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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

About this granth

This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.

Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.

Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.

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प्रथमः निष्यन्दः २०५
इस दृष्टि से पादार्थिक जगत् और उसके विभिन्न रूप नश्वर हैं और उसका ज्ञाता रूप
अनश्वर है।१
सर्वज्ञत्व आदि गुणों का केन्द्र जो अन्तर्मुखी भाव है उसका लोप कभी नहीं होता।
'अन्तर्मुख' का अर्थ है—पदार्थ से (बाह्यार्थ से) विरुद्ध। अर्नुख 'ज्ञाता' है। यह वह है
जिसमें पराहंता (Supreme Egoity) का अधिपत्य है। 'अन्तर्मुखभाव' का अर्थ है—
ज्ञातृत्व आदि गुणों की परमास्पद चेतन सत्ता।२
देश कालादि से परिच्छिन्न कार्य की निवृत्ति होती है। अन्तर्मुख भाव जो बाहर
नहीं फैलता है स्वस्वरूपस्थ-स्वस्वभाव सर्वज्ञता आदि गुणों का आश्रय है, उस भाव की
निवृत्ति कभी नहीं होती। क्यों नहीं होती?
—इसलिए नहीं होती क्योंकि चिद्रूप के अतिरिक्त द्वितीय की उपलब्धि नहीं
होती। उसी की सर्वत्र, सर्वदा उपलब्धि होती है। जैसा कि कहा भी गया है कि—'देश-
काल-क्रिया एवं आकारों से परिच्छिन्न वस्तुओं में आप ही अनवच्छिन्न रूप से प्रकाशित
हो रहे हैं, क्योंकि आप उनसे बाहर हैं॥'—
देशकालक्रियाकारैरवच्छिन्नेषु वस्तुषु।
अनवच्छिन्नरूपस्त्वं भासि तस्य बहिः स्थितेः ॥'३
यही अन्यत्र भी कहा गया है। इसमें यह कहा गया है कि—सर्वज्ञता, ज्ञान आदि
में भेद नहीं है क्योंकि चिद्रूप ज्ञान की सब विभिन्न स्थितियाँ हैं।
'भेदः सर्वज्ञादीनां ज्ञानादीनां च नास्त्यमी।
ज्ञानस्यैव धर्मतया चिद्रूपस्य स्थितिर्यतः ॥'४
'षाड्गुण्य विवेक' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—'सभी गुणों के आदि अन्त
में ज्ञान ही होता है। केवल इसीसे तत्त्व का निश्चय हो जाता है। बल, वीर्य, ओज
आदि की शक्तियाँ धर्मरूप से स्वीकार हैं॥'५
'कक्ष्यास्तोत्र' में भी कहा गया है कि बाह्य विमर्श के कारण शक्ति अविद्या एवं
'ज्ञान' सर्वज्ञता है। बल तृप्तिमूलक है। अनादिबोध तेज है अतः बल का मूल बोध है।
'तेज' प्रभाव है जो दूसरों को झुका देता है।६
यही ईश्वर है और इसका स्वातन्त्र्य ही ऐश्वर्य है—
'बलस्य तृप्तिमूलत्वात् क्षमस्य तदभावतः।
आनादिबोधस्तेजोऽत्र बोधमूलं हि तत्सदा ॥'
कहा भी गया है७—
'प्रभाव लक्षणं यच्च तेजः प्रह्वयते परान्।
बोधत्वादेव तद्ग्रेह्यं बोधं प्रह्वयते जगत्।
स्वतन्त्रताऽत्र चैश्वर्यं स्वातन्त्र्यादीश्वरस्य तु ॥'
१-२. स्पन्दनिर्णय। ३-७. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।

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२०६ स्पन्दकारिका
इसे ही किसी ने कहा है कि—यह संविदात्मा समस्त कृत्यों में स्वतन्त्र है। न
किसी का नियोज्य है और न विघ्नवान्। प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनों दशाओं में यह ईश्वर
ही है। यह अलुप्तशक्ति एवं अविनाशी है—१
'स्वतन्त्रः सर्वकृत्येषु न नियोज्यो न विघ्नवान्।
प्रवृत्तोऽस्य प्रवृत्तो वा यतस्तेन त्वमीश्वर ॥
वीर्यं सदाऽलुप्तशक्तिः नाशाभावश्च तद्गतः ॥'
इसका वीर्य यह है कि इसकी आत्मसत्ता कभी परिभ्रष्ट नहीं होती। यह कार्य में
अन्वित नहीं होता, स्वयं होता है। आभूषण में स्वर्ण की अनुगति नहीं है—वह स्वर्ण
ही है। स्वर्ण का कण-कण स्वर्ण है। कहा भी गया है—२
आत्मसत्वापरिभ्रंशलक्षणाद्वैर्यमासत: ।
वीर्यादितच्च ते कार्येऽनन्वयः स्वर्णवच्च यः।
अनन्तशक्तिः शक्तिः सा सामर्थ्यात् सर्वतः सदा ॥'३
तस्य = उसका। परमार्थसत परम तत्त्व का।
कदाचित् = किसी समय।
लोपः = लुप्त होना। स्वरूपोच्छेद।
अन्यस्य = अन्य का उससे व्यतिरिक्त अनित्य वेद्य वस्तु का।
अनुपलंभनात् = अनुभव के अभाव के कारण।
किसका लोप नहीं होता? जो 'अंतर्मुख' (भिन्न रूप से स्थित बाह्य वेद्य के
अभाव के कारण जो स्वान्तःमुख है) अर्थात् जिसका 'मुख' (शक्ति) स्वात्मा में अवस्थित
है—उसका लोप नहीं होता।
भाव = आत्मा नामक तत्त्व।
सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् = सर्वज्ञता आदि गुणों का केन्द्र। समस्त वेद्यवर्ग एवं वेदक
वर्ग के गुणों या धर्मों का अनन्यसाधारण अधिकरण।
आत्मा की 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो प्रकार की शक्तियाँ हैं और वे पुरुषावस्था में
अन्तःकरण-बहिष्करण व्यापार के उपशान्त हो जाने पर केवल स्वात्म मात्राभिमुखशक्ति-
मात्र रूप से अवशिष्ट रह जाती हैं। यही है उनका अन्तर्मुखीभाव। 'मुख' का अर्थ है
शक्तिः 'मुखशब्देन च शक्तेः व्यवहारो दृष्टो'—'शैवीमुखमिहोच्यते' (पारमेश्वर)। बाह्य
विषयों के ग्रहण न होने मात्र से योगी भ्रमवश उस भाव को अभाव मानने लगते हैं।
अनुपलंभ = (अन + उप + लभ् + घञ् + नुम्)। = अप्राप्ति। अनुपलब्धि।
नित्यवर्तमान एवं अविलुप्त पराशक्ति के भाव का भला लोप कैसे संभव है क्योंकि
आत्मा से व्यतिरिक्त अन्य वस्तु की सत्ता ही नहीं है। केवल अज्ञान (मोह) के कारण,
अपने स्वरूप को भूला हुआ व्यक्ति, इस तथ्य को नहीं समझ पाता। प्रबुद्ध व्यक्ति तो
१-३. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।

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प्रथमः निष्यन्दः २०७
उसे समझता है और साथ ही उसकी प्राप्ति के उपायों का भी उपदेश देगा। व्युत्थाना-
वस्था में अवश्य उस प्रकार की अनुभवात्मक विशिष्ट अवस्थाओं की विपरीत भावों के
कारण अनुपपत्ति हो सकती है किन्तु यह एक व्यामोह है।१
स्पन्द का अन्तर्मुख भाव कभी नष्ट नहीं होता —शाश्वत अहंरूप में स्पन्दाय-
मान चैतन्य सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान है।
उसका कभी नाश नहीं होता क्योंकि समाधि में किसी अन्य सत्ता का अनुभव नहीं होता।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—'न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढ-
स्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात्
तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति इति ॥'२
अन्तर्मुखभाव = आभ्यान्तर संवित्तिचक्र के रूप में सतत स्पन्दायमान रहने के
स्वभाव वाला और सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान ॥
इस वेदक सत्ता से अतिरिक्त अन्य सत्ता का न अभाव होने के कारण स्पन्दतत्त्व
चिद्रूप होने के कारण व्योमवत् है और यह आकाशवत् विभु चैतन्य सत्ता प्रत्येक दशा में
अनुभूति का विषय बनता है।
अन्तर्मुखो भावः = 'भाव' = 'भू' मूलधातु से 'भाव' निष्पन्न होता है और
'भाव' का अर्थ है—'सत्ता' या अस्तित्व। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१.५.१४) में कहा
गया है कि—भाव का अर्थ है—काल से कवलित न होने वाली सत्ता। स्वतन्त्र कर्तृत्व
ही भाव या सत्ता है। प्रत्येक क्रिया के निष्पादित करने की क्षमता, एवं नित्य सत्तासीनता
ही 'भाव' है 'सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥'३
'देवदत्त युद्ध करता है' इस वाक्य में युद्ध करना एक क्रिया को संकेतित करता
है। क्रिया का सम्पादन तो किसी कर्ता के द्वारा होता है अतः कर्ता एवं क्रिया दो सत्ताएं
हैं। 'युद्ध करना' तो एक क्रिया है और इस क्रिया का कोई करने वाला होना चाहिए।
यह करने वाली सत्ता ही देवदत्त नामक कर्त्ता है। क्रिया के पूर्व उसकी वर्तमानता
आवश्यक है। अन्यथा क्रिया सम्पन्न ही नहीं हो सकती। समष्टि में भी यही नियम लागू
होता है। जगत् कार्य है और परमात्मा कर्ता है।
नित्यरूप में स्थायी यह कर्तृत्व 'अहं विमर्शात्मक स्पन्द' है। यही स्पन्द 'विमर्श
शक्ति' के नाम से भी प्रख्यात है। जगत् के प्रत्येक अणु को सत्ता प्रदान करने वाला जो
विश्वप्राण चैतन्य है वही विमर्श शक्ति (कर्तृत्व) है। आचार्य उत्पलदेव ने इस अनिर्वाच्य
भाव सत्ता को 'महासत्ता' 'स्फुरत्ता' 'सार' एवं 'हृदय' कहा है—
'सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'४
१. रामकण्ठाचार्य-'स्पन्दकारिकाविवृति'। २. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति ।
३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.५.१४)।

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२०८ स्पन्दकारिका
यही समस्त जड़ एवं चेतन दोनों भावों की विश्रान्ति का स्थान है—'हृदय' है—
प्रतिष्ठा स्थान है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तस्यापि विमर्शशक्तिः ॥'१ यही
महासत्ता 'विश्व जीवन' है—
'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ॥'
विश्व में जितनी भी जड़ सत्ताएँ हैं उन सभी की विश्रान्ति का एक मात्र स्थान यही
महादेवी है—यही विमर्श शक्ति या हृदय है।
'अन्तर्मुखोभावः' पदावली में 'भावः' पद—'कर्तृसत्ता' (कर्तृत्व) का बोधक है।
आत्मचैतन्य की नित्यता—कारिकाकार का कथन है कि 'अन्तर्मुख भाव' जो कि
शाश्वत रूप में अहं रूप में स्पन्दायमान है वह चेतन सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व आदि
गुणों का मूलाधिष्ठान है अतः उसका लोप (विनाश) कभी नहीं होता क्योंकि किसी भी
अन्य अतिरिक्त सत्ता की विद्यमानता का अनुभव किसी को भी नहीं होता।
इसी विचार को भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इस प्रकार कहते हैं—'न तु यः
अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढस्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात्
द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति ॥'२
सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों के भेद—
तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी ।
नित्यं स्यात्सुप्रबुद्धस्य तदाद्यन्ते परस्य तु ॥ १७ ॥
सुप्रबुद्ध योगी को उस (चैतन्यस्वभाव) की सम्प्राप्ति जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति
इन तीनों अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में समान एवं निरन्तर होती रहती है।
(किन्तु इसके विपरीत) प्रबुद्ध योगी को (इन तीनों अवस्थाओं में) से प्रथम (जाग्रत
अवस्था) की दो अवस्थाओं में (स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं में ही) चिद्रूप स्वभाव की
प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥

  • सरोजिनी *
    कारिकाकार ने इस कारिका में 'सुप्रबुद्ध' 'प्रबुद्ध' योगियों की अनुभूतियों का
    तुलनात्मक विवेचन किया है।
    तदाद्यन्ते = (आचार्य रामकण्ठ—'तत' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की
    'आदि'—प्रथम । जाग्रत अवस्था के । 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों में (स्वप्न एवं
    सुषुप्ति में) रामकण्ठाचार्य-भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या में 'स्वप्न सुषुप्तादौ'
    शब्दों का प्रयोग करके—स्वप्न, सुषुप्ति एवं आदि (संवेदन की समस्त अवस्थाओं) को
    द्योतित किया है।
    भट्टकल्लट ने इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है—
    १. शिवसूत्रविमर्शिनी । २. स्पन्दसर्वस्व ।
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प्रथमः निष्यन्दः २०९
'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु नित्यं
सुप्रबुद्धस्य भवति, तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तूर्यौ त्वागममात्र-
गम्यौ ॥ १७ ॥'
शास्त्रों में जगत् के निखिल प्रमाताओं को निम्न भेदों में विभाजित किया है—(१)
'अबुद्ध' (२) 'बुद्ध' (३) 'प्रबुद्ध' (४) 'सुप्रबुद्ध' ॥ इन्हीं में से 'प्रबुद्ध' एवं 'सुप्रबुद्ध'
प्रमाताओं की अनुभूतियों का यहाँ तुलनात्मक विवेचन किया गया है ।
सुप्रबुद्ध (Fully enlightened) को सदैव एवं नित्य उस सत्य तत्त्व का ज्ञान
है जो कि उक्त तीनों अवस्थाओं में अचल रूप से स्थित है तथा अन्य लोगों के लिए
प्रारंभ एवं अन्त में ।
तस्य = प्राकरिक उपलब्धि की ॥
उपलब्धिः = अनवच्छिन्न प्रकाश ।
त्रिपदा = जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति 'आद्यन्ते' आदि (मध्य) एवं अन्त में ।
अव्यभिचारिणी = अनपायिनी । शङ्करात्मस्वस्वभावा रूप में स्फुरित ।
परस्य = अप्रबुद्ध लोगों का ॥१
अज्ञानी भी 'स्पन्दतत्त्व' से प्रभावित होता है और ज्ञानी भी किन्तु—
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।'—'स्पन्द के निष्यन्द अज्ञानियों को
पतित बनाने के लिए उद्यत रहते हैं । अतः अपने विकस्वर स्वभाव द्वारा स्पन्दतत्त्व का
विवेक करने के लिए सर्वदा प्रयास करते रहना चाहिए ॥२
'अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा ॥ १३ ॥
सौषुप्तपदवन्मूढ़ प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥ १५ ॥
'प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत्' (३।१२)—द्वारा उसी भाव को व्यक्त किया गया है ।
अप्रबुद्धों को इसकी उपलब्धि मात्र आदि और अन्त में ही हो पाती है—'अप्रबुद्धस्य
तदाद्यन्तेऽस्ति तदुपलब्धिः' ।
जागृति आदि तीनों अवस्थाओं में तथा आदि-अन्त एवं मध्य तीनों अवस्थाओं में
प्रबुद्ध ज्ञानप्रभ रहता है—३
'जाग्रत् स्वप्न सुषुप्तभेदे तुर्याभोग संभवः ॥' (शिव सूत्र १।७)
इसके द्वारा भी इसी की पुष्टि की गई है । 'त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेव्यम् (शि०सू०
३।१०) त्रितय भोक्ता वीरेशः ।' (शि०सू० १।११) द्वारा भी इसी सत्य की पुष्टि की
गई है ।४
योगी को चिद्रूप आत्मा की निरन्तर उपलब्धि एवं अनुभूति होती है । योगी
कैसा? जो सदैव सावधान रहे (या जागता) रहे । उपलब्धि कैसी? जो जाग्रदादि तीनों
अवस्थाओं में बनी रहे, निवृत्त न हो । वह कार्यदशा में भी निर्भ्रान्त है । कहा भी गया
——————————————
१-४. स्पन्दनिर्णय ।
सं० १४

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२१० स्पन्दकारिका
है—'ऐसी कोई अवस्था नहीं है जिसमें संवित् नहीं रहती अतः योगी चिद्घनस्वरूप की
ही उपासना करते हैं।' १
काप्यवस्था न ते साऽस्ति यस्यां संविन्न वर्तते ।
तेन चिद्घनमेतत्वां योगिनः पर्युपासते ॥
यदि योगी पूर्णप्रबुद्ध न हो तो भी कार्य के आदि अन्त में संवित् का अनुभव होता
है । कार्य की प्रथमावस्था और अन्तिमावस्था चिन्मय ही होती है—
'तदादौ प्रागवस्थायां तदन्तेऽपि च तन्मये ।
पदं प्रत्ययवाद्यन्ते जाग्रत्तूर्येष्ववाग्मात् ॥' २
कार्य की मध्यावस्था संविद्रूप होने पर भी अन्य रूप से भासित होता है । इसका
अभिप्राय यह भी हो सकता है कि आदि, अन्त, मध्य, जाग्रत, स्वप्न सर्वत्र प्रबुद्ध योगी
को संवित् की ही स्पष्टतः उपलब्धि होती है । ३
'व्यतिरिक्तस्वभावोपलब्धि' नामक इस द्वितीय निष्यन्द की यह प्रथम कारिका है
तथा 'स्वरूपस्पंद' निष्यन्द की सत्रहवीं कारिका है ।
इस प्रकार पूर्वोक्त कारिकाओं में देहादिक अनात्म तत्त्वों से व्यतिरिक्त (भिन्न)
स्वानुभूतिगम्य एवं स्वानुभवसिद्ध आत्मतत्त्व की उपपत्तियों से व्यवस्थापित करके अब
उसके प्राप्ति के उपायों के उपदेश के अवसर पर (१) सुप्रबुद्ध (२) प्रबुद्ध (३) अप्रबुद्ध-
तीन प्रकार के वेदकों के विषय से सम्बद्ध प्रकरण पर प्रकाश डाला जा रहा है ।
तस्य = उसका । यथापूर्व प्रतिपादित स्वात्मा रूप परमात्मा का ॥
उपलब्धिः = प्राप्ति अनुभवात्मक निर्विकल्पा प्रतिपत्ति ॥
नित्य = सदैव । सदैव सभी अनुभव-दशाओं में ।
सप्रबुद्धस्य = सुष्ठु + प्रबुद्धः + तस्य ॥ अत्यन्त उच्च आत्मज्ञानी । अर्थात्
देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहंप्रत्ययरूप दीर्घस्वप्न से युक्त मोहमहानिद्रा से स्वल्पमात्र भी
जिसका संवित् आवृत नहीं हुआ हो ऐसे सिद्ध सम्यग्दर्शी ज्ञानी का ॥
सततम् = लगातार । बिना किसी व्यवधान के ।
त्रिपदाव्यभिचारिणी = जागर-स्वप्न-सुषुप्ति नामक पदों में । इन तीन संवेदन-
भूमिकाओं में 'अव्यभिचारिणी' अविसंवादिनी । किसी भी अवस्था के द्वारा अनभिभूत
होने के कारण अव्यवहितसंनिधि ॥
इस प्रकार के 'सुप्रबुद्ध' स्वीकृतस्वात्मा (स्वस्वभाव को अपनी स्वात्मा मानकर
आत्मस्थ योगी) लोगों के लिए यह उपदेश नहीं है क्योंकि वे तो कृतकृत्य हैं ।
अपरस्य—दूसरे का । उसके समनन्तर किसी दूसरे 'प्रबुद्ध' का अर्थात्
परशक्तिपात से आविर्भूत प्रमातालोक वाले माया तमिश्रा के विलुप्त हो जाने के कारण
समुन्मिषित विवेकचक्षु वाले एवं मोहोत्साह-संपदा से मुक्त योगी पुरुष का ॥
१-३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

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प्रथमः निष्यन्दः २११
तदाद्यन्ते—तब आदि एवं अन्त में।
जागर-स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों पदों का आदिभूत जो पद (जाग्रदवस्थात्मक
पद)। उस पद का जो अन्तर्भूत पद है अर्थात् स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक पद। वहाँ पर
उसकी (आत्मतत्त्व की) उपलब्धि होती है।
त्रिपद-स्वप्नसुषुप्तादौ ॥
यहाँ 'आदि' शब्द स्वप्न—सुषुप्ति अवस्था में संगृहीत स्मृति मोह आदि अवस्था
के परिग्रह का वाचक है।
इस व्याख्यान का आशय यह है कि—यहाँ द्विविध आत्मतत्त्व को उपलब्धि का
उपदेश दिया गया है। ये दो प्रकार निम्नानुसार हैं—(१) सर्वव्यतिरिक्त चिन्मात्रस्वरूप
(२) विश्वात्मक और उसकी शक्तिचक्र का विषय।
सुषुप्ति-स्वप्नरूप पदद्वय में भी 'प्रबुद्ध' योगी के लिये यह उपदेश उपादेय नहीं
है। जैसे कि सुप्रबुद्ध के लिए पदत्रय में—जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों में, क्योंकि उनकी
तत्त्वोपलब्धि हो चुकी है और वह भी बिना प्रयत्न के।
पदद्वयवर्ती संवित् के प्रत्यवमर्शमात्र से तत्वोपलब्धि होती है—यह प्रतिपादित
किया जा चुका है। जब समस्त विकल्प रूप वेद्योँ के विगलित हो जाने पर योगी प्रबोध
दशा में निष्केवला सुषुप्तावस्था का परामर्श करता है। तब समस्त उपरागों से रहित और
स्वरूप मात्र में विश्रान्त, नित्य अविलुप्त, चेतयितृमात्र स्वभाव वाले आत्मा (आत्म-
तत्त्व) स्वयं प्राप्त हो जाता है।
जब स्फुटतर अवभास से युक्त चेतन और अचेतन से युक्त भावचक्र निर्माणमयी
अपनी स्वप्नावस्था का योगी परामर्श करता है तब उसी दृष्टान्त के द्वारा प्रबोध के बल से
स्वस्वभाव परम कारण परमेश्वर की, व्यतिरिक्त कारणान्तर से निरपेक्ष होकर और मात्र
अपनी स्वेच्छा से सर्वकर्तृता रूप तत्त्व प्राप्त कर लेता है।
जहाँ तक अप्रबुद्ध की बात है वह सैकड़ों प्रयत्न करने पर भी समर्पित तुम्बक तोय
द्रव्य के समान अन्तर का स्पर्श नहीं सकता—
अप्रबुद्धस्य पुनरेतत् प्रयत्नशतैरपि समर्प्यमाणं तुम्बकतोयद्रव्यवत् नान्तः स्पर्शं
करोति ॥
इन दोनों पदों में 'प्रबुद्धं' को ही उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। किन्तु इसे
जाग्रत्तूर्याख्य पद द्वय में इसे भी उपलब्धि नहीं मिल पाती—
'परिशिष्टे जाग्रत्तूर्याख्ये पदद्वये सा अस्य नास्ति इति अर्थात् उक्तं भवति ॥'
अतः जागरावस्था में शब्दादिविषयग्रहण में व्यग्र इन्द्रियव्यापार व्यवहित व्यक्ति
को, तथा तुर्यावस्था में (लोकोत्तर एवं अत्यन्त अपरिचित होने के कारण) स्वयमेव
अत्यन्त दुर्लक्ष परतत्त्व की प्राप्ति के लिए प्रबुद्ध व्यक्ति को भी उपदेशों की अपेक्षा होती
है। वृत्तिकार ने कहा भी है—
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

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२१२ स्पन्दकारिका
'जाग्रत्तुर्यौत्वागममान्तगम्यौ' 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य'।
प्रबुद्ध एवं सुप्रबुद्ध योगियों की अनुभूतियों में भेद
प्रस्तुत स्पन्द सूत्र क्र० १७ में 'प्रबुद्ध' एवं 'सुप्रबुद्ध' योगियों की आभ्यन्तरिक
अनुभूतियों में भेद का विवेचन किया गया है जो निम्नांकित है—
(१) सुप्रबुद्ध की अनुभूति—'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी'
(२) प्रबुद्ध की अनुभूति-तदाद्यन्तेऽपरस्य तु ॥ १७ ॥

सुप्रबुद्ध की अनुभूति—प्रबुद्ध की अनुभूति—
१) इनकी उपलब्धि अखण्डात्मिका एवं सततं प्रवाहात्मिका होती है।१) इनकी उपलब्धि 'तदाद्यन्त' होती है।
२) इनकी उपलब्धि न तो 'सतत' होती है और न तो 'नित्य' होती है।
२) यह अनुभूति नित्य होती है (तस्योपलब्धिः सततं। नित्यं स्यात् सुप्रबुद्धस्य।)३) 'तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तुर्यौ त्वागममात्रगम्यौ।' <br> —भट्टकल्लट—स्पन्दसर्वस्व
३) इनकी उपलब्धि—(स्पन्दसूत्र) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में 'सतत' एवं 'नित्य' रूप से विद्यमान रहती है। —भट्टकल्लटः 'स्पंद स०'४) 'तदाद्यन्ते'='तत्' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की। 'आदि' = प्रथम = जाग्रतावस्था। 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों (स्वप्न एवं सुषुप्ति में) <br> —स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)
४) 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु नित्यं सुप्रबुद्धस्य भवति॥' <br> —'स्पन्दसर्वस्व'
'तदाद्यन्ते' पदावली आचार्य क्षेमराज ('स्पन्दनिर्णय') भट्टकल्लट ('स्पन्द-
सर्वस्व') रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिकाविवृति) एवं भट्ट लोल्लट आदि सभी विद्वानों के
लिए अनुसंधेय बनी रही। सूत्र का वास्तविक अभिप्राय क्या है? यह अनुसंधान का एवं
जिज्ञासा का विषय बना रहा।
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि सुप्रबुद्ध योगियों में जाग्रत्-स्वप्न-
सुषुप्ति—इन अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में आत्मानुभव अखण्डरूप से
प्रवाहित रहता है।
प्रबुद्धयोगियों को यह आत्मानुभव मात्र स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था में प्राप्त
होता है—भट्टकल्लट।
प्रश्न—क्या प्रबुद्ध योगियों को भी स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थाओं में सुप्रबुद्धों
की ही भाँति ही अखण्ड, एकरस, अविरल एवं तैलधारावत् आत्मानुभव प्राप्त होता
रहता है या नहीं ? क्या इन दो अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में सुप्रबुद्धों की ही
भाँति 'सतत' एवं 'नित्य' अनुभूति प्राप्त होती रहती है या नहीं ? रामकण्ठाचार्य ने
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प्रथमः निष्यन्दः २१३
भट्ट कल्लट के दिशा-निर्देशन में ही स्पन्द सूत्रों की व्याख्या की है किन्तु वहाँ भी स्थिति
सुस्पष्ट नहीं हो पायी है ।
कतिपय आचार्यों को रामकण्ठाचार्य द्वारा प्रस्तुत 'तदाद्यन्ते' की व्याख्या मान्य
नहीं है । उनके कथनानुसार—
१) प्रबुद्ध योगी को स्वप्न के अन्त एवं सुषुप्ति के आदि में (स्वप्न से सुषुप्ति में
प्रवेश के समय) दोनों अवस्थाओं के मध्यवर्ती संधि-क्षण में स्पन्दात्मक स्वभाव की
अनुभूति विद्युत स्फुलिंग की भाँति अति अस्थायी रूप में होती है ।
२) साधना की अग्रवर्ती यात्रा में प्रबुद्ध योगी (सुप्रबुद्धावस्था में) जाग्रत-स्वप्न-
सुषुप्ति की तीनों अवस्थाओं के आदि-मध्य-अन्त में इस आत्मानुभूति का समान रूप से
अखण्डात्मक स्वरूप में सतत अनुभव करता रहता है—यही दोनों की आत्मानुभूतियों के
कालिक स्थिरता में भेद है ।
प्रमाताओं की श्रेणियाँ—प्रमाताओं की चार श्रेणियाँ हैं । जिन्हें कि 'मालिनी-
विजय' (२-४३) नामक ग्रन्थ में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है ।
प्रामातृ-समूह (प्रमाता-श्रेणी)
┌───────────┬───────────┴───────────┬───────────┐
'अबुद्ध' 'बुद्ध' 'प्रबुद्ध' 'सुप्रबुद्ध'
'चतुर्विधं तु पिण्डस्थमबुद्धं बुद्धमेव च । प्रबुद्धं सुप्रबुद्धं च'—मा०वि०
१) अबुद्ध प्रमाता—भगवान् की तिरोधानात्मिका शक्ति द्वारा संहारावस्था में
अवस्थित प्रमाता अबुद्ध प्रमाता हैं । उनकी अवस्था अंधकारावृत गहन गुहा में प्रगाढ़
निद्रा में निमग्न अजगरों की भाँति विसंज्ञावस्था है । वे कालरात्रि एंव प्रकृति (गुणत्रय की
साम्यावस्था) के गर्भ में मूढ़वत् स्थित हैं । उनकी आत्मा की चैतन्यावस्था अख्याति के
अभेद्य वज्रावरण से आच्छादित रहती है । इस अवस्था में शब्दादिक विषयों का ग्रहण भी
नहीं कर सकते और सद्भाव, असद्भाव, सुख-दुःख की संवेदना आदि से शून्य रहते
हैं—('स्वच्छन्दतन्त्र' ११.९१-९५)
२) बुद्ध प्रमाता—'स्वच्छन्दतन्त्र' (११.९६-११२) में बुद्ध प्रमाताओं का विशद
विवेचन किया गया है ।
संहारावस्थास्थित इन अबुद्ध प्रमाताओं में से कर्मपरिपाक होने की स्थिति में
'अनन्तभट्टारक' (अशुद्धाध्व के स्वामी) स्वेच्छा से इन प्राणियों को उनके संचित एवं
प्रारब्ध कर्मों के आधार पर उनके योग्य योनि में जन्म देते हैं । अनन्तभट्टारक उनमें,
'कलातत्त्व' के माध्यम से, चेतना का अविर्भाव करके उन्हें स्थूल शरीर प्रदान करते हैं
और वे जन्म-मरण के चक्र में पड़कर अनन्त योनियों में जन्म लेकर संसरण करते रहते
हैं । ये ही हैं—स्थूल शरीरी संसारी जीव या 'पशु' हैं । इनका प्रधान उद्देश्य होता है
विषयोपभोग की कामना और उसकी पूर्ति । ये आत्मचिन्तन से विरत रहते हैं ।

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२१४ स्पन्दकारिका
३) प्रबुद्ध प्रमाता—शिवानुग्रह, शक्तिपात आदि कारणों से बुद्ध प्रमाताओं में से
कतिपय प्रमाताओं के हृदय में सांसारिक विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और ये
प्रमाता सतर्क, भक्ति एवं सद्ज्ञान का आश्रय लेकर और जागत एवं जागतिक संबन्धों
को इन्द्रजाल मानकर आत्मशोध की ओर अग्रपद होते हुए अपनी तीव्रतम आत्मोत्कण्ठा
की भूमिका पर आरूढ़ होने पर (शाङ्कर मार्ग में दीक्षित होकर) प्रबुद्ध भाव को अतिक्रान्त
करके सुप्रबुद्धभूमि पर पदार्पण करते हैं।
४) सुप्रबुद्ध प्रमाता—प्रबुद्ध प्रमाता अपनी एकनिष्ठ भक्ति, सद्ज्ञान एवं
परमात्मानुग्रह से अनुगृहीत होकर साधना-पथ पर अग्रपद होता हुआ शङ्कर रूप गुरु से
दीक्षा प्राप्त करके योगमार्ग के उच्च शृंगों पर पदार्पण करते हुए तुर्यात्मक शाक्त भूमिका पर
आरूढ़ होकर स्वस्वभाव का साक्षात्कार करके शिवत्व प्राप्त कर लेता है। यह प्रमाता
'वर्ण', 'पद', 'मन्त्र', 'कला', 'तत्त्व', 'भुवन' नामक ६ मार्गों को अतिक्रान्त करके त्रि-
कालाबाधित, समरस्त, प्रशान्त, चिद्रूप एवं स्वस्वभावात्मक शिवभाव अधिगत कर लेता
है। वह 'चक्रेश्वरत्व' प्राप्त कर लेता है—स्वयं शिव हो जाता है और 'शिवोऽहं शिवोऽहं
शिवोऽहं शिवोऽहं' के रसानुभूति-रत्नाकर में लय हो जाता है। यही है उसकी
नित्योदित समाधि या जीवन्मुक्ति की अवस्था जिसमें 'पूर्णांहन्ता' का स्वानुभव योगी
को नित्य समरस शिवशक्ति के सामरस्य में आपादमस्तक निमज्जित करके उसे शिव बना
देता है। यही है आत्म प्रत्यभिज्ञा—स्वरूपावस्थान की अद्वैतात्मक उच्चतम अवस्था।
विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप—
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ १८ ॥
पराशक्ति से समवेत एवं सर्वव्यापक आत्म चैतन्य जाग्रत अवस्था में मात्र 'ज्ञेय'
पदार्थों के रूप में एवं स्वप्नावस्था में मात्र ज्ञान स्वरूप होकर प्रकाशित होता है किन्तु वह
अन्यत्र (सुषुप्ति एवं तुरीय अवस्थाओं में) चिन्मात्र रूप में ही प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥

  • सरोजिनी *
    आत्म चैतन्य (स्पन्दतत्त्व) किस अवस्था में कौन सा स्वरूप धारण करके
    प्रकाशित हुआ करता है—इसी विषय का इस कारिका में विवेचन किया गया है।
    'पद' = अवस्थायें।
    अवस्थायें
    जाग्रत अवस्था | स्वप्नावस्था | सुषुप्ति अवस्था | तुरीयावस्था | तुरीयातीत अवस्था
    (सामान्य स्पन्दभूमि) | (पूर्णचिन्मयावस्था)
    मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित
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प्रथमः निष्यन्दः २१५
तुरीयावस्था = (१) जो जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति को अस्तित्व प्रदान करती
है। (२) जिसमें जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति लय हो जाती हैं । (३) जिसमें पूर्वोक्त तीन
अवस्थायें मुख्यता, अमुख्यता (मिश्रण) का भेद उत्पन्न ही नहीं कर सकतीं ॥ (४)
जाग्रत, स्वप्न सुषुप्ति से अतीत अवस्था । (इसमें मुख्य अमुख्य भेद भी संभव नहीं है)
पूर्ण चिन्मात्र अवस्था। यह स्वयं पूर्ववर्ती अवस्थाओं को सत्ता देती है ।
विभु = सर्वव्यापक आत्मतत्त्व ॥
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या—ज्ञानज्ञेय स्वरूपिणी शक्ति के द्वारा ।¹
शक्त्या परमया युतः—अपनी परमा शक्ति से संवलित होकर ।
पदद्वये = जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था में ।
अन्यत्र = सुषुप्ति एवं तुरीयावस्था में ।²
सुप्रबुद्ध योगी की तीनों पदों (जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति) में कैसी उपलब्धि रहती
है—उसकी इस श्लोक में विवेचना की गई है । सर्वव्यापक (All-pervading)
परमात्मा अपने को दो अवस्थाओं में व्यक्त करता है—
१) प्रथमतः ज्ञान एवं ज्ञेय के रूप में सर्वोच्चशक्ति प्राप्त के रूप में ।
२) द्वितीयतः चैतन्य के साथ अभिन्न (एकीकृत चिन्मय रूप में ।³
पराशक्ति से संयुक्त, सर्वव्यापक, शङ्करात्मा, स्वभावस्थ परमात्मा, स्वस्वरूप एवं
स्पन्द तत्वात्मा के रूप में अवस्थित शिव जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में स्फुरित
होता है । वहाँ वह सदाशिव विश्व को ईश्वर के समान अपने शरीरांग के समान समझता
है—‘तत्र हि विश्वं असौ सदाशिव ईश्वरवत् स्वांगवत पश्यति’—किन्तु अन्यत्र (सुषुप्ति
एवं तुरीय में) नहीं ।⁴ ‘त्रिपदाव्यभिचारिणी’ कहकर तो तीनों अवस्थाओं में इसकी
व्याप्ति कही गई है फिर जाग्रत एवं स्वप्न मात्र में ही उसकी व्याप्ति क्यों कही गई और
सुषुप्ति या तुर्यावस्था को क्यों छोड़ दिया गया ? क्योंकि सुषुप्ति की अवस्था
मोहपंकिल होती है जबकि जागृति एवं स्वप्न की अवस्था साधकों के शिवाराधना से
समवेत रहती है अतः यहाँ मात्र दो पदों का ही उल्लेख किया गया है । शिवाराधना की
दृष्टि से जाग्रत-स्वप्न अधिक चिन्मय रहते हैं अपेक्षाकृत मोहात्मक सुषुप्ति के । एक
सुप्रबुद्ध योगी तीनों अवस्थाओं में किस प्रकार तत्त्व साक्षात्कार करता है—इसकी
विवेचना की गई ।⁵ तुरीयावस्था की तुलना में तो जाग्रतस्वप्न महत्त्वपूर्ण नहीं हैं किन्तु
मोहात्मक सुषुप्ति की तुलना में तो वे ज्यादा उत्कृष्ट दशायें हैं ही क्योंकि इसमें
शिवाराधना होते रहने से उनमें चिन्मयत्व अधिक रहता है ।
अवस्थायें : ‘ज्ञानं जाग्रत, स्वप्नो विकल्पः अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र)।
‘सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा ।
सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातृणां स जागरः ॥’⁶
१-५. स्पन्दनिर्णय । ६. महार्थमञ्जरी ।

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२१६ स्पन्दकारिका
आरोहण के स्तर पर (पूर्ण शिव भाव की स्थिति में) शक्ति के ५ मुख कहे गये
हैं जो निम्नांकित हैं—
'चित्', 'निवृत्ति', 'इच्छा', 'ज्ञान', एवं 'क्रिया'
माया के प्रभाव से (अवरोहण के स्तर पर) उक्त ५ शक्तियाँ—विमर्श या स्वातन्त्र्य
शक्ति-'माया' बन जाती है और 'चित्' इच्छादिक शक्तियाँ—'कला' 'विद्या' 'राग'
'काल' एवं 'नियति', बन जाती हैं— माया - 'कला'
(१) 'कला'—सर्वकर्तृत्व को किंचित् कर्तृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(२) 'विद्या'—सर्वज्ञातृत्व को अल्प ज्ञातृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(३) 'राग'—तृप्त की अतृप्ति, अपूर्णमन्यता रूप आसक्ति में परिवर्तित कर देता है।
(४) 'काल'—नित्यता को अनित्यता में परिवर्तित कर देती है।
(५) 'नियति'—व्यापकता को अव्यापकता में बदल देती हैं।
स्वातन्त्र्य शक्ति माया तत्त्व
शक्ति पंचकंचुक
(चितः) सर्वज्ञता — (विद्याः) — अल्पज्ञता।
(निवृत्तिः) सर्वकर्तृत्व — (कल) — अल्पकर्तृत्व।
(इच्छाः) पूर्णत्व — (राग) — अपूर्णता।
(ज्ञानः) नित्यता — (काल) — अनित्यता
(क्रियाः) व्यापकता — (नियति) — अव्यापकता
'माया' = अन्तरंग आवरण ।। पूर्ण संवित् को आवृत कर लेता है।
देह, प्राण, पुर्यष्टक, इन्द्रियाँ = बहिरंग आवरण ।।
तत्र सृष्ट्युन्मुखो भगवान् शुद्धाध्वनि वर्तमानः स्वशक्तिभिः
१) मायां विक्षोभ्य 'कलातत्त्व'—किंचित्कर्तृत्वलक्षणं पुद्गलस्य सृजति।¹
२) ततोऽपि किंचिदवबोधाख्यं 'विद्यातत्त्वं'
३) किंचिदभिलाषरूपं च 'रागतत्त्वं' तदेतत्सरोगं कर्तृत्वं ।२
४) भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यतेवत 'कालतत्त्वं'
५) तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् नियति तत्त्वं—
तदेतत् कंचुक षट्कम् अन्तर्मलावृ³तस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् :
माया कला शुद्धविद्या राग कालौ नियंत्रणा ।
षडेतान्यावृतिवशात्कंचुकानि मितात्मनः ।।
एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कंचुकवत्स्थितः ।
तुषवत्कंचुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ।।'४
————————————————————————
१-३. जन्ममरणविचार। ४. चिल्लाचक्रेश्वरमत।

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प्रथमः निष्यन्दः २१७
'कला' पुरुष में परिमित कर्तृत्व का निर्माण करती है और इसके द्वारा सुख
दुःखमोह रूप भोग्य का सृजन करती है ।
'कला'—कला से ही अष्टगुणात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है ।
सात्विक-राजस-तामस भेदभिन्न त्रिस्कंध अहंकार उत्पन्न होता है ।
अहंकार—मन को जन्म देता है । इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं
तन्मात्रा होती हैं । पंचभूत उत्पन्न होते हैं ।
इस प्रकार एक ही आदिदेव की स्वातन्त्र महिमा के द्वारा संसार में संसरण करने
वाले प्रमाता को परिमितप्रमातृत्व प्राप्त होता है—
'भूतानि तन्मात्रगणोनेन्द्रियाणि, मूलं पुमान्कंचुकयुक्तसुशुद्धम् ।
विद्यादि शक्त्यन्तमियान्स्वसंवित्, सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'१
चिद्रूप परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है और अत्यन्त उत्कृष्ट सामर्थ्य से युक्त है । वह
जाग्रत और स्वप्न में देदीत्यमान रहता है । उसकी शक्ति ही ज्ञान और ज्ञेय दोनों है ।
इसी से दोनों अवस्थाओं में दो प्रकार का कार्य करती हैं । दो प्रकार की उपलब्धि होती
है । इन दोनों अवस्थाओं में अन्यत्र सुषुप्ति और तुरीय दोनों अवस्थाओं में वह चिन्मात्र
ही रहता है क्योंकि वह ज्ञेय नहीं ज्ञान स्वरूप ही रहता है ।२
'विभुः' = व्यापक । 'ईश्वरश्चिन्मात्रमूर्तिरात्मा' ।
'पदद्वये' = जागर एवं स्वप्न नामक अवस्थाओं में ।
'परमया' = अत्यद्भुतरूप वाला होने के कारण सर्वातिशायिनी (शक्ति) के द्वारा ।
'शक्त्या' = निजी सामर्थ्य के द्वारा । शक्ति के द्वारा ।
'युतः' = सहित ॥ 'भाति' = प्रकाशित होता है । प्रकाशते, चकास्ति ॥
किस प्रकार की शक्ति के द्वारा ? 'ज्ञानज्ञेय स्वरूपिण्या' = ज्ञायतेऽनेन इति
ज्ञानं । बाह्याभ्यन्तर करणचक्र ग्रहणात्मक या ज्ञप्तिमात्र या 'ज्ञेय'—ग्राह्यः शब्दादिसुखादि
च विषयजातमनन्तविशेष । उस प्रकार का रूप जिसका हो वह 'ज्ञेयस्वरूपिणी' उस
ज्ञेयस्वरूपिणी के द्वारा ॥
परमेश्वर ही अपनी माया के वशीभूत होकर विविधात्मक क्षेत्रज्ञरूप द्वारा
अवभासमान होकर अपनी अव्यतिरिक्ता पराशक्ति को 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' भाव से
अवभासित करते हुए जागर-स्वप्न दशा वाले व्यवहार को उद्भावित करता है । यही
है उस शक्ति का पारम्य । अपने वैभवस्वरूप की प्रकाशमानता का अतिरोध करती हुई
शक्ति ज्ञान-ज्ञेय के अनन्त रूपों में स्फुरित होती है 'स्वस्य वैभवरूपस्य प्रकाशमानतां
अतिरोधधती ज्ञानज्ञेयमयानन्तरूपतया स्फुरति ॥'
द्वैतात्मक (अभेदप्रथन) स्थिति के मायांधकार में—अन्यत्र = अपरत्र । सुषुप्ति
१. जन्ममरणविचार में उद्धृत । २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

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२१८ स्पन्दकारिका
एवं तुर्यावस्था में। पदद्वय से अन्यत्र । चिन्मय = 'चेतयत इति चित् उपलब्धृ-स्वभाव
आत्मा ईश्वरः तन्मात्रप्रकृतिः ।। 'अन्यत्र' (सुषुप्ति एवं तुर्यावस्था) को उन दोनों (जागर-
स्वप्न) पदों से व्यतिरिक्त होने के कारण (क्योंकि यहाँ वेदनीय का अभाव रहता है)
निष्कलस्वात्ममात्रविश्रान्तशक्ति रूप ईश्वर ही प्रकाशित होता है । जागर एवं स्वप्न ज्ञान-
ज्ञेय से युक्त अवस्थायें हैं तथा सुषुप्ति एवं तुर्य अवस्थायें चिन्मयत्व से युक्त अवस्थायें
हैं । जागर एवं स्वप्न की अवस्थायें स्थैर्य एवं अस्थैर्य प्रतिपत्ति के विकल्पों से निर्मित
हैं । ईश्वर परिकल्पित सर्ग जागरावस्था में दृढ़ता से प्रतिपादित होता है किन्तु स्वप्न में
स्थैर्यहीनता के साथ । 'स्वप्नावस्था का सर्ग क्षेत्रज्ञपरिकल्पित होता है (जीवात्मा-निर्मित
होता है) सुषुप्तावस्था में इन दोनों पदों की स्थिति से भिन्नता है । यहाँ तो चिन्मात्ररूप
तत्त्व के रहने पर भी मोह के वशीभूत होकर— 'अहं' इस उपलब्धृ-चमत्कार से रहित
होने के कारण असत् के समान प्रतीति होती है । 'तुर्य पद' में भी तो उसी जागृति-
स्वप्न-सुषुप्ति के संवित् तत्त्व की उपलब्धि होती है किन्तु भेद यह है कि यहाँ उसकी
उपलब्धि आत्मा के रूप में होती है—'तस्यैव तु तत्त्वस्य परमार्थसत्तया आत्म-
त्वेनोपलब्धिस्तुर्यपदे—इत्ययं सुषुप्ततुर्ययोर्भेदः ।।'
इसी से चारों पद—(१) 'विश्व' (२) 'तैजस' (३) 'प्राज्ञ' एवं (४) 'तुर्य' नाम से
प्रसिद्ध हैं । 'ज्ञान ज्ञेयभेदेन द्विरूपम्' की यही व्याख्या है । प्रश्न यह उठता है कि—
जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था तो ज्ञान-एवं ज्ञेय से युक्त होकर एवं सुषुप्तावस्था तथा
तुर्यावस्था चिन्मयत्व के द्वारा प्रकाशित हैं अतः प्रकाशन की दृष्टि से तो दोनों में
अभिन्नता है अतःपद तो केवल दो ही हैं फिर पदचतुष्टय की बात कैसे कही जाती है?
—इसी के उत्तर स्वरूप ऊपर कहा गया कि ये चार पद निम्न हैं—(१) विश्व, (२)
तैजस, (३) प्राज्ञ, (४) तुर्य ।
ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय के रूप त्रिपुटी के विभाग (विभाजन) के विभ्रम के ध्वस्त होने पर
एकमात्र (अद्वितीय) परमार्थ सत् चित्रप्रकाशैकरूप, तथा उसी प्रकार के स्वभावानुभवितृता
मात्र धर्म के लक्षण वाले तत्त्व की जो जिज्ञासा होती है उसी उद्देश्य से—'तदन्यत्र तु
चिन्मयः' कहा गया है ।१
पदत्रय ('त्रिपदाव्यभिचारिणी' का० १७, 'पदद्वये' १८)
┌─────────────────┼─────────────────┐
(१) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
┌────┼────┐ ┌────┼────┐ ┌────┼────┐
जाग्रत जाग्रत जाग्रत स्वप्न स्वप्न स्वप्न सुषुप्ति सुषुप्ति सुषुप्ति
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
(२) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
┌──┴──┐ ┌──┴──┐ ┌──┴──┐
मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य
१. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।

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प्रथमः निष्यन्दः २१९
(३) त्रिपद के अतिरिक्त अवस्थायें— [ तुरीयावस्था
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ [ तुरीयातीतावस्था
(४) योगियों की अवस्थायें—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यते .... ।
योगियों का जागरण \ \ \ \ \ \ योगियों का स्वप्न \ \ \ \ \ \ योगियों की सुषुप्ति
(ध्यान) \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ (धारणा) \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ (समाधि)
इन समस्त अवस्थाओं में अनुभविता (वेदक) एक ही स्पन्द तत्त्व (आत्मा) है ।
शैवपरिभाषा में अवस्थाओं के भेद—(शिवाग्र योगीन्द्र ज्ञानशिवाचार्य)—
केवलावस्था \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सकलावस्था \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ शुद्धावस्था
सप्रतिभा जाग्रदवस्था \ \ अप्रतिभा जाग्रदवस्था \ \ १) आत्मा का कंठावस्थान = 'स्वप्न' ॥
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ २) आत्मा का हृदयावस्थान = 'सुषुप्ति' ॥
जाग्रत \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ स्वप्न \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सुषुप्ति \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ तुरीय \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ तुरीयातीत
निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल
जाग्रदवस्था \ \ \ स्वप्नावस्था \ \ \ सुषुप्तिअवस्था \ \ \ तुरीयावस्था \ \ \ तुरीयातीतावस्था
(१) तुरीयावस्था—'यदा नाभिस्थाने प्राणवायुना द्वितीय आत्मा तिष्ठति तदा
तुरीयावस्था ॥'
(२) तुर्यातीतावस्था—'यदा तु मूलाधारे तत्त्वतात्विकादीन् सर्वान्विहाय आत्मैवैक
प्राणवावृतस्तिष्ठति तदा तुर्यातीतावस्था ॥
'पशवस्त्रिविधा ज्ञेयाः सकलः ।
प्रलयाकलः विज्ञानाकल... ॥' —'शैव परिभाषा' ॥
पशुओं (मितप्रमाता रूप आत्मा) के भेद
सकल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ प्रलयाकल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ विज्ञानाकल
आत्मा की अवस्थायें—१) 'केवलावस्था' २) 'शकलावस्था' ३) 'शुद्धावस्था'
(आत्मनस्तिस्रोऽवस्थाः केवलावस्था, सकलावस्था, शुद्धावस्था चेति ।)
पशु = अवस्थाभेदोपेतो मलसम्बद्धचिद्रूपो व्यापकः पशुरिति ॥ —'शैवपरिभाषा'

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२२० स्पन्दकारिका
अवस्थायें कितनी ही बदलती जायें किन्तु अवस्था नहीं बदलता । 'जाग्रत'
'स्वप्न', 'सुषुप्ति', 'तुर्य', 'तुर्यातीत' अवस्थाओं में अवस्थाता (प्रमाता = पशु) किन-
किन रूपों में अवस्थित होता है ?

अवस्थाआत्मा का स्वरूप-धारणअनुभविता
१. जाग्रत अवस्थाआत्मा = ज्ञेयपदार्थों का रूप धारण करने वालीआत्मा
२. स्वप्नावस्थाआत्मा = ज्ञान का रूप धारण करने वालीआत्मा
३. सुषुप्ति और तुर्यावस्थाआत्मा = चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान होने वालीआत्मा
(१) 'ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे जाग्रतत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम् ।'
(२) 'सुषुप्ततुर्यात्मके पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः ।'
(३) 'न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥'—'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट)
'ज्ञानरूपता' = स्वप्नावस्था से सम्बद्ध है ॥
'ज्ञेयरूपता' = जाग्रतावस्था से सम्बद्ध है ॥
'जाग्रत' 'स्वप्न' 'सुषुप्ति' = ध्यान-धारणा-समाधि ॥
'ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥' (का० १८)
(१) जाग्रत अवस्था में शक्ति का स्पन्दन (स्फुरणा) का रूप = 'ज्ञेयता' ।
(२) स्वप्नावस्था में शक्ति-स्फुरण संकल्प विकल्पात्मक 'ज्ञप्ति' ॥
(३) सुषुप्ति अवस्था में शाक्त स्फुरणा चिन्मय है किन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है ।
(४) तुर्यावस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी नहीं रहते अतः इसमें शक्ति स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ।
जाग्रत अवस्था—मेयभूमिरियं मुख्या जाग्रदाख्या' (तं० १०.२४०) ।
प्रमेयभूमिका के रूप में यह अवस्था मुख्य अवस्था है । विमर्श शक्ति (संवित् भट्टारिका) प्रमेय भूमिका पर अवरोहरण करती हुई प्रमेय, प्रमाण, प्रमा, एवं प्रमाता बन कर विश्व के रूप में स्पंदित होती है । इस अवस्था में वेद्य पदार्थ व्यावहारिक सत्य है अन्तः संवेदन ही वेद्य पदार्थ के रूप में रूपान्तरित होता है । इस अवस्था में स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति ही ज्ञेय (प्रमेय) बनकर प्रस्तुत करती है । आन्तर घट पट आदि वेद्य पदार्थों का अवभासन ही बाह्य घट, पट है—
'तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तः प्रवेदने ।
संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ॥
यन्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते ।
कथञ्चिदप्यधिष्ठातृ भावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥
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प्रथमः निष्यन्दः २२१
यह अवस्था अधिष्ठातृ नही अधिष्ठेय अवस्था है—
यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रतमुदाहृतम् ॥ (तं० १०.२३१)
स्वप्नावस्था—इस अवस्था में संवित् भट्टारिका विमर्श शक्ति वैकल्पिक ज्ञानरूप
में स्पन्दायमान होकर जाग्रत अवस्था के ही घट पटादिक प्रमेय पदार्थों को संकल्परूप से
अवभासित करती है । वही प्रमेय, प्रमाता, प्रमा सभी कुछ (स्वप्न में) बनकर अवस्थित
होती है । 'जाग्रतावस्था' प्रमेयप्रधान (ज्ञेय प्रमुख) होने के कारण 'प्रमेयपद' एवं
स्वप्नावस्था ज्ञानप्रधान होने के कारण 'प्रमाण पद'—कहलाती हैं । यह अधिष्ठानावस्था
है । निर्मल सुषुप्ति क्या है? स्वप्नावस्था के कारण उकार का मकार में, अभिमान के
कारण का बुद्धि में लय, बुद्धि आदि तीनों के प्रेरक मकारादि तीनों का सुषुप्तिस्थान भूत
तालूमूल में देहेन्द्रियवृत्तिरहित ज्ञेय-ज्ञातृ-ज्ञान की त्रिपुटी के रूप में अवस्थान ही 'निर्मल
सुषुप्ति' है । —'शैवपरिभाषा' ।
मुख्य सुषुप्ति अवस्था—यह पूर्णस्वाप की अवस्था है । यह प्रगाढ़ निद्रा नहीं है ।
यह समाधि की अवस्था है । इसे सुषुप्ति की अवस्था इसलिए कहते हैं क्योंकि—जाग्रत
एवं स्वप्न का अनुभविता चिन्मात्र रूप में स्थित रहकर जाग्रत के 'ज्ञेयरूप' एवं स्वप्न
के 'ज्ञानरूप' वेद्य पदार्थों के प्रति सुप्त हो जाता है । इसकाल में वेद्यता पूर्णतया
विगलित होकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है अपितु तब तक संस्कार रूप में
वर्तमान, रहती है । इसे ही 'मुख्य मातृ दशा' भी कहा गया है । इस अवस्था में
ज्ञेयरूपता एवं वैकल्पिक ज्ञानरूपता के समस्त क्षोभ शान्त हो जाने के कारण प्रमाता
मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहता है । अधिष्ठातास्वरूप (अन्तः संवेदनात्मक) प्रमेय-
भाव (बाह्य प्रमेय विश्व बीज) संस्कार रूपात्मक बन कर मानों गंभीर निद्रा में निमग्न हो
जाते हैं ।
यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
निर्मल जाग्रतावस्था (शैवपरिभाषा)—अकार-उकार-मकार-विन्दु-नाद से अधि-
ष्ठित शिवशक्तियोग से निर्मलान्तःकरण आत्मा हृदय में स्थित रहकर समस्त दृश्यमान
प्रपंच को शिवाकारतया वैषयिक सुख को स्वरूपानन्दतया अनुभव करता है और यह
अनुभव ही है—निर्मल जाग्रत अवस्था ॥ निर्मल स्वप्न क्या है? जाग्रतावस्था के कारण
अकार का उकार में, बाह्यविषयों के ग्राहक मन का अहंकार में, अहंकारादि-चतुष्टय
उकारादि चतुष्टय के साथ कण्ठ में 'सोऽहं' भावना के साथ अवस्थान ही निर्मल स्वप्न है।
तुर्यावस्था—सुषुप्तिकाल का प्रमाता जागृतावस्था में प्रमाता होते हुए भी
सुषुप्तिकालीन अनुभवों को जागृतावस्था में अनुभव नहीं कर पाता । सुषुप्तिकाल का
अन्त होते ही संस्कारानुगत वेद्यता पुनः उदित हो जाती है और चिन्मात्ररूपता भेदावृत हो
जाती है । इस समय विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं रह जाते । यह विशुद्ध
प्रमारूपा है—

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२२२ स्पन्दकारिका
'यत् प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम्।
पूर्णता गमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ॥—तत्तुर्यमुच्यते ॥ (तं०)
यही है शिवभाव में प्रवेश का द्वार। इस स्तर पर मायीय औदासीन्य शान्त हो
जाता है। स्पन्द सूत्र में इसे ही—ज्ञान क्रिया की शाश्वत स्पन्दात्मिका (शाक्त भूमिका)
विमर्श भूमिका कहा गया है। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थायें तुर्या में लय हो
जाती हैं और प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में, प्रमाता प्रमा में लय हो जाते हैं। यह
अवस्था साक्षात् शाक्त समावेशात्मक अभेद व्याप्ति की अवस्था है। यह चिन्मात्रस्वरूप
अवस्था है यह तीनों अवस्थाओं में व्याप्त रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है। तीनों
अवस्थायें इसी तुर्यावस्था में लयीभूत हो जाती हैं। यह अवस्था विशुद्ध प्रमारूप है और
रजशून्य, विमल, अखण्ड एवं चिन्मात्र है। यही मातृदशा भी है—
'मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ॥'
सुषुप्ति की अवस्था के लक्षण निम्नांकित हैं—
१) अनुभूतौ विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ॥ (तं०)
२) यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम्।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णीभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
तुर्यावस्था वह अकथ्यावस्था है जहाँ मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं
रह जाते। यह अवस्थात्रय का लयीभाव है। यहाँ प्रमेय प्रमाण में एवं प्रमाण प्रमाता में
लय हो जाता है—'मेयं माने मतरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम्। विश्राम्यति ... ॥'
यही है शक्तिसमावेद + शाक्तसमावेश युक्त अभेद व्याप्ति की दशा भी यही है—
'शक्तिसमावेशा ह्यसौ मतः ॥' (तं०) ॥
गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पन्द का अन्तर्सम्बन्ध—
गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ १९ ॥
गुणादि स्पन्दों (विशेष स्पन्दों) के प्रवाहों के 'सामान्य स्पंद' (प्रतिष्ठित स्पन्द) पर
आश्रित होने के कारण वे सदा उनसे ही अपना अस्तित्त्व प्राप्त करते हैं। (ये अनन्त एवं
नित्य प्रवहमान गुणादि विशेष स्पंद) तत्त्वज्ञों के (स्वरूप के) आच्छादक (परिपन्थी) नहीं
बना करते ॥ १९ ॥

  • सरोजिनी *
    स्पन्द अहं विमर्शात्मक हैं। 'स्पंद' विश्वोन्मुखी सङ्कल्पात्मक उन्मुखता है। इसका
    स्वरूप 'अहं प्रत्यविमर्श' है। 'स्पन्द' विमर्शरूप, उच्छलाना पूर्ण एवं सङ्कल्पात्मक हैं।
    अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं' के रूप में विमर्श करते हुए सर्वत्र अपनी
    ही अनुभूति 'पूर्णाहन्ता' है।
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प्रथमः निष्यन्दः २२३
गुणस्पन्दों के अनन्त प्रवाह हैं। स्पन्दशक्ति का प्रथम बहिर्मुखी निष्पंद प्राण हैं।
गुणस्पन्द = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण के स्पन्द ॥
अनन्त रूप में प्रवहमान अनन्त प्रकारक विकल्प-प्रत्यय ही विशेष स्पंद है।
निष्यन्द = प्रवाह । अपरिपन्थी = अनाच्छादक ॥ 'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—१.
सामान्य स्पंद, २. विशेष स्पंद। प्रतिष्ठित स्पन्द एवं अप्रतिष्ठित स्पन्द भी इन्हीं के
पर्याय हैं। गुणादिस्पंद ही विशेष स्पंद हैं।
अब ग्रन्थकार इस तथ्य को प्रतिपादित करता है कि सुप्रबुद्ध योगी को जागृति-
स्वप्न-सुषुप्ति, आदि-मध्य-अन्त आदि कोई भी अवस्था साधना-मार्ग में बाधा नहीं
पहुँचा पातीं। १
गुण = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण।
निष्यन्द-प्रवाह। ब्रह्माण्ड का बुच्छादितुच्छ पदार्थ से लेकर महनीय पदार्थ भी
स्पन्द शक्ति का ही एक प्रवाह है। स्पंद की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ जो कि गुणों के साथ
आरंभ होती हैं एवं जिनकी सत्ता व्यापक स्पंद तत्त्व पर आधृत है—ज्ञाता का विरोध
कभी नहीं करतीं। २
गुण = प्रकृति के गुणत्रय। मायातत्त्वावस्थित तीन गुण। 'स्वच्छन्दतन्त्र' में कहा
गया है—
अधश्छादयन् मूर्ध्वं च रक्तं शुक्लं विचिन्तयेत्।
मध्ये तमो विजानीयात् गुणास्त्वेते व्यवस्थिताः ॥ (२।६५) ॥
परिपन्थी = स्वस्वभावाच्छादक, विरोधी।
ज्ञ = सुप्रबुद्ध।
निष्यन्द = नीलसुखादि। स्पन्दों के प्रसर।
स्पन्द = कलादिक्षित्यन्त तत्त्व।
संश्रयात् = आश्रय ग्रहण करने से । ३
पारमेश्वरी, ज्ञान-क्रिया-माया शक्तित्रितय द्वारा सदाशिव आदि पद में स्फुरित होकर
सङ्कोच के प्रकर्ष द्वारा, सतोगुण—रजोगुण एवं तमोगुण रूपी क्रीड़ाशरीर का आश्रय
लेती है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' (३।३।४) में कहा गया है—
स्वांगरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या।
माया तृतीयेव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ (३।३।४) ४
शाश्वत एवं स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति जब बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होती है
तब उसका सर्वप्रथम परिणामन—प्राण के रूप में ही होता है।
'तेनाहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता ॥ (तं० ६.१२)


१-४. स्पन्दनिर्णय।

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२२४ स्पन्दकारिका
तस्योपलब्धिर्योक्ता सा गुणस्पन्दादिभिः स्थितैः ।
कुतस्त्या चेति साशंका ये तान् प्रत्युच्यते त्विदम् ॥
प्रश्न यह उठता है कि जब गुणस्पन्दादि अनेक पदार्थ स्थित हैं तब उसकी
उपलब्धि कहाँ । इस शंका पंक का प्रक्षालन करते हुए ग्रन्थकार—'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः
.... परिपन्थिनः ॥' कारिका कहता है ।
सत्त्व, रज एवं तम ये तीनों गुण एवं महान्, अहंकार आदि के जो स्पंद हैं उन्हीं
के निष्यन्द (प्रवाह)—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगें हैं । वे सामान्य स्पन्द के
अन्तर्लीन अनन्त विशेषों का आलम्बन प्राप्त करके ही सत्तावान् होते हैं । अतः तत्त्वज्ञ
योगी के स्वरूप में उनसे कोई व्यवधान नहीं पड़ता । वे योगी के विरोधी नहीं, प्रत्युत्
स्वरूप के विलास हैं । जैसे पुष्प का रस उसके स्वभाव का आच्छादक नहीं है उसी
प्रकार स्पन्द के निष्पंद अरविन्द के मकरन्द के समान ही हैं । एकसिद्ध ने कहा भी है—
'प्रकाश के राजमहल में प्रकाश्य वस्तु दिखाई नहीं पड़ती । अनन्त संविद् में
संवेद्य भी संविद्रूप है'—
'यद्गतप्रकाशभवने प्रकाश्यविषयो न दृश्यते मातः ।
संपर्कात्तव तद्वत् संविद्वेद्ये न भाव्यते जातु ॥'
'मातंगपारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह
जो विस्तीर्ण मार्ग है, वह चिद्वस्तु से सिद्ध होता है और उसी से जाना जाता है ।
गीता में भी कहा गया है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतत्तरन्ति ते ॥' (७।१४)१
गुणादि = सतोगुण रजो गुण एवं तमोगुण । ये गुणादि स्पन्द के निष्यन्द ही हैं
जो कि ज्ञाता पुरुष के परिपंथी (विरोधी) हैं ।
स्पन्दानाम = क्षेत्रज्ञ की ज्ञानादिक शक्तियों के ।
निष्यन्द = नाना अर्थों की ओर उन्मुख होने से प्रसृत प्रवाहों का समूह अर्थात्
विभिन्न प्रत्यय ही हैं 'स्पन्दनिष्यन्दः' 'निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसुताः प्रवाहा भिन्नाः
प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥'
गुणादि = गुण आदि ॥ महत्तत्त्व (प्रधान) जिससे किये गुणत्रय आविर्भूत होते हैं
तथा गुणत्रय ॥
सुखादिक से युक्त होने के कारण सत्त्वादिमय गुणादिक—
स्पन्दनिष्यन्द—'अहं सुखी, दुःखी मूढः' आदि अनेक प्रकार के ज्ञान-भेद । ये
किस रूप के हैं? 'सामान्यस्पन्दसंश्रयात् लब्धात्मलाभाः ॥' हैं ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलदेवाचार्य ।