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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 322 of 519

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Page 322

प्रथमः निष्यन्दः २२१
यह अवस्था अधिष्ठातृ नही अधिष्ठेय अवस्था है—
यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रतमुदाहृतम् ॥ (तं० १०.२३१)
स्वप्नावस्था—इस अवस्था में संवित् भट्टारिका विमर्श शक्ति वैकल्पिक ज्ञानरूप
में स्पन्दायमान होकर जाग्रत अवस्था के ही घट पटादिक प्रमेय पदार्थों को संकल्परूप से
अवभासित करती है । वही प्रमेय, प्रमाता, प्रमा सभी कुछ (स्वप्न में) बनकर अवस्थित
होती है । 'जाग्रतावस्था' प्रमेयप्रधान (ज्ञेय प्रमुख) होने के कारण 'प्रमेयपद' एवं
स्वप्नावस्था ज्ञानप्रधान होने के कारण 'प्रमाण पद'—कहलाती हैं । यह अधिष्ठानावस्था
है । निर्मल सुषुप्ति क्या है? स्वप्नावस्था के कारण उकार का मकार में, अभिमान के
कारण का बुद्धि में लय, बुद्धि आदि तीनों के प्रेरक मकारादि तीनों का सुषुप्तिस्थान भूत
तालूमूल में देहेन्द्रियवृत्तिरहित ज्ञेय-ज्ञातृ-ज्ञान की त्रिपुटी के रूप में अवस्थान ही 'निर्मल
सुषुप्ति' है । —'शैवपरिभाषा' ।
मुख्य सुषुप्ति अवस्था—यह पूर्णस्वाप की अवस्था है । यह प्रगाढ़ निद्रा नहीं है ।
यह समाधि की अवस्था है । इसे सुषुप्ति की अवस्था इसलिए कहते हैं क्योंकि—जाग्रत
एवं स्वप्न का अनुभविता चिन्मात्र रूप में स्थित रहकर जाग्रत के 'ज्ञेयरूप' एवं स्वप्न
के 'ज्ञानरूप' वेद्य पदार्थों के प्रति सुप्त हो जाता है । इसकाल में वेद्यता पूर्णतया
विगलित होकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है अपितु तब तक संस्कार रूप में
वर्तमान, रहती है । इसे ही 'मुख्य मातृ दशा' भी कहा गया है । इस अवस्था में
ज्ञेयरूपता एवं वैकल्पिक ज्ञानरूपता के समस्त क्षोभ शान्त हो जाने के कारण प्रमाता
मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहता है । अधिष्ठातास्वरूप (अन्तः संवेदनात्मक) प्रमेय-
भाव (बाह्य प्रमेय विश्व बीज) संस्कार रूपात्मक बन कर मानों गंभीर निद्रा में निमग्न हो
जाते हैं ।
यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
निर्मल जाग्रतावस्था (शैवपरिभाषा)—अकार-उकार-मकार-विन्दु-नाद से अधि-
ष्ठित शिवशक्तियोग से निर्मलान्तःकरण आत्मा हृदय में स्थित रहकर समस्त दृश्यमान
प्रपंच को शिवाकारतया वैषयिक सुख को स्वरूपानन्दतया अनुभव करता है और यह
अनुभव ही है—निर्मल जाग्रत अवस्था ॥ निर्मल स्वप्न क्या है? जाग्रतावस्था के कारण
अकार का उकार में, बाह्यविषयों के ग्राहक मन का अहंकार में, अहंकारादि-चतुष्टय
उकारादि चतुष्टय के साथ कण्ठ में 'सोऽहं' भावना के साथ अवस्थान ही निर्मल स्वप्न है।
तुर्यावस्था—सुषुप्तिकाल का प्रमाता जागृतावस्था में प्रमाता होते हुए भी
सुषुप्तिकालीन अनुभवों को जागृतावस्था में अनुभव नहीं कर पाता । सुषुप्तिकाल का
अन्त होते ही संस्कारानुगत वेद्यता पुनः उदित हो जाती है और चिन्मात्ररूपता भेदावृत हो
जाती है । इस समय विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं रह जाते । यह विशुद्ध
प्रमारूपा है—