ।²
स्पन्द—(स्पन्द शक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखी निष्यन्द) = 'प्राणस्पंद'-५ स्थूल
प्राण, -सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण, मन, बुद्धि अहंकार (अन्तःकरण) वेद्य सुख, दुख,
मूढ़ता, अन्तःकरण के विषय, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, घट पट वेद्य विषय, समस्त
विश्व के अनन्त प्रमेयों का प्रतिसमय होने वाला प्रवाह । 'स्पन्दनिष्यन्द' = स्पन्द-प्रवाह ।
इन्हीं विशेष स्पंदों के पाश में समस्त जगत् जकड़ा हुआ है ।
विशेषस्पंदों की अनन्त अनेकाकारिता में सामान्य स्पन्द की एकाकारता
अनुस्यूत एवं प्रवाहित होती रहती है । जो विशेष स्पन्द हैं उनके अनन्त रूपों में शिव
की शक्तियाँ ही प्रवाहित होती हैं ।
सुप्रबुद्ध योगियों की भूमिका = तुर्यरूप शाक्त भूमिका ।।
एकात्मकता में अनेकात्मकता <———— एकात्मक सामान्य स्पन्द
एवं अनेकात्मकता में
एकात्मकता ——— प्राण, इन्द्रयाँ, पंचभूत,
तन्मात्राएँ, घट, पट, सुख,
दुःख आदि
अनन्त 'विशेष स्पन्द'
(समस्त विकल्प) ।।
अबुद्धों की भूमिका = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं विशेष स्पंदों की भूमिका ।।


१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
स्पं० १५

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२२६ स्पन्दकारिका
समस्त 'विशेष स्पन्द' भी 'सामान्य स्पन्द' के ही बाह्य रूपान्तर हैं क्योंकि—
१) 'स्वयं बध्नाति देवेशः स्वयं चैव विमुह्यते ।
स्वयं भोक्ता स्वयं ज्ञाता स्वयं चैवोपलक्षयेत् ॥'¹
२) स एष विश्वनाटकशैलूष शुद्धसंविच्छंभुः ।
वर्णकपरिग्रहमयी तस्य दशा कापि पुरुषो भवति ॥'²
'पूर्णाहन्ता' (एकात्मक) में 'विश्वविकल्प' (अनन्त विकल्प) स्थित है अतः
'एक' में अनेक अनुस्यूत है—
'पूर्णाहन्ताया मुखे विश्वविकल्पांकुराणां विक्षेपम् ॥'³
'स्पन्द' के दो रूप हैं?
स्पन्द
┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
'सामान्य स्पन्द' 'विशेष स्पन्द'
(प्रतिष्ठित स्पन्द) (अप्रतिष्ठित स्पन्द)
'सामान्य स्पन्द'—समस्त नामरूपात्मक सत्ताओं की अनेकता की माला में ग्रंथित
सर्वानुस्यूत, सार्वभौम वह अद्वैत चेतना-सूत्र है जो कि समस्त फूलों की अनेकता में
एकता की प्राणधारा प्रवाहित करता है । वह विराट् चेतना की वह अद्वितीय एवं एकात्म
इकाई है जो समस्त भेदों में अभेद, द्वैतों में अद्वैत एवं अनेकताओं में एकता का सञ्चार
करती है । इसे ही 'प्रतिष्ठित स्पन्द' भी कहते हैं । यह समस्त सत्ताओं का सामान्य धर्म
है—उनकी सर्वजनीन चेतना है—सर्वगत सामान्य शक्ति है ।
विशिष्ट स्पन्द = मायातत्त्व से पृथ्वी पर्यन्त प्रसृत भेदों-उपभेदों से युक्त समस्त
विश्व का अनेकत्व ही विशिष्ट स्पन्दता है । 'विशिष्ट स्पन्द' सामान्य स्पन्द की खण्डित
इकाइयाँ हैं । एकत्व से निःसृत अनेकत्व है । सूत्रकार ने इसे 'स्पन्द-निष्यन्द' (अनेक
रूपों में प्रवहमान स्पन्द धारायें) कहा है । विश्व का प्रत्येक पदार्थ विराट् स्पन्द शक्ति की
एक विशिष्ट धारा है । इन विशिष्ट स्पन्दों में अनुस्यूत एवं पारमेश्वरी 'सामान्य स्पन्द
शक्ति' ही है ।
प्राणस्पन्द—स्पन्दात्मिका संवित् (स्पन्दशक्ति) बाह्यप्रसरोन्मुख होने पर सबसे
पहले 'प्राण' (विश्वचेतनात्मक सूक्ष्म प्राण) के रूप में परिणत होती हैं—'तेनाहुः किल
संवित् प्राक् प्राणोपरिणता' 'संवित्' प्रकाशात्मिका एवं विमर्शमयी दोनों हैं । संवित्
अनेक स्तरों पर अवरोहण करके पृथग्भूत वेद्यांशों के माध्यम से सूक्ष्म से स्थूल
भूमिकाओं पर आरूढ़ होकर विश्वप्राण के रूप में उच्छलित होती हैं । प्राणि जगत् में प्राण
(विश्व प्राणना) का रूप धारण करके अवतरित होना संवित् का प्रथम बहिर्मुखी
'निष्यन्द' हैं । यही है 'प्राणस्पन्द' । यह समष्टिगत विश्व प्राण—पञ्च स्थूल प्राणों का
────────────────────────────────────────────────────────────
१. परिमल । २-३. महार्थमञ्जरी

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प्रथमः निष्यन्दः २२७
रूप धारण कर लेता है । यह स्पन्द शक्ति 'प्राणस्पन्द' के रूप में रूपान्तरित होने के
अनन्तर अनेक रूपों में पर्यवसित होती है । स्पन्दनिष्यन्द—गुणत्रय, अन्तःकरणचतुष्टय,
११ इन्द्रियाँ अर्थात् आब्रह्मस्तंबपर्यन्त विश्व के प्रत्येक प्रमेय, सीमितप्रमाता, प्रमा, एवं
प्राणियों के अनन्त भावों में यही स्पन्दशक्ति प्रवाहित होती है । 'स्पन्द-निष्यन्द' इन्हीं
अनन्त स्पन्द प्रवाहों को कहते हैं । पशुभूमिका में अन्तः प्रवहमान यह स्पन्द-प्रवाह ही
माया, बन्धन, अज्ञान एवं अविद्या का कारण है ।
'संवित्' की प्रथम परिणति प्राणस्पन्द या प्राण के रूप में ही होती है ।
प्रकाशविमर्शमय संघट्ट ही आनन्द शक्ति है और विश्व के अनन्त भेदों में स्पन्दित होना
ही इसका स्वभाव है । इसीलिए कहा जाता है कि संवित् प्रतिक्षण उद्वलनात्मक है ।
उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण यह विशुद्ध प्रकाशस्वरूपा संवित् शक्ति विशेष स्पन्दों में
अविश्रान्त प्रवहमान है। अपने में अभिन्नतया अवस्थित वेद्यभाग को अपने से पृथक् करके
तथा अपने स्वरूप में अविचलित रूप में पूर्णतः अवस्थित रहकर यह स्पन्द शक्ति
विश्वातीत एवं विश्वमय दोनों स्वरूपों में क्रीड़ारत है ।
पशुभूमिका में यह स्पन्दशक्ति अपने व्यष्टिगत प्रवाहों द्वारा जीवों को बन्धन में
डालती है तथा सुप्रबुद्ध भूमिका में एक योगी विशेष स्पन्दों की विभिन्नता एवं अनेक
रूपात्मकता में भी सामान्यस्पन्द की एकाकारता का अनुभव करता है । विशेष स्पन्दों के
रूप में प्रवहमान अनन्त नामरूप (विशेष स्पन्दों के अनन्त रूप) केवल शांकरी शक्तियाँ
ही तो हैं ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के रूप में प्रवहमान
गुणस्पन्दों की अनन्त धारायें 'सामान्यस्पन्द' पर ही आधृत है । ये विशेष स्पन्द चिन्मय
स्वभाव पर आवरण डालकर उसके मार्ग के प्रतिबन्धक नहीं बन सकते । पूर्ण शाक्त
समावेश होने पर सामान्य स्पन्द स्वभाव की अनुभूति को विशेष स्पन्द के अनन्त प्रवाह
कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते—
'गुणस्पन्दस्य सत्वरजस्तमोरूपस्य ये निष्यन्दाः प्रवाहाः ते सामान्यस्पन्दमाश्रित्य
प्रसृता अपि सततं ज्ञस्य विदितवेद्यस्य योगिनः स्युर्भवेयुः, भवन्त्यपरिपन्थिनः अना-
च्छादकाः स्वभावस्यः' ।¹
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥'२
परमात्मा की द्विविधात्मक सृष्टि एवं उनमें अनुस्यूत अवस्थायें तथा स्पंदः जिस
'सामान्य' एवं 'विशेष स्पन्द' का विवेचन किया गया है उसका सृष्टि के स्वरूप से गंभीर
संबन्ध है—सृष्टि के दो रूप हैं—१) आदि सर्ग, २) परवर्ती ।
१) 'तन्त्रालोक' की 'विवेक' (१.१३५) नामक व्याख्या में आचार्य जयरथ कहते
हैं कि विश्वनिर्माण के इच्छुक परमेश्वर प्रथमतः स्वाव्यतिरिक्त विश्व का सृजन करता है ।


१. स्पन्दसर्वस्व (भट्टकल्लट) । २. स्पन्दकारिका ।

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२२८ स्पन्दकारिका
यह स्वाभिन्न (परमेश्वराभिन्न) सृष्टि 'आदिसर्ग' है—'विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं
स्वाव्यतिरिक्तमिव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदिसर्गः' ।।
२) इस आदिसर्ग के बाद—'अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा
स्वस्वातंत्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्यग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति ॥' (विवेक)
१) 'आदिसर्ग' = विश्वावभासन करने की सङ्कल्पात्मक उन्मुखता के काल में
प्राथमिक अवभासन परमात्मा के स्वरूप से अभिन्न (तद्रूप) 'अहंविमर्श' के रूप में हुआ
करता है । यही आदि सर्ग है ।
२) इसके अनन्तर परमात्मा अपनी स्वसमवेता 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के विकसित रूप
'मायाशक्ति' के द्वारा अपने स्वस्वरूप पर ही आवरण डालकर अपने स्वरूप रूपी दर्पण
में अनन्त ग्राहकों एवं ग्राह्यों का अवभासन करता है और इस प्रकार परमात्मा ही तीन
रूपों से अवभासित होता है—१) पतिप्रमाता २) पशुप्रमाता ३) जड़ात्मक प्रमेय ।
आदिसर्ग की परवर्ती समस्त नानात्मक सृष्टि—'विशेष स्पंद' के अन्तर्गत है । गुणादि-
स्पंदों को ही 'विशेष स्पंद' कहा गया है । शाश्वत कर्तृता शक्ति का स्वरूप 'अहं-
विमर्शात्मक स्पन्द' है । यही 'महासत्ता' भी है । गुणादि एवं तज्जन्य स्पन्द 'विशेष
स्पन्द' है क्योंकि उनमें सामान्यता का नहीं 'विशेषता का भेद' अवस्थित रहता है । १
विशेष स्पन्दों के लक्षण और प्रभाव—
अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ।
पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ २० ॥
ये (गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष स्पन्द) स्वरूप (आत्मा) की यथार्थ स्थिति
(चिन्मात्रता) पर आच्छादन डालने पर (सदैव) प्रयत्नरत रहते हैं । अतः ये (विशेष
स्पन्द) अज्ञानावृत बुद्धि वाले पशुओं को दुस्तर एवं भयङ्कर जगद्रूप मार्ग में फेंक
देते हैं ॥ २० ॥

  • सरोजिनी *
    गुणादि रूपों में प्रवाहित विशेष स्पन्द अल्पज्ञ पशुओं (मितप्रमाताओं) की यथार्थ
    चिद्रूपता पर आवरण डालकर उन्हें अनतिक्रम्य, दुस्तरणीय एवं भयावह जगत् के
    कण्टकाकीर्ण मार्ग पर डालकर उन्हें पथभ्रष्ट कर देते है । वे अबुद्ध पशु के स्वरूप
    (आत्मस्वरूप) को प्रत्येक क्षण आच्छादित करते हैं जिससे पशु स्वरूप को गुणादि
    विशेष स्पन्दों के रूप में देखते हैं न कि शुद्धबुद्धस्वरूप वाले आत्मा के रूप में
    भट्टकल्लट ने कहा है—
    'यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति न शुद्धबुद्धस्वरूपतया ॥'
    (मा० वि० ३.३१) में भी कहा गया है—
    १. स्पन्दकारिका (१४) में स्पन्दकी अन्य दो अवस्थायें बताई गई हैं—
    (१) 'कर्तृत्व', (२) 'कार्यत्व' ।
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प्रथमः निष्यन्दः २२९
'विषयेष्वेव संलीनामधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
'स्वस्थितेः' = चिद्रूप आत्मा का ।। स्वरूप (आत्मा) की वास्तविक स्थिति का ।।
ते = वे गुण (गुणादि·स्पन्द) ॥
'अप्रबुद्ध' = अज्ञानी ।। अप्रत्यभिज्ञात पारमेश्वरी शक्त्यात्मकनिजस्पन्द तत्त्व वाला
देहात्माभिमानी, प्राणात्माभिमानी लौकिक पुरुष ।
धी = बुद्धि ।। शक्ति-चित, निवृत्ति-इच्छा, ज्ञान, क्रिया ।
माया = कला, विद्या, राग, काल, नियति ।।
एते = ये ।। पूर्वोक्त गुणादिस्पन्द निष्यन्द ।
स्वस्थितिस्थगनोद्यताः = अपनी पारमात्मिकी स्थिति पर आवरण डालकर अपने
को बन्धन ग्रस्त करने हेतु प्रयत्नशील ।।
स्थगन = अपनी स्पन्दतत्त्वात्मा स्थिति को रोकना ।।
दुरुत्तार = 'दैशिकैः जन्तुचक्रं लंघयितुं अशक्ये' अलंघ्य ।।
संसारवर्त्मनि = संसरणमार्ग में । संसार के पथ में ।
दुरुत्तार = कठिनाई से पार होने योग्य ।। पातयन्ति = (ये स्पन्द-निष्यन्द दुरुत्तार
घोर संसार मार्ग में) गिराते हैं । श्री 'मालिनीविजय' में कहा भी गया है—
'विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
स्पन्द तत्त्वात्मा पराशक्ति जगत् तो अन्दर एवं बाहर वमन करने और वामाचार के
कारण 'वामेश्वरी शक्ति' कहलाती है । यही शक्ति खेचरी-गोचरी-दिक्केरी-भूचरी चार
रूपों वाले देवताचक्र को जन्म देकर सुप्रबुद्धों को उनके द्वारा परम भूमि में पहुँचाती है
किन्तु अप्रबुद्ध लोगों को इन्हीं शक्तियों के द्वारा अधोलोक एवं अधपतन के मार्ग में
गिराती है । जिस प्रकार 'खेचरी' (खे = गगन में । चरी = संचरण करने वाली) ज्ञानियों
को सर्व-कर्तृत्व—सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-व्यापकत्व प्रथा कर्त्री है उसी प्रकार वही अप्रबुद्धों
को—किंचि-त्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञता आदि प्रदान करती है ।
१) 'गोचरी'—गोर्वाक तदुपलक्षितासु सङ्कल्पमयीषु बुद्धयहंकारमनोभूमिषु चरन्त्यो
गोचर्यः सुप्रबुद्धस्य स्वात्माभेदमयं अध्यवसायाभिमानसंकल्पान् जनयन्ति मूढ़ानां तु
भेदैकसारान् ॥
२) 'दिक्केरी' = दिक्षु दशसु बाह्येन्द्रियभूमिषु चरन्त्यो दिक्पर्यः सुप्रबुद्धस्य
अद्वयप्रथासाराः अन्येषां द्वयप्रथाहेतवः ।१
३) 'भूचरी' = भूः रूपादि पंचकात्मकं मेयपदं तत्र चरन्त्यो भूचर्यः तदाभोगमय्या
आश्यानीभावतया तन्मत्वं आपन्नाः भूचर्यः सुप्रबुद्धस्य चित्प्रकाशशरीरतया आत्मानं
दर्श- यन्त्य इतरेषां सर्वतो अपि अवच्छिन्नतां प्रथयन्त्यः स्थिताः ॥२
१. स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।

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२३० स्पन्दकारिका
'खेचरी', 'गोचरी', 'दिक्धरी' एवं 'भूचरी'—शक्ति चक्र अन्तःकरण एवं
बहिष्करण प्रमेय रूप से गुणादिस्पंद युक्त अप्रबुद्ध लोगों को बिन्दुनादादि प्रथामात्र से
संतुष्ट योगियों को संसार में अधःपतित करती रहती हैं ।१
मूढ़ पुरुष के लिए ये ही स्पन्द-निष्यन्द चित् स्वरूप के आच्छादक बन जाते हैं
क्योंकि वह मूढ़ बुद्धि पुरुष अपने को गुणात्मक दी देखता है शुद्ध बुद्ध नहीं ।२ कहा भी
गया है—'जैसे बालक स्वच्छ दर्पण को अपने ही श्वासों से मलिन कर देता है वैसे ही
अज्ञानी अपने विकल्पों से विज्ञान को मलिन कर देता है ।३ इसका परिणाम यह होता है
कि वे जन्म-मरण के संसार-प्रवाह में भेद दिये जाते हैं । उस प्रवाह में अत्यन्त क्लेश है
और दुस्तर भी है—
'यथादर्श शिशुः स्वच्छं निःश्वासैर्मलीम सम् ।
करोति तद्वद्विज्ञानं स्वविकल्पैर्जडाशयः ॥'४
'ज्ञानसंबोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही
आत्म शक्ति से संचालित होते हैं तथापि एक स्वतन्त्र है और द्वितीय परतन्त्र है ।
शुद्धबोध पुरुष विषम स्थल में भी साक्षी की भाँति स्वतन्त्र रहता है । मन्दबोध पुरुष
अंधे के समान समस्थल में भी परतन्त्र होता है—५
यद्यपि स्वात्मशक्त्यैव गतिः साक्ष्यनयोर्द्वयोः ।
तथाप्येकः स्वयं याति द्वितीयोऽन्येन नीयते ॥
साक्षिवत् स्फीतबोधानां स्वातन्त्र्यं विषमेष्वपि ।
अंधवन्मन्दबुद्धीनां पारतन्त्र्यं समेष्वपि ॥६
'अप्रबुद्ध' = पारमेश्वर परानुग्रह से शून्य । अज्ञानात्मक बुद्धि वाले हैं । ये
गुणदिस्पन्द निष्यन्द ऐसे अप्रबुद्ध लोगों को घोर (विभीषिकाशतसंकुल एवं दारुण) एवं
दुरुत्तार (दुस्तीर्ण = दुर्लंघ्य) संसारवर्त्म (जन्ममरणादि प्रबन्ध मार्ग) में अनवरत रूप से
भटकाते रहते हैं—अधःपतित करते रहते हैं ।
ये कैसे हैं? 'स्वस्थितिस्यगनोद्यताः ।।'
स्व (परमात्मा) में सामान्यस्पन्द मात्र कर्म में स्थिति अर्थात् निर्विकल्प प्रतिपत्ति से
उत्पन्न सुस्थिर प्रतिष्ठा वाले । 'उद्यताः' = प्रतिपक्षभूत प्रबोध के उदित न होने के कारण
विशेषस्पन्द में प्रसरणशील ॥
अप्रबुद्ध लोगों में सर्वकर्तृत्वादि लक्षण वाले सामान्यस्पन्द रूप महिमा रहते हुए
भी समस्त कार्यों में परतन्त्र, अनात्मक देहादि को अपनी आत्मा समझने वाले, लब्ध-
प्रसर, — 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, – आदि गुणप्रधान प्रत्यय प्रवाह वाले ये लोग संस-
रणमार्गोपेत नश्वर संसार प्राप्त करते हैं । इस उपदेश के विषय केवल प्रबुद्ध है अप्रबुद्ध
नहीं । ये कभी भीतर विश्राम नहीं कर पाते । कहा भी गया है—७
१. स्पन्दनिर्णय । २-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
७. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३१
ज्ञेयत्वमप्युपगता हृदये न रोढुं, शक्ताः प्रमूढ़ मन मनसामुपदेश वाचः ।
आर्द्रत्वमादधति किं नलिनीदलानां, श्लिष्टाः निरन्तरतयापि नभोऽम्बुधाराः ॥
विशेष स्पन्द और उसकी भूमिका—
'विशेष स्पन्द' सामान्य स्पन्द के विपरीत व्यष्टिगत होते हैं और विशिष्ट धर्म
विशिष्ट लक्षण एवं विशिष्ट वैलक्षण्यों से युक्त होते हैं। इनका एक विशेष स्वभाव यह है
कि ये प्रत्येक क्षण पशुओं की चिन्मात्र आत्मसत्ता के ऊपर आवरण डालने में व्यापृत
रहते हैं।
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में इसके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुआ कहा
है—'स्वल्पप्रबोधांस्तु स्वस्थितेः चिद्रूपायाः स्थगनं कृत्वा, ते गुणाः पातयन्ति दुरुत्तारे
अस्मिन् विषमे संसारवर्त्मनि, यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति, न तु शुद्धबुद्ध-
स्वरूपतया ॥'१
सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण आदि गुणों में प्रवहमान विशेष स्पन्द प्रति काल खण्ड
चिन्मात्र आत्मस्वरूप पर आवरण डालने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं। परिणाम
यह होता है कि दुस्तर संसार के मार्ग पर पशुओं को चलाकर ये 'विशेष स्पन्द' उनका
अधःपतन करते रहते हैं 'विषयेष्वेव संलीनानधोधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् याः
समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा०वि०)
अप्रबुद्ध = स्वप्न प्रबुद्ध ॥ स्वस्थितेः = चिद्रूप आत्मा का स्थगनोद्यता =
स्थगन करने के लिए प्रयत्नशील । ते (गुणाः) पातयन्ति = वे गुण अधःपतित कर देते
हैं । दुरुत्तार = दुस्तर । घोर = भयानक । भट्ट कल्लट—'क्योंकि पशुगण सारी
सत्ताओं एवं भावों को गुणान्वित ही देखते हैं। आत्मा को भी तदात्मक देखते हैं न कि
उसे शुद्ध बुद्ध स्वरूप की दृष्टि से ॥'
(१) 'शक्ति' बहिर्मुखी प्रसार करने की स्थिति में सदैव चिदात्मा पर आवरण
डाल-कर उसके स्वरूप को छिपाना एवं अंधकारावृत रखना चाहती है।
(२) बाह्योन्मुख स्पन्द-प्रवाह पंच कंचुक, देह, पंचभूत, विषय, आदि के
आवरणों के रूप में प्रकट होकर चिदात्मा के चतुर्दिक ऐसा आवरण डाल देता है कि
पशु आत्मस्वरूप को विस्मृत करके अनात्मा में आत्माभिमान करने लगता है। यही
बाह्योन्मुखी शक्ति सुख, दुःख, शोक, मोह, क्रोध, ममत्व आदि के रूप में रूपान्तरित
होकर इन सारी वृत्तियों से पशुओं की आत्मा को क्षुब्ध करती रहती है। पशुओं की यही
अधोगति 'शक्ति दारिद्र्य' कहलाती है। इस स्तर पर ज्ञान-क्रिया-विभुता-इच्छा-तुष्टि
आदि सभी की असीमता ससीमता (या संकोच) में परिवर्तित हो जाती है। पशु सर्वज्ञ से
अल्पज्ञ, सर्वकर्ता से अल्पकर्ता, सर्व व्यापक से किंचिद् व्याप्त एवं स्वतन्त्र से परतन्त्र
बन जाता है। परम शुद्ध चिदात्मा शिव पराधीनता के पथ का पथिक बन जाता है।
'अवरोहण' की यह अधोगामिनी क्रीड़ा पशुपति को पशु बना देती है।
१. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व'।

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२३२ स्पन्दकारिका
अवरोहण की पतनोन्मुख प्रक्रिया—
स्पन्दनात्मिका चित् शक्ति का अशुद्धाध्व (माया से पृथ्वी तत्त्व) के मार्ग पर चल
कर 'माया' का रूप धारण करना चिन्मात्र (शिवांश) आत्मा की चिन्मात्रता को ढककर
उसे शिवभाव से पृथक् कर देना—चित, आनन्द-इच्छा-ज्ञान-क्रिया को कला, विद्या,
राग, काल, नियति (पञ्चकञ्चुक) के मार्ग पर यात्रा कराना—सर्वकर्तृत्व को अल्पकर्तृत्व,
सर्वज्ञत्व को अल्पज्ञत्व, संतृप्ति से अतृप्ति, नित्यत्व को अनित्यत्व, व्यापकता को
अव्यापकता में रूपान्तरित करना एवं आणव मल, मायीय मल एवं कार्ममल को
आविर्भूत करके स्वतन्त्र शिव को पराधीन पशु बना देना—आदि के द्वारा अवरोहण
प्रक्रिया निष्पादित होती है। 'लोलिका' (निष्कर्म अभिलाषा, अस्पष्ट आकांक्षा) क्षोभ
उत्पन्न करके स्थूल अभिलाषा को जन्म देकर (राग तत्त्व के) उत्पाद के रूप में देता है।
यही राग सारे बन्धनों का कारण है।
जाग्रत् अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय—
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्द तत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ २१ ॥
इसलिए (पूर्वोक्त कारणों से) स्पन्दतत्त्व स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर
प्रयत्नरत (योगी) जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव (स्पन्द तत्त्व) को शीघ्रता पूर्वक प्राप्त
कर लेता है ॥ २१ ॥

  • सरोजिनी *
    जो साधक स्पन्दात्मक पर संवित् को अधिगत करने की आकांक्षा रखते हों उन्हें
    चाहिए कि वे स्पन्द तत्त्व की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। 'शिव-
    सूत्र' (२.२) में—'प्रयत्नः साधकः' कहकर भी इसी तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
    प्रतिक्षण सङ्कल्पविकल्पात्मक चित्त को आन्तर अनुसंधित्सा (गवेषणा) अर्थात्
    सद्विमर्श—की शक्ति के द्वारा सामान्य स्पन्दस्वरूप, विकल्प शून्य परसंवित् पर तत्त्व में
    विलीन करने का अकृतिक (अकृत्रिम) प्रयास ही 'प्रयत्न' है आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्र-
    विमर्शिनी' (२।२) में कहते हैं—
    (१) मन्त्रस्य अनुसंधित्सा प्रथमोन्मेषावष्टम्भप्रयतनात्मा अकृतिको यः प्रयत्नः स एव
    साधकों (मन्त्रयितुर्मंत्रदेवता तादात्म्यप्रदः)।
    (२) अकृतिकनिजोद्योग बलेन योगीन्द्रो मनः कर्मबिन्दुं विकर्षयेत् परप्रकाशात्मतां
    प्रापयेत्। 'प्रयत्नोऽन्तः स्वरंभः स एव खलु साधकः। यतो मन्त्रयितुर्मन्त्रदेवतैक्यप्रदः
    स्मृतः ॥ (वार्तिक)—शिवसूत्रवार्तिक ।
    इस श्लोक में अज्ञानी के संसार से पार होने की युक्ति को इस प्रकार समझाया
    गया है—
    'अतः जबकि जाग्रत् अवस्था में भी कोई साधक जो कि स्पंद तत्त्व के सुस्पष्ट
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प्रथमः निष्यन्दः २३३
साक्षात्कार के लिए सदा प्रस्तुत रहता है । (तब) वह बहुत शीघ्र ही अपने यथार्थस्वरूप
का साक्षात्कार कर लेता है ।'१
अतः = इसलिए ।
सततमुद्युक्तः = लगातार प्रयत्नरत ॥
विविक्तये = विमर्शन के लिए । स्वरूपाभिव्यक्ति हेतु ।
जाग्रदेव = जागृत् अवस्था में ही ।
निजंभावं = आत्मीयशङ्करात्मकस्वस्वभाव को ।
अधिगच्छति = प्राप्त कर लेता है ।२
जो योगी अबाधित रूप में अहर्निश सदैव अंतर्मुखस्वरूप एवं निभालनप्रवण
रहता है—'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते' (१२।२)—ऐसा योगी अपने
आत्मीय शङ्करात्मक स्वस्वभाव को बहुत शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है । तथा उसकी
शङ्करात्मा आन्तर स्वभाव स्वयं उन्मज्जित होता है जिससे कि नित्योदित समावेश को
प्राप्त करने से सुप्रबुद्ध या 'जीवन्मुक्त' हो जाता है ।३
स्पन्द के निष्यन्द अज्ञानी को सर्वदा पतित बनाने हेतु उद्यत रहते हैं । अतः अपने
विकस्वर स्वभाव से स्पन्दतत्त्व का विवेक करने हेतु सदैव उद्योग करते रहना चाहिए ।
इसीसे स्वरूप की अभिव्यक्ति होती है । वस्तुतः अपना स्वरूप उद्योक्ता है, विकस्वर
है—शिव है । शिवसूत्रों में 'उद्योग' को शिव कहा गया है—'उद्योगः शिवः' । अतः
जाग्रतावस्था अर्थात्—व्युत्थानावस्था में शीघ्र से शीघ्र उसे अपने स्वरूप का अधिगम हो
जाता है । जो लगा रहता है; वह जागता रहता है । इसका विवेचन इस प्रकार है ४—'मैं
हूँ शुद्धबोधैकस्वरूपा यह जगत् मेरा विस्तार है, विलास है, जुंभा है, मुस्कान है । यह
सब मेरा वैभव है ।'—ऐसा ज्ञान हो जाने पर वह विश्वात्मा हो जाता है और विकल्पों के
विस्तार में भी वह महेश्वर ही रहता है ।'—
'सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः ।
विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥'५
'पञ्चरात्र' में भी कहा गया है—जब आत्मा में समस्त भूतों को देखता है और
अपने को उनमें देखता है तथा अपने को तब उनसे पृथक् देखता है तब जनम-मरण से
मुक्त हो जाता है—
'यदात्मनि सर्वभूतानि पश्यत्यात्मानं च तेषु पृथक्च तेभ्यस्तदा मृत्योर्मुच्यते
जन्मनश्च' ।
अन्यत्र भी कहा गया है—तुम निर्मल, अनन्त एवं एकमात्र बोधस्वरूप हो ।
भव्यबुद्धि सावधान पुरुष तुम्हें ज्ञाता और ज्ञेय दोनों में ही देख लेता है ॥'—६
'निर्मलानन्त्य बोधैकरूपत्वं भव्यबुद्धिभिः ।
वेद्याद्वा वेदकाद्वापि लभ्यसेऽवहितात्मभिः ॥'
१-३. स्पन्दनिर्णय । ४-६. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

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२३४ स्पन्दकारिका
'तत्वार्थचिन्तामणि' में भी कहा गया है कि—विवेक के द्वारा विशाल मोहान्धकार
का विदलन हो जाने पर योगी के स्वरूप का उदय हो जाता है । अनात्मभाव का
तिरस्कार हो जाने के कारण वह प्रत्येक दशा में अपने परमानन्दस्वरूप में मग्न रहता है ।
वह द्रष्टा-दृश्य के विवेक का रहस्य समझ गया । संसार का ऐसा कोई क्ष्मा करण या
कोण नहीं है जहाँ वह नहीं है भवरोग मिट गया । उसके व्युत्थान में भी समाधि है ।
सच्ची मोक्षलक्ष्मी तो उसकी आत्मजा है—१
इत्थं तत्तदनल्पमोहदलनप्राप्तस्वरूपोदयो,
योगी नित्यमनात्मभावविरहात् स्वात्मस्थितो निर्वृतः ।
दृश्य द्रष्टृ विवेकविद्धवपदव्यापी विमुक्तामयो,
व्युत्थानेऽपि समाधिभागभवति सन्मोक्षश्रियः कारणम् ॥
अब ग्रन्थकार, 'ज्ञान ज्ञेय .... चिन्मयः' कारिका में प्रबुद्ध योगी के लिए उपक्रान्त
उपदेश्यत्व की पुष्टि करके अगली तीन कारिकाओं में अप्रबुद्धों के प्रतिषेध के विषय में
कह रहा है ।'
'अतः ...... अधिगच्छति ॥'—
अतः = इसलिए । प्रस्तुत व्याख्यान में श्लोकत्रय में निर्दिष्ट होने के कारण
जाग्रदेव = जागते हुए ही । अर्थात् प्रबुद्ध ही ।
निजं भावं = आत्मीय पारमार्थिकी सत्ता ॥ अचिरेण = शीघ्र ही । अल्पीयस
काल में । अधिगच्छति = सम्यक् रूप में उपलब्धि के द्वारा स्वीकृत करता है । (एव-
कारेणाप्रबुद्धं व्यवच्छिनत्ति) ॥ कैसा होकर स्वीकार करता है—'स्पन्दतत्त्वविविक्तये
सततमुद्युक्तः ॥'
स्पन्दस्य = स्पन्द का ॥ पर शाक्ततत्त्व का, उपचरित सामान्य विशेषात्मक रूप
से दो प्रकार से व्याख्यास्यमान तत्त्व का । वह तत्त्व परमार्थ है और उपादेय एवं हेय के
रूप में उसका रूप निश्चित है । विविक्तये = विवेक अर्थात् पृथक्करण के लिए ।२
परमकारणभूत, आत्मस्वरूप सत्य का—'यह मैं हूँ' ('अयमहमस्मि') अतः यहीं
सब कुछ उत्पन्न होता है एवं यहीं सब कुछ विलीन हो जाता है—इस प्रकार का प्रत्यव-
मर्शात्मक निज धर्म सामान्यस्पन्द है—'अयमहमस्मि, अतः सर्वं प्रभवति, अत्रैव च
प्रलीयते—इति प्रत्यवमर्शात्मिको निजो धर्मः सामान्यस्पन्दः' । विशेष स्पन्द क्या हैं?
विशेषस्पन्द के लक्षण (१) ये अत्यन्त हेय हैं (२) ये अनात्मभूत देहादिक पदार्थों में
आत्माभिमान की उद्भावना करते हैं । (३) ये आपस में भिन्न-भिन्न मायीय प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न विषय हैं—यथा—मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ । (४) ये गुणमय प्रत्यय-प्रवाह
संसरण के मूल कारण हैं । 'अत्यन्त हेया विशेषस्पन्दा अनात्मभूतेषु देहादिषु आत्मा-
भिमानमुद्भावयन्तः परस्परभिन्न मायीय प्रमातृविषयाः—सुखितोऽहं, दुखितोऽहं—इत्यादयो
गुणमयाः प्रत्यय प्रवाहाः संसारहेतवः ॥'
१. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।

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प्रथमः निष्यन्दः २३५
'सततं' = लगातार। सभी अवस्थाओं में बिना किसी भी व्यवधान के। 'उद्युक्तः'
= 'वक्ष्यमाणोपपत्तिलब्ध्युपाय प्रतिपत्यभिव्यज्यमान स्वबलबृंहणत्वात् अव्याहोत्साहमध्य
वसितः'। अत्यन्त उत्साहपूर्वक अध्यवसायानिरत॥ इससे यह सिद्ध होता है कि प्रबुद्ध
ही उपायों का परिशीलन करने में एकतान बनकर शीघ्र ही अपने स्वस्वरूप की उपलब्धि
कर लेते हैं अन्य नहीं।१
आत्मोद्धार हेतु स्पन्द शक्ति के साक्षात्कार हेतु नियमित अध्यवसाय—
भट्टकल्लट 'स्पन्द सर्वस्व' में कहते हैं—'अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्द-
तत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं स जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं, तुर्यभोगाख्यं स्वभावं
अचिरेणैव कालेन प्राप्नोति ॥२
जो प्रबुद्धभूमिकारूढ़ योगी स्पन्दतत्त्व को अपने में अभिव्यक्त करने हेतु निरन्तर
अक्लान्त अध्यवसाय करता रहता है उसको जाग्रत् अवस्था में ही अपने चिन्मात्रभाव की
सम्प्राप्ति स्वल्पावधि में ही हो जाती है। ऐसा साधक अपने स्वगत भाव (तुर्य-
चमत्कारमय स्पन्द तत्त्व) का अनुभव शीघ्र प्राप्त कर लेता है।
उद्योग एवं प्रयत्न—'अतः सततमुद्युक्तः' यहाँ 'उद्योग' का क्या अर्थ है?
'शिवसूत्र' में 'प्रयत्नः साधकः' (२.२) कहकर जिस 'प्रयत्न' शब्द का जो अर्थ लिया
गया है वही पारिभाषिक अर्थ यहाँ 'उद्योग' का भी है।
स्पन्द का बहिर्मुखी (विश्वोन्मुख) एवं गुणादि रूपों में जो विराट् प्रवाह है—जो
विश्वोन्मुखी प्रसरण है वही 'चित्त' कहलाता है। इसे चित्त इसलिए कहते हैं क्योंकि यह
मनन धर्मा है—'चेत्यते विमृश्यते अनेन परं तत्त्वं इति चित्तं, पूर्णस्फुरत्ता सतत्त्वप्रासाद-
प्रणवादिविमर् parse: प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मंत्र्यते गुप्तम् अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम्
अनेन, इति मन्त्रः ॥ अतएव च परस्फुरतात्मकमननधर्मात्मता, भेदमयसंसारप्रशमनात्मक
त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ॥' (शि०सू०वि० २।१)
'चित्तं मन्त्रः' (२।१) के बाद दूसरा सूत्र 'प्रयत्नः साधकः' (२।२)—शाक्तोपाय-
विवेचन के संदर्भ में लिखा गया है। दोनों शब्दों की विवेचना प्रासंगिक है।
'चित्त' के द्वारा ही परम तत्त्व का चिन्तन किया जाता है। मननधर्मा होने के
कारण ही मन्त्र का 'मन्त्र' नाम पड़ा है। मन्त्र का मनन चित्त द्वारा किया जाता है।
चित्त में प्रतिक्षण संकल्प-विकल्प की तरंगें उठती एवं बैठती रहती हैं। चित्त एक
सरोवर है और संकल्प-विकल्प उसकी तरंगें है। चित्त-सरोवर में समुत्थित इन्हीं अ-
निवार्य तरंगों को या संकल्पविकल्पस्वरूप 'चित्त' को (अन्तरोन्मुखी होकर) सद्धिमर्श की
शक्ति के माध्यम से सामान्य स्पन्द स्वरूप (विकल्पशून्य) पर संवित् में संलीन करने का
प्रयत्न या उद्योग किया जाता है। शाक्त स्वरूप की अभिव्यक्ति आत्मस्वरूप की प्रत्य-
भिज्ञा—मन्त्रवीर्य की अनुभव-प्राप्ति—पूर्णाहन्तास्वरूप 'वीर्य' का संवेदन—इसी 'प्रयत्न'
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
२. भट्टकल्लट : स्पन्दसन्दोह (स्पन्दकारिकावृत्ति) २१।

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२३६ स्पन्दकारिका
या 'उद्योग' के मार्ग से सम्भव हो पाता है। कारिकाकार 'उद्योग' की अखण्ड निरन्तरता
का उपदेश दे रहे हैं। सारांश यह कि—त्रिगुणात्मक चित्त में विस्फुरित सङ्कल्प-विकल्प
की व्यष्टिभूता भाव तरंगों को विकल्प शून्य परसंवित्त्व में स्वाभाविक (सहज =
अकृत्रिम) रूप से लय करने का अभिधान है—'उद्योग' (प्रयत्न) ॥
विकल्प बन्धन के कारण हैं—अभिनवगुप्ताचार्य की दृष्टि—अभिनवगुप्त
कहते हैं कि (१) मन्त्र (२) आत्म (३) द्रव्य (४) भूत (५) दिव्य (६) तत्त्व नामक ६
प्रकार की शङ्कायें विकल्पों को उत्पन्न करती हैं। इनका नाश भी ज्ञान से हो जाता है।
विकल्पों का नाश 'ज्ञान' से होता है। विकल्पों के नाश से ही निर्विकल्पात्म संविद् में
विश्रान्ति प्राप्त होती है। विकल्पों से शङ्काओं का जन्म होता है। विकल्पोत्पन्न शङ्काओं
के अतिरिक्त अन्य कोई बन्धन नहीं है। मन्त्र शङ्का, आत्म शङ्का, द्रव्य शङ्का, भूत
शङ्का, दिव्य कर्म शङ्का—ये ५ शङ्कायें हैं। ये जीवों को बन्धन में डालने वाले हैं।
'तत्त्वशङ्का' या 'पराशङ्का' भी है अतः—
'शङ्का विकल्पमूला हि शाम्येत्स्वप्रत्ययादिति ॥'¹
(१) विकल्पार्णवतारकत्वात्स्वोपलब्धि स्वत उद्भूतं ज्ञानं मुख्यं।
(२) विकल्पमूला मन्त्रादिविषया षोढा शङ्का शाम्येत् विकल्प स्वात्म संविद्विश्रान्तो
भवेत् ॥'
अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—
(१) प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं० ४.३)
(२) विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोऽप्यन्यं सदृशात्मकम् ॥ (तं० ३.३)
(३) विकल्पक्षीणचित्तस्तु परमाद्वैतभावितः ।
मुच्यते नात्र सन्देह इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥
(४) विकल्पाज्जायते शङ्का सा शङ्का बन्धरूपिणी ।
बन्धोन्यो न हि विद्येत ऋते शङ्कां विकल्पजाम् ॥
(५) त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं गुरोर्मुखम् ।
प्राधान्यात्स्वोपलब्धिः स्वाद्विकल्पार्णवतारिणीम् ॥
अभिनवगुप्तपादाचार्य एवं अन्य शैव आचार्य इन उपर्युक्त कथनों के माध्यम से
यह सिद्धान्त निरूपित करते हैं कि—
१) 'चित्त' विकल्पमूलक है।
२) विकल्प बन्धनप्रद है।
३) विकल्प-शोधन से 'उद्योग' में साकल्य मिलता है।
१. तन्त्रालोक (१३।१९८) 'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका : जयरथ) ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३७
आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं आत्मिक अभ्युत्थान के लिए विकल्प-संस्कार की
विधि का प्रतिपादन अभिनवगुप्त की निजी दृष्टि है।
अभिनवगुप्त की विकल्प-संस्कार-प्रक्रिया—यदि साधक अपने विकल्पों का
संस्कार करे क्योंकि 'उद्योग' 'प्रयत्न' की मुख्य पद्धति यही है।
विकल्पों का संस्कार किया कैसे जाय?
१) संसारोन्मुख, भोगोन्मुख (कामिनी)-काञ्चन एवं अन्य ऐन्द्रिय उपभोगों के प्रति
सतृष्ण) प्रवाहित विकल्पों के मार्ग को परिवर्तित करना और
२) इस विकल्प-प्रवाह को स्वरूप-चिन्तन की दिशा में संलग्न करना—इन दोनों
प्रयासों से विकल्पों का संस्कार होता है और 'प्रयत्न' एवं 'उद्योग' का मुख्य कार्य है।
गुणादि स्पन्दों के निष्यन्द प्रत्येक क्षण आत्मा के यथार्थ स्वरूप पर आवरण
डालते रहते हैं—
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपंथिनः ॥'
'विकल्प' प्रत्येक कालखण्ड में मायिक उपलब्धियों एवं ऐन्द्रिय उपभोगों एवं
स्वार्थों के पूर्त्यर्थ प्रवृत्त रहता है। परिणाम—
कुत्सित विकल्प—कुत्सित संस्कार । सांसारिक विषयों की मूर्ति की तृष्णा—
चित्त को कभी भी स्थैर्य प्राप्त न होना । अहर्निश विकल्पसंस्कार, सत्परामर्श द्वारा
बाह्योन्मुखी प्रसार से विरति—चिद्रूप संवित् में एकनिष्ठ एकाग्रता प्राप्त करने का 'उद्योग'
(प्रयत्न)—चित्त में परिमार्जित (संस्कार युक्त) विकल्पोद्भव—असत् विकल्पों का ह्रास ।
संस्कृत विकल्प भी अन्ततः हैं तो विकल्प ही अतः उनका भी त्याग आवश्यक है।
विकल्प संस्कारों की अनेक भूमिकायें हैं यथा—
'चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटन् स्फुटितात्मकः ॥'
विकल्प संस्कार की भूमियाँ
┌──────────┬──────────┬──────────┐
१ २ ३ ४
अस्फुट स्फुटतोन्मुख स्फुटता की पूर्ण प्रस्फुटित
और विकसित
अपनी चरमावस्था में पहुँचा विकल्पसंस्कार का यह स्तर असत् संस्कारों का ध्वंस
कर देता है।
ततः स्फुटतमोदार ताद्रूप्य परिबृंहिता ।
संविदभ्येति विमलाभे विकल्पस्वरूपताम् ॥ (तन्त्रालोक)

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२३८ स्पन्दकारिका
विकल्प अपनी संस्कारावस्था में चरम भूमि पर पहुंचने पर संविद्रूप बन जाते हैं या
स्वयं संवित् पारमार्थिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत हो जाता है । संस्कृत विकल्पों के
संस्कार—अन्य संस्कृत विकल्प । (इनका रूप शुद्धविद्या का ही अंश होता है—
‘शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः) = सद् ज्ञान या सतर्क के विकल्प ।। योग में ‘सतर्क’ को
योग का उच्चतर अंग स्वीकार किया गया है । ‘सतर्क’—तामसिक, राजसिक विकृतियों
का नाश ।—असत् तर्क का ध्वंस । विकल्पों को कितना भी संस्कृत क्यों न किया जाय
किन्तु उनका पारमार्थिक संस्कृत स्वरूप भी शिवत्व-प्राप्ति नहीं करा सकता ।
विकल्पसंस्कार और उद्योग—किसी भी विकल्प या विकल्पांश के रहते
चिदानन्द शिवत्व (चिन्मात्र शिवभाव) प्राप्त होना संभव नहीं है ।
पारमार्थिक एवं संस्कृततम विकल्पों से भी मुक्ति प्राप्त करना आवश्यक है । इन
सुसंस्कृत विकल्पों का भी तब तक पुनः परिमार्जन (परिष्कार, संस्कार) करना आवश्यक
है जब तक कि विशेष स्पन्द रूपान्तरित होकर सामान्य स्पन्द की अद्वैतात्मक भूमिका पर
आरूढ़ होकर निर्विकल्प आत्मसंवित् में विश्रान्ति न प्राप्त कर लें ।
‘चित्तं मन्त्रः’ की स्थिति ऐसी ही विकल्पशून्यावस्था का विकास भूमि है जहाँ चित्त
के साथ मन्त्रों की विमर्शात्मक तद्रूपता आने पर ‘चित्त’ ‘मन्त्र’ एवं ‘देवता’ तीनों में
तादात्म्य, एकरूपता या एकाकारता आ जाती है । विकल्प-संस्कार ही अपनी चरम भूमि
पर यात्रा कराते कराते साधक को ऐसे उच्चतम सिद्धि-शृंग पर पहुँचा देते हैं जहाँ योगी
का परिष्कृत चित्त ही ‘मन्त्र’ बन जाता है । मन्त्र में शक्ति का उदय होने के पूर्व तक या
स्पन्दात्मक शाक्त बल के उदय के पूर्व या मन्त्र एवं मननकर्ता के अहं की एकाकारता के
पूर्व तक ‘मन्त्र’ मन्त्र नहीं वर्ण मात्र रहते हैं और उनका जप केवल शब्दोच्चारण मात्र
रहता है—‘जप’ नहीं बन पाता ।
विविक्तये = स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए । निजं भावं = तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् ।
जाग्रदेव = जाग्रत अवस्था में ही ।। सततं = सर्व काल = सदैव ।। भावं = अपना
चिदानन्द, चिन्मय, नित्यात्मक आत्मस्वरूप ।।
स्पन्दात्मक परसंवित् में प्रवेश करने हेतु ‘सततोद्योग’ एक प्रमुख साधक है ।
शिव सूत्र (१।५) ‘उद्यमो भैरवः’ में ‘उद्यम’ की जो व्याख्या की गई है—
‘योऽयं प्रसररूपाया विमर्शमय्याः संविदो झगिति उच्छलनात्मक पर प्रतिभोन्मज्जनरूप
उद्यमः स एव सर्वशक्तिसामरस्येन अशेषविश्वभरितत्वात् सकलकल्पनाकुलालं कवलनम-
त्वाच्च भैरवो भैरवात्मक स्वस्वरूपाभिव्यक्ति हेतुत्वात् भक्तिभाजाम् अन्तर्मुखैतत्तत्वाधान-
धनानां जायते । ... भावनं हि अन्तर्मुखोद्यन्तापद विमर्शनमेव ।।’ ‘परप्रतिभोन्मेषा-
वष्टम्भोपायिकां भैरवसमापत्तिम् अज्ञानबन्धप्रशमैक हेतुं ... प्रशान्तभेदावभासंभवति ।।’
(शि०वि० १।५)
‘भैरव’ का पर्याय ही है ‘उद्यम’ ।।—संवित् तत्त्व का उच्छलनात्मक पर प्रतिभो-
न्मज्जनरूप उद्यम । भैरव का अर्थ है—भैरवात्मकस्वस्वरूपाभिव्यक्ति ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३९
'आत्मनो भैरवं रूपं भावयेद्यस्तु पूरुषः ।
तस्य मन्त्राः प्रसिध्यन्ति नित्ययुक्तस्य सुन्दरि ॥'
यही है बन्धन के प्रशमोपाय, उपेय विश्रान्ति—इसे ही कहा गया है—'उद्यमो
भैरवः ॥' (१।५)
स्पन्द का स्वरूप-लक्षण—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
अत्यन्त क्रोधाविष्ट होने पर, आनन्द के चरम सोपान पर आरूढ़ होने पर, 'मैं
क्या करूँ?' इस प्रकार की (किंकर्तव्यविमूढ़ता) अवस्था में पड़ने पर, (दौड़ने के लिए
विवश होने पर अकस्मात्) दौड़ पड़ने पर—(कोई भी व्यक्ति) जिस अवस्था में प्रवेश
करता है वही 'स्पन्द' तत्त्व उदित हो जाता है ॥ २२ ॥

  • सरोजिनी *
    'स्पन्द' के दो रूप हैं—(१) सामान्य स्पन्द (२) विशेष स्पंद ।
    'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (१९)
    गुणादिस्पन्द—ये 'विशेष स्पन्द' कहलाते हैं और 'सामान्य स्पन्द' के आश्रित हैं।
    स्पन्दतत्त्व तो जाग्रत आदि भेदात्मक अवस्थाओं में भी व्याप्त रहता है—
    'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति ॥' (३)
    'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
    जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥ (२१)
    अकस्मात् क्रोधावेश की चरमसीमा पर पहुंचने, विवशतावश अकस्मात् दौड़
    पड़ने, किंकर्तव्यविमूढ़ होने पर, व्यक्ति के भीतर शक्ति प्रत्यस्तमित दशा का प्राकट्य
    होता है और इन अवसरों पर स्पन्दतत्त्व जाग्रत् अवस्था में भी उदित हो उठता है—
    'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे, प्रहृष्टे, धावमाने च 'किं करोमि' इत्येवं चिन्ताविष्टे यदा
    शक्ति प्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥'
    (भट्टकल्लटः वृत्ति) ।
    जहाँ जब एवं जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है और मन
    केवल अनन्य रूप से एक चित्त वृत्ति परायण हो जाता है उस अवस्था में आत्मस्वस्वरूप
    'स्पंद' स्पष्टतया स्थित रहता है यथा क्रोधावेश में, भयावेश में, प्रेमावेश में, हर्षावेश
    में । इसी भाव को सुस्पष्ट करता हुआ ग्रन्थकार कहता है—
    अत्यधिक क्रुद्ध या उत्तेजित है या अत्यधिक आह्लादित है या वह जो—'मैं क्या
    करूँ?'—इस प्रकार सोच रहा हो, या (इधर-उधर) दौड़ रहा हो—वह जिस पद
    (अवस्था) में जाता है (जिस भावभूमि पर आरूढ़ होता है) वहाँ 'स्पंदतत्त्व' प्रतिष्ठित
    रहता है ॥ २२ ॥