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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 326 of 519

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Page 326

प्रथमः निष्यन्दः २२५
सामान्य अर्थात् सर्वव्यापक अन्तर्लीन अनन्त विशेष स्पन्द वाले एवं शक्ति-
स्फुरित परतत्त्व ।
संश्रयात्—सम्यक् रूप से अनन्यशरणतया श्रयण करने भजन करने के कारण ।
लब्धात्मलाभाः = जिन्होंने आत्मा का लाभ प्राप्त कर लिया हो वे लोग । लब्धः
आसादित । प्राप्त ।। (अपने स्वस्वरूप का लाभ या साक्षात्कार ।) 'ज्ञस्य' = ज्ञाता का ।
परमेश्वरानुग्रह से उदित हेयोपादेय प्रत्ययों के प्रमाताओं के भाव का । 'सामान्य स्पन्द' ही
परमेश्वर की मुख्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित निर्विकल्पप्रतिपत्ति (निर्विकल्प समाधि के) है
'सामान्यस्पन्द एवं परमेश्वरमुख्यशक्तित्वेन'¹ ।
तात्पर्य यह है कि जो कोई जिस किसी भी मायीय प्रमाता के सुखाद्यात्मक होने के
कारण जो गुणमय स्पन्दनिष्यन्द (जो कि प्रत्ययसंधान हैं) प्रसृत हो रहे हैं वे सभी एक ही
सामान्य स्पन्द का आश्रय लेकर उस आत्मतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं । जो 'प्रबुद्ध' हैं
उनके उदय से अभिज्ञ (प्रज्ञा पात्र) होने के कारण उन नित्योद्योगी लोगों के लिए ये
उत्पन्न नहीं होते । जो 'अप्रबुद्ध' हैं वे तो दुर्निवार प्रसर हैं । अप्रबुद्ध कौन हैं? पारमेश्वर
परानुग्रह से परित्यक्त होने से जिनकी प्रगाढ़ अज्ञाननिद्रा एवं धी (प्रज्ञा) विगलित (विनष्ट)
नहीं हो सकी वे ही हैं अप्रबुद्ध ।²
स्पन्द—(स्पन्द शक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखी निष्यन्द) = 'प्राणस्पंद'-५ स्थूल
प्राण, -सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण, मन, बुद्धि अहंकार (अन्तःकरण) वेद्य सुख, दुख,
मूढ़ता, अन्तःकरण के विषय, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, घट पट वेद्य विषय, समस्त
विश्व के अनन्त प्रमेयों का प्रतिसमय होने वाला प्रवाह । 'स्पन्दनिष्यन्द' = स्पन्द-प्रवाह ।
इन्हीं विशेष स्पंदों के पाश में समस्त जगत् जकड़ा हुआ है ।
विशेषस्पंदों की अनन्त अनेकाकारिता में सामान्य स्पन्द की एकाकारता
अनुस्यूत एवं प्रवाहित होती रहती है । जो विशेष स्पन्द हैं उनके अनन्त रूपों में शिव
की शक्तियाँ ही प्रवाहित होती हैं ।
सुप्रबुद्ध योगियों की भूमिका = तुर्यरूप शाक्त भूमिका ।।
एकात्मकता में अनेकात्मकता <———— एकात्मक सामान्य स्पन्द
एवं अनेकात्मकता में
एकात्मकता ——— प्राण, इन्द्रयाँ, पंचभूत,
तन्मात्राएँ, घट, पट, सुख,
दुःख आदि
अनन्त 'विशेष स्पन्द'
(समस्त विकल्प) ।।
अबुद्धों की भूमिका = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं विशेष स्पंदों की भूमिका ।।


१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
स्पं० १५