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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 335 of 519

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Page 335

२३४ स्पन्दकारिका
'तत्वार्थचिन्तामणि' में भी कहा गया है कि—विवेक के द्वारा विशाल मोहान्धकार
का विदलन हो जाने पर योगी के स्वरूप का उदय हो जाता है । अनात्मभाव का
तिरस्कार हो जाने के कारण वह प्रत्येक दशा में अपने परमानन्दस्वरूप में मग्न रहता है ।
वह द्रष्टा-दृश्य के विवेक का रहस्य समझ गया । संसार का ऐसा कोई क्ष्मा करण या
कोण नहीं है जहाँ वह नहीं है भवरोग मिट गया । उसके व्युत्थान में भी समाधि है ।
सच्ची मोक्षलक्ष्मी तो उसकी आत्मजा है—१
इत्थं तत्तदनल्पमोहदलनप्राप्तस्वरूपोदयो,
योगी नित्यमनात्मभावविरहात् स्वात्मस्थितो निर्वृतः ।
दृश्य द्रष्टृ विवेकविद्धवपदव्यापी विमुक्तामयो,
व्युत्थानेऽपि समाधिभागभवति सन्मोक्षश्रियः कारणम् ॥
अब ग्रन्थकार, 'ज्ञान ज्ञेय .... चिन्मयः' कारिका में प्रबुद्ध योगी के लिए उपक्रान्त
उपदेश्यत्व की पुष्टि करके अगली तीन कारिकाओं में अप्रबुद्धों के प्रतिषेध के विषय में
कह रहा है ।'
'अतः ...... अधिगच्छति ॥'—
अतः = इसलिए । प्रस्तुत व्याख्यान में श्लोकत्रय में निर्दिष्ट होने के कारण
जाग्रदेव = जागते हुए ही । अर्थात् प्रबुद्ध ही ।
निजं भावं = आत्मीय पारमार्थिकी सत्ता ॥ अचिरेण = शीघ्र ही । अल्पीयस
काल में । अधिगच्छति = सम्यक् रूप में उपलब्धि के द्वारा स्वीकृत करता है । (एव-
कारेणाप्रबुद्धं व्यवच्छिनत्ति) ॥ कैसा होकर स्वीकार करता है—'स्पन्दतत्त्वविविक्तये
सततमुद्युक्तः ॥'
स्पन्दस्य = स्पन्द का ॥ पर शाक्ततत्त्व का, उपचरित सामान्य विशेषात्मक रूप
से दो प्रकार से व्याख्यास्यमान तत्त्व का । वह तत्त्व परमार्थ है और उपादेय एवं हेय के
रूप में उसका रूप निश्चित है । विविक्तये = विवेक अर्थात् पृथक्करण के लिए ।२
परमकारणभूत, आत्मस्वरूप सत्य का—'यह मैं हूँ' ('अयमहमस्मि') अतः यहीं
सब कुछ उत्पन्न होता है एवं यहीं सब कुछ विलीन हो जाता है—इस प्रकार का प्रत्यव-
मर्शात्मक निज धर्म सामान्यस्पन्द है—'अयमहमस्मि, अतः सर्वं प्रभवति, अत्रैव च
प्रलीयते—इति प्रत्यवमर्शात्मिको निजो धर्मः सामान्यस्पन्दः' । विशेष स्पन्द क्या हैं?
विशेषस्पन्द के लक्षण (१) ये अत्यन्त हेय हैं (२) ये अनात्मभूत देहादिक पदार्थों में
आत्माभिमान की उद्भावना करते हैं । (३) ये आपस में भिन्न-भिन्न मायीय प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न विषय हैं—यथा—मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ । (४) ये गुणमय प्रत्यय-प्रवाह
संसरण के मूल कारण हैं । 'अत्यन्त हेया विशेषस्पन्दा अनात्मभूतेषु देहादिषु आत्मा-
भिमानमुद्भावयन्तः परस्परभिन्न मायीय प्रमातृविषयाः—सुखितोऽहं, दुखितोऽहं—इत्यादयो
गुणमयाः प्रत्यय प्रवाहाः संसारहेतवः ॥'
१. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।