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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 334 of 519

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Page 334

प्रथमः निष्यन्दः २३३
साक्षात्कार के लिए सदा प्रस्तुत रहता है । (तब) वह बहुत शीघ्र ही अपने यथार्थस्वरूप
का साक्षात्कार कर लेता है ।'१
अतः = इसलिए ।
सततमुद्युक्तः = लगातार प्रयत्नरत ॥
विविक्तये = विमर्शन के लिए । स्वरूपाभिव्यक्ति हेतु ।
जाग्रदेव = जागृत् अवस्था में ही ।
निजंभावं = आत्मीयशङ्करात्मकस्वस्वभाव को ।
अधिगच्छति = प्राप्त कर लेता है ।२
जो योगी अबाधित रूप में अहर्निश सदैव अंतर्मुखस्वरूप एवं निभालनप्रवण
रहता है—'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते' (१२।२)—ऐसा योगी अपने
आत्मीय शङ्करात्मक स्वस्वभाव को बहुत शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है । तथा उसकी
शङ्करात्मा आन्तर स्वभाव स्वयं उन्मज्जित होता है जिससे कि नित्योदित समावेश को
प्राप्त करने से सुप्रबुद्ध या 'जीवन्मुक्त' हो जाता है ।३
स्पन्द के निष्यन्द अज्ञानी को सर्वदा पतित बनाने हेतु उद्यत रहते हैं । अतः अपने
विकस्वर स्वभाव से स्पन्दतत्त्व का विवेक करने हेतु सदैव उद्योग करते रहना चाहिए ।
इसीसे स्वरूप की अभिव्यक्ति होती है । वस्तुतः अपना स्वरूप उद्योक्ता है, विकस्वर
है—शिव है । शिवसूत्रों में 'उद्योग' को शिव कहा गया है—'उद्योगः शिवः' । अतः
जाग्रतावस्था अर्थात्—व्युत्थानावस्था में शीघ्र से शीघ्र उसे अपने स्वरूप का अधिगम हो
जाता है । जो लगा रहता है; वह जागता रहता है । इसका विवेचन इस प्रकार है ४—'मैं
हूँ शुद्धबोधैकस्वरूपा यह जगत् मेरा विस्तार है, विलास है, जुंभा है, मुस्कान है । यह
सब मेरा वैभव है ।'—ऐसा ज्ञान हो जाने पर वह विश्वात्मा हो जाता है और विकल्पों के
विस्तार में भी वह महेश्वर ही रहता है ।'—
'सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः ।
विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥'५
'पञ्चरात्र' में भी कहा गया है—जब आत्मा में समस्त भूतों को देखता है और
अपने को उनमें देखता है तथा अपने को तब उनसे पृथक् देखता है तब जनम-मरण से
मुक्त हो जाता है—
'यदात्मनि सर्वभूतानि पश्यत्यात्मानं च तेषु पृथक्च तेभ्यस्तदा मृत्योर्मुच्यते
जन्मनश्च' ।
अन्यत्र भी कहा गया है—तुम निर्मल, अनन्त एवं एकमात्र बोधस्वरूप हो ।
भव्यबुद्धि सावधान पुरुष तुम्हें ज्ञाता और ज्ञेय दोनों में ही देख लेता है ॥'—६
'निर्मलानन्त्य बोधैकरूपत्वं भव्यबुद्धिभिः ।
वेद्याद्वा वेदकाद्वापि लभ्यसेऽवहितात्मभिः ॥'
१-३. स्पन्दनिर्णय । ४-६. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।