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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 325 of 519

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Page 325

२२४ स्पन्दकारिका
तस्योपलब्धिर्योक्ता सा गुणस्पन्दादिभिः स्थितैः ।
कुतस्त्या चेति साशंका ये तान् प्रत्युच्यते त्विदम् ॥
प्रश्न यह उठता है कि जब गुणस्पन्दादि अनेक पदार्थ स्थित हैं तब उसकी
उपलब्धि कहाँ । इस शंका पंक का प्रक्षालन करते हुए ग्रन्थकार—'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः
.... परिपन्थिनः ॥' कारिका कहता है ।
सत्त्व, रज एवं तम ये तीनों गुण एवं महान्, अहंकार आदि के जो स्पंद हैं उन्हीं
के निष्यन्द (प्रवाह)—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगें हैं । वे सामान्य स्पन्द के
अन्तर्लीन अनन्त विशेषों का आलम्बन प्राप्त करके ही सत्तावान् होते हैं । अतः तत्त्वज्ञ
योगी के स्वरूप में उनसे कोई व्यवधान नहीं पड़ता । वे योगी के विरोधी नहीं, प्रत्युत्
स्वरूप के विलास हैं । जैसे पुष्प का रस उसके स्वभाव का आच्छादक नहीं है उसी
प्रकार स्पन्द के निष्पंद अरविन्द के मकरन्द के समान ही हैं । एकसिद्ध ने कहा भी है—
'प्रकाश के राजमहल में प्रकाश्य वस्तु दिखाई नहीं पड़ती । अनन्त संविद् में
संवेद्य भी संविद्रूप है'—
'यद्गतप्रकाशभवने प्रकाश्यविषयो न दृश्यते मातः ।
संपर्कात्तव तद्वत् संविद्वेद्ये न भाव्यते जातु ॥'
'मातंगपारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह
जो विस्तीर्ण मार्ग है, वह चिद्वस्तु से सिद्ध होता है और उसी से जाना जाता है ।
गीता में भी कहा गया है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतत्तरन्ति ते ॥' (७।१४)१
गुणादि = सतोगुण रजो गुण एवं तमोगुण । ये गुणादि स्पन्द के निष्यन्द ही हैं
जो कि ज्ञाता पुरुष के परिपंथी (विरोधी) हैं ।
स्पन्दानाम = क्षेत्रज्ञ की ज्ञानादिक शक्तियों के ।
निष्यन्द = नाना अर्थों की ओर उन्मुख होने से प्रसृत प्रवाहों का समूह अर्थात्
विभिन्न प्रत्यय ही हैं 'स्पन्दनिष्यन्दः' 'निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसुताः प्रवाहा भिन्नाः
प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥'
गुणादि = गुण आदि ॥ महत्तत्त्व (प्रधान) जिससे किये गुणत्रय आविर्भूत होते हैं
तथा गुणत्रय ॥
सुखादिक से युक्त होने के कारण सत्त्वादिमय गुणादिक—
स्पन्दनिष्यन्द—'अहं सुखी, दुःखी मूढः' आदि अनेक प्रकार के ज्ञान-भेद । ये
किस रूप के हैं? 'सामान्यस्पन्दसंश्रयात् लब्धात्मलाभाः ॥' हैं ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलदेवाचार्य ।