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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 323 of 519

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Page 323

२२२ स्पन्दकारिका
'यत् प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम्।
पूर्णता गमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ॥—तत्तुर्यमुच्यते ॥ (तं०)
यही है शिवभाव में प्रवेश का द्वार। इस स्तर पर मायीय औदासीन्य शान्त हो
जाता है। स्पन्द सूत्र में इसे ही—ज्ञान क्रिया की शाश्वत स्पन्दात्मिका (शाक्त भूमिका)
विमर्श भूमिका कहा गया है। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थायें तुर्या में लय हो
जाती हैं और प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में, प्रमाता प्रमा में लय हो जाते हैं। यह
अवस्था साक्षात् शाक्त समावेशात्मक अभेद व्याप्ति की अवस्था है। यह चिन्मात्रस्वरूप
अवस्था है यह तीनों अवस्थाओं में व्याप्त रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है। तीनों
अवस्थायें इसी तुर्यावस्था में लयीभूत हो जाती हैं। यह अवस्था विशुद्ध प्रमारूप है और
रजशून्य, विमल, अखण्ड एवं चिन्मात्र है। यही मातृदशा भी है—
'मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ॥'
सुषुप्ति की अवस्था के लक्षण निम्नांकित हैं—
१) अनुभूतौ विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ॥ (तं०)
२) यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम्।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णीभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
तुर्यावस्था वह अकथ्यावस्था है जहाँ मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं
रह जाते। यह अवस्थात्रय का लयीभाव है। यहाँ प्रमेय प्रमाण में एवं प्रमाण प्रमाता में
लय हो जाता है—'मेयं माने मतरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम्। विश्राम्यति ... ॥'
यही है शक्तिसमावेद + शाक्तसमावेश युक्त अभेद व्याप्ति की दशा भी यही है—
'शक्तिसमावेशा ह्यसौ मतः ॥' (तं०) ॥
गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पन्द का अन्तर्सम्बन्ध—
गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ १९ ॥
गुणादि स्पन्दों (विशेष स्पन्दों) के प्रवाहों के 'सामान्य स्पंद' (प्रतिष्ठित स्पन्द) पर
आश्रित होने के कारण वे सदा उनसे ही अपना अस्तित्त्व प्राप्त करते हैं। (ये अनन्त एवं
नित्य प्रवहमान गुणादि विशेष स्पंद) तत्त्वज्ञों के (स्वरूप के) आच्छादक (परिपन्थी) नहीं
बना करते ॥ १९ ॥

  • सरोजिनी *
    स्पन्द अहं विमर्शात्मक हैं। 'स्पंद' विश्वोन्मुखी सङ्कल्पात्मक उन्मुखता है। इसका
    स्वरूप 'अहं प्रत्यविमर्श' है। 'स्पन्द' विमर्शरूप, उच्छलाना पूर्ण एवं सङ्कल्पात्मक हैं।
    अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं' के रूप में विमर्श करते हुए सर्वत्र अपनी
    ही अनुभूति 'पूर्णाहन्ता' है।