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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 338 of 519

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Page 338

प्रथमः निष्यन्दः २३७
आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं आत्मिक अभ्युत्थान के लिए विकल्प-संस्कार की
विधि का प्रतिपादन अभिनवगुप्त की निजी दृष्टि है।
अभिनवगुप्त की विकल्प-संस्कार-प्रक्रिया—यदि साधक अपने विकल्पों का
संस्कार करे क्योंकि 'उद्योग' 'प्रयत्न' की मुख्य पद्धति यही है।
विकल्पों का संस्कार किया कैसे जाय?
१) संसारोन्मुख, भोगोन्मुख (कामिनी)-काञ्चन एवं अन्य ऐन्द्रिय उपभोगों के प्रति
सतृष्ण) प्रवाहित विकल्पों के मार्ग को परिवर्तित करना और
२) इस विकल्प-प्रवाह को स्वरूप-चिन्तन की दिशा में संलग्न करना—इन दोनों
प्रयासों से विकल्पों का संस्कार होता है और 'प्रयत्न' एवं 'उद्योग' का मुख्य कार्य है।
गुणादि स्पन्दों के निष्यन्द प्रत्येक क्षण आत्मा के यथार्थ स्वरूप पर आवरण
डालते रहते हैं—
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपंथिनः ॥'
'विकल्प' प्रत्येक कालखण्ड में मायिक उपलब्धियों एवं ऐन्द्रिय उपभोगों एवं
स्वार्थों के पूर्त्यर्थ प्रवृत्त रहता है। परिणाम—
कुत्सित विकल्प—कुत्सित संस्कार । सांसारिक विषयों की मूर्ति की तृष्णा—
चित्त को कभी भी स्थैर्य प्राप्त न होना । अहर्निश विकल्पसंस्कार, सत्परामर्श द्वारा
बाह्योन्मुखी प्रसार से विरति—चिद्रूप संवित् में एकनिष्ठ एकाग्रता प्राप्त करने का 'उद्योग'
(प्रयत्न)—चित्त में परिमार्जित (संस्कार युक्त) विकल्पोद्भव—असत् विकल्पों का ह्रास ।
संस्कृत विकल्प भी अन्ततः हैं तो विकल्प ही अतः उनका भी त्याग आवश्यक है।
विकल्प संस्कारों की अनेक भूमिकायें हैं यथा—
'चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटन् स्फुटितात्मकः ॥'
विकल्प संस्कार की भूमियाँ
┌──────────┬──────────┬──────────┐
१ २ ३ ४
अस्फुट स्फुटतोन्मुख स्फुटता की पूर्ण प्रस्फुटित
और विकसित
अपनी चरमावस्था में पहुँचा विकल्पसंस्कार का यह स्तर असत् संस्कारों का ध्वंस
कर देता है।
ततः स्फुटतमोदार ताद्रूप्य परिबृंहिता ।
संविदभ्येति विमलाभे विकल्पस्वरूपताम् ॥ (तन्त्रालोक)