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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 328 of 519

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Page 328

प्रथमः निष्यन्दः २२७
रूप धारण कर लेता है । यह स्पन्द शक्ति 'प्राणस्पन्द' के रूप में रूपान्तरित होने के
अनन्तर अनेक रूपों में पर्यवसित होती है । स्पन्दनिष्यन्द—गुणत्रय, अन्तःकरणचतुष्टय,
११ इन्द्रियाँ अर्थात् आब्रह्मस्तंबपर्यन्त विश्व के प्रत्येक प्रमेय, सीमितप्रमाता, प्रमा, एवं
प्राणियों के अनन्त भावों में यही स्पन्दशक्ति प्रवाहित होती है । 'स्पन्द-निष्यन्द' इन्हीं
अनन्त स्पन्द प्रवाहों को कहते हैं । पशुभूमिका में अन्तः प्रवहमान यह स्पन्द-प्रवाह ही
माया, बन्धन, अज्ञान एवं अविद्या का कारण है ।
'संवित्' की प्रथम परिणति प्राणस्पन्द या प्राण के रूप में ही होती है ।
प्रकाशविमर्शमय संघट्ट ही आनन्द शक्ति है और विश्व के अनन्त भेदों में स्पन्दित होना
ही इसका स्वभाव है । इसीलिए कहा जाता है कि संवित् प्रतिक्षण उद्वलनात्मक है ।
उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण यह विशुद्ध प्रकाशस्वरूपा संवित् शक्ति विशेष स्पन्दों में
अविश्रान्त प्रवहमान है। अपने में अभिन्नतया अवस्थित वेद्यभाग को अपने से पृथक् करके
तथा अपने स्वरूप में अविचलित रूप में पूर्णतः अवस्थित रहकर यह स्पन्द शक्ति
विश्वातीत एवं विश्वमय दोनों स्वरूपों में क्रीड़ारत है ।
पशुभूमिका में यह स्पन्दशक्ति अपने व्यष्टिगत प्रवाहों द्वारा जीवों को बन्धन में
डालती है तथा सुप्रबुद्ध भूमिका में एक योगी विशेष स्पन्दों की विभिन्नता एवं अनेक
रूपात्मकता में भी सामान्यस्पन्द की एकाकारता का अनुभव करता है । विशेष स्पन्दों के
रूप में प्रवहमान अनन्त नामरूप (विशेष स्पन्दों के अनन्त रूप) केवल शांकरी शक्तियाँ
ही तो हैं ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के रूप में प्रवहमान
गुणस्पन्दों की अनन्त धारायें 'सामान्यस्पन्द' पर ही आधृत है । ये विशेष स्पन्द चिन्मय
स्वभाव पर आवरण डालकर उसके मार्ग के प्रतिबन्धक नहीं बन सकते । पूर्ण शाक्त
समावेश होने पर सामान्य स्पन्द स्वभाव की अनुभूति को विशेष स्पन्द के अनन्त प्रवाह
कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते—
'गुणस्पन्दस्य सत्वरजस्तमोरूपस्य ये निष्यन्दाः प्रवाहाः ते सामान्यस्पन्दमाश्रित्य
प्रसृता अपि सततं ज्ञस्य विदितवेद्यस्य योगिनः स्युर्भवेयुः, भवन्त्यपरिपन्थिनः अना-
च्छादकाः स्वभावस्यः' ।¹
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥'२
परमात्मा की द्विविधात्मक सृष्टि एवं उनमें अनुस्यूत अवस्थायें तथा स्पंदः जिस
'सामान्य' एवं 'विशेष स्पन्द' का विवेचन किया गया है उसका सृष्टि के स्वरूप से गंभीर
संबन्ध है—सृष्टि के दो रूप हैं—१) आदि सर्ग, २) परवर्ती ।
१) 'तन्त्रालोक' की 'विवेक' (१.१३५) नामक व्याख्या में आचार्य जयरथ कहते
हैं कि विश्वनिर्माण के इच्छुक परमेश्वर प्रथमतः स्वाव्यतिरिक्त विश्व का सृजन करता है ।


१. स्पन्दसर्वस्व (भट्टकल्लट) । २. स्पन्दकारिका ।