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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 329 of 519

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Page 329

२२८ स्पन्दकारिका
यह स्वाभिन्न (परमेश्वराभिन्न) सृष्टि 'आदिसर्ग' है—'विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं
स्वाव्यतिरिक्तमिव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदिसर्गः' ।।
२) इस आदिसर्ग के बाद—'अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा
स्वस्वातंत्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्यग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति ॥' (विवेक)
१) 'आदिसर्ग' = विश्वावभासन करने की सङ्कल्पात्मक उन्मुखता के काल में
प्राथमिक अवभासन परमात्मा के स्वरूप से अभिन्न (तद्रूप) 'अहंविमर्श' के रूप में हुआ
करता है । यही आदि सर्ग है ।
२) इसके अनन्तर परमात्मा अपनी स्वसमवेता 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के विकसित रूप
'मायाशक्ति' के द्वारा अपने स्वस्वरूप पर ही आवरण डालकर अपने स्वरूप रूपी दर्पण
में अनन्त ग्राहकों एवं ग्राह्यों का अवभासन करता है और इस प्रकार परमात्मा ही तीन
रूपों से अवभासित होता है—१) पतिप्रमाता २) पशुप्रमाता ३) जड़ात्मक प्रमेय ।
आदिसर्ग की परवर्ती समस्त नानात्मक सृष्टि—'विशेष स्पंद' के अन्तर्गत है । गुणादि-
स्पंदों को ही 'विशेष स्पंद' कहा गया है । शाश्वत कर्तृता शक्ति का स्वरूप 'अहं-
विमर्शात्मक स्पन्द' है । यही 'महासत्ता' भी है । गुणादि एवं तज्जन्य स्पन्द 'विशेष
स्पन्द' है क्योंकि उनमें सामान्यता का नहीं 'विशेषता का भेद' अवस्थित रहता है । १
विशेष स्पन्दों के लक्षण और प्रभाव—
अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ।
पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ २० ॥
ये (गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष स्पन्द) स्वरूप (आत्मा) की यथार्थ स्थिति
(चिन्मात्रता) पर आच्छादन डालने पर (सदैव) प्रयत्नरत रहते हैं । अतः ये (विशेष
स्पन्द) अज्ञानावृत बुद्धि वाले पशुओं को दुस्तर एवं भयङ्कर जगद्रूप मार्ग में फेंक
देते हैं ॥ २० ॥

  • सरोजिनी *
    गुणादि रूपों में प्रवाहित विशेष स्पन्द अल्पज्ञ पशुओं (मितप्रमाताओं) की यथार्थ
    चिद्रूपता पर आवरण डालकर उन्हें अनतिक्रम्य, दुस्तरणीय एवं भयावह जगत् के
    कण्टकाकीर्ण मार्ग पर डालकर उन्हें पथभ्रष्ट कर देते है । वे अबुद्ध पशु के स्वरूप
    (आत्मस्वरूप) को प्रत्येक क्षण आच्छादित करते हैं जिससे पशु स्वरूप को गुणादि
    विशेष स्पन्दों के रूप में देखते हैं न कि शुद्धबुद्धस्वरूप वाले आत्मा के रूप में
    भट्टकल्लट ने कहा है—
    'यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति न शुद्धबुद्धस्वरूपतया ॥'
    (मा० वि० ३.३१) में भी कहा गया है—
    १. स्पन्दकारिका (१४) में स्पन्दकी अन्य दो अवस्थायें बताई गई हैं—
    (१) 'कर्तृत्व', (२) 'कार्यत्व' ।