स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२३२ स्पन्दकारिका
अवरोहण की पतनोन्मुख प्रक्रिया—
स्पन्दनात्मिका चित् शक्ति का अशुद्धाध्व (माया से पृथ्वी तत्त्व) के मार्ग पर चल
कर 'माया' का रूप धारण करना चिन्मात्र (शिवांश) आत्मा की चिन्मात्रता को ढककर
उसे शिवभाव से पृथक् कर देना—चित, आनन्द-इच्छा-ज्ञान-क्रिया को कला, विद्या,
राग, काल, नियति (पञ्चकञ्चुक) के मार्ग पर यात्रा कराना—सर्वकर्तृत्व को अल्पकर्तृत्व,
सर्वज्ञत्व को अल्पज्ञत्व, संतृप्ति से अतृप्ति, नित्यत्व को अनित्यत्व, व्यापकता को
अव्यापकता में रूपान्तरित करना एवं आणव मल, मायीय मल एवं कार्ममल को
आविर्भूत करके स्वतन्त्र शिव को पराधीन पशु बना देना—आदि के द्वारा अवरोहण
प्रक्रिया निष्पादित होती है। 'लोलिका' (निष्कर्म अभिलाषा, अस्पष्ट आकांक्षा) क्षोभ
उत्पन्न करके स्थूल अभिलाषा को जन्म देकर (राग तत्त्व के) उत्पाद के रूप में देता है।
यही राग सारे बन्धनों का कारण है।
जाग्रत् अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय—
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्द तत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ २१ ॥
इसलिए (पूर्वोक्त कारणों से) स्पन्दतत्त्व स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर
प्रयत्नरत (योगी) जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव (स्पन्द तत्त्व) को शीघ्रता पूर्वक प्राप्त
कर लेता है ॥ २१ ॥
- सरोजिनी *
जो साधक स्पन्दात्मक पर संवित् को अधिगत करने की आकांक्षा रखते हों उन्हें
चाहिए कि वे स्पन्द तत्त्व की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। 'शिव-
सूत्र' (२.२) में—'प्रयत्नः साधकः' कहकर भी इसी तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
प्रतिक्षण सङ्कल्पविकल्पात्मक चित्त को आन्तर अनुसंधित्सा (गवेषणा) अर्थात्
सद्विमर्श—की शक्ति के द्वारा सामान्य स्पन्दस्वरूप, विकल्प शून्य परसंवित् पर तत्त्व में
विलीन करने का अकृतिक (अकृत्रिम) प्रयास ही 'प्रयत्न' है आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्र-
विमर्शिनी' (२।२) में कहते हैं—
(१) मन्त्रस्य अनुसंधित्सा प्रथमोन्मेषावष्टम्भप्रयतनात्मा अकृतिको यः प्रयत्नः स एव
साधकों (मन्त्रयितुर्मंत्रदेवता तादात्म्यप्रदः)।
(२) अकृतिकनिजोद्योग बलेन योगीन्द्रो मनः कर्मबिन्दुं विकर्षयेत् परप्रकाशात्मतां
प्रापयेत्। 'प्रयत्नोऽन्तः स्वरंभः स एव खलु साधकः। यतो मन्त्रयितुर्मन्त्रदेवतैक्यप्रदः
स्मृतः ॥ (वार्तिक)—शिवसूत्रवार्तिक ।
इस श्लोक में अज्ञानी के संसार से पार होने की युक्ति को इस प्रकार समझाया
गया है—
'अतः जबकि जाग्रत् अवस्था में भी कोई साधक जो कि स्पंद तत्त्व के सुस्पष्ट