स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२३० स्पन्दकारिका
'खेचरी', 'गोचरी', 'दिक्धरी' एवं 'भूचरी'—शक्ति चक्र अन्तःकरण एवं
बहिष्करण प्रमेय रूप से गुणादिस्पंद युक्त अप्रबुद्ध लोगों को बिन्दुनादादि प्रथामात्र से
संतुष्ट योगियों को संसार में अधःपतित करती रहती हैं ।१
मूढ़ पुरुष के लिए ये ही स्पन्द-निष्यन्द चित् स्वरूप के आच्छादक बन जाते हैं
क्योंकि वह मूढ़ बुद्धि पुरुष अपने को गुणात्मक दी देखता है शुद्ध बुद्ध नहीं ।२ कहा भी
गया है—'जैसे बालक स्वच्छ दर्पण को अपने ही श्वासों से मलिन कर देता है वैसे ही
अज्ञानी अपने विकल्पों से विज्ञान को मलिन कर देता है ।३ इसका परिणाम यह होता है
कि वे जन्म-मरण के संसार-प्रवाह में भेद दिये जाते हैं । उस प्रवाह में अत्यन्त क्लेश है
और दुस्तर भी है—
'यथादर्श शिशुः स्वच्छं निःश्वासैर्मलीम सम् ।
करोति तद्वद्विज्ञानं स्वविकल्पैर्जडाशयः ॥'४
'ज्ञानसंबोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही
आत्म शक्ति से संचालित होते हैं तथापि एक स्वतन्त्र है और द्वितीय परतन्त्र है ।
शुद्धबोध पुरुष विषम स्थल में भी साक्षी की भाँति स्वतन्त्र रहता है । मन्दबोध पुरुष
अंधे के समान समस्थल में भी परतन्त्र होता है—५
यद्यपि स्वात्मशक्त्यैव गतिः साक्ष्यनयोर्द्वयोः ।
तथाप्येकः स्वयं याति द्वितीयोऽन्येन नीयते ॥
साक्षिवत् स्फीतबोधानां स्वातन्त्र्यं विषमेष्वपि ।
अंधवन्मन्दबुद्धीनां पारतन्त्र्यं समेष्वपि ॥६
'अप्रबुद्ध' = पारमेश्वर परानुग्रह से शून्य । अज्ञानात्मक बुद्धि वाले हैं । ये
गुणदिस्पन्द निष्यन्द ऐसे अप्रबुद्ध लोगों को घोर (विभीषिकाशतसंकुल एवं दारुण) एवं
दुरुत्तार (दुस्तीर्ण = दुर्लंघ्य) संसारवर्त्म (जन्ममरणादि प्रबन्ध मार्ग) में अनवरत रूप से
भटकाते रहते हैं—अधःपतित करते रहते हैं ।
ये कैसे हैं? 'स्वस्थितिस्यगनोद्यताः ।।'
स्व (परमात्मा) में सामान्यस्पन्द मात्र कर्म में स्थिति अर्थात् निर्विकल्प प्रतिपत्ति से
उत्पन्न सुस्थिर प्रतिष्ठा वाले । 'उद्यताः' = प्रतिपक्षभूत प्रबोध के उदित न होने के कारण
विशेषस्पन्द में प्रसरणशील ॥
अप्रबुद्ध लोगों में सर्वकर्तृत्वादि लक्षण वाले सामान्यस्पन्द रूप महिमा रहते हुए
भी समस्त कार्यों में परतन्त्र, अनात्मक देहादि को अपनी आत्मा समझने वाले, लब्ध-
प्रसर, — 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, – आदि गुणप्रधान प्रत्यय प्रवाह वाले ये लोग संस-
रणमार्गोपेत नश्वर संसार प्राप्त करते हैं । इस उपदेश के विषय केवल प्रबुद्ध है अप्रबुद्ध
नहीं । ये कभी भीतर विश्राम नहीं कर पाते । कहा भी गया है—७
१. स्पन्दनिर्णय । २-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
७. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।