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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 313 of 519

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Page 313

२१२ स्पन्दकारिका
'जाग्रत्तुर्यौत्वागममान्तगम्यौ' 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य'।
प्रबुद्ध एवं सुप्रबुद्ध योगियों की अनुभूतियों में भेद
प्रस्तुत स्पन्द सूत्र क्र० १७ में 'प्रबुद्ध' एवं 'सुप्रबुद्ध' योगियों की आभ्यन्तरिक
अनुभूतियों में भेद का विवेचन किया गया है जो निम्नांकित है—
(१) सुप्रबुद्ध की अनुभूति—'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी'
(२) प्रबुद्ध की अनुभूति-तदाद्यन्तेऽपरस्य तु ॥ १७ ॥

सुप्रबुद्ध की अनुभूति—प्रबुद्ध की अनुभूति—
१) इनकी उपलब्धि अखण्डात्मिका एवं सततं प्रवाहात्मिका होती है।१) इनकी उपलब्धि 'तदाद्यन्त' होती है।
२) इनकी उपलब्धि न तो 'सतत' होती है और न तो 'नित्य' होती है।
२) यह अनुभूति नित्य होती है (तस्योपलब्धिः सततं। नित्यं स्यात् सुप्रबुद्धस्य।)३) 'तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तुर्यौ त्वागममात्रगम्यौ।' <br> —भट्टकल्लट—स्पन्दसर्वस्व
३) इनकी उपलब्धि—(स्पन्दसूत्र) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में 'सतत' एवं 'नित्य' रूप से विद्यमान रहती है। —भट्टकल्लटः 'स्पंद स०'४) 'तदाद्यन्ते'='तत्' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की। 'आदि' = प्रथम = जाग्रतावस्था। 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों (स्वप्न एवं सुषुप्ति में) <br> —स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)
४) 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु नित्यं सुप्रबुद्धस्य भवति॥' <br> —'स्पन्दसर्वस्व'
'तदाद्यन्ते' पदावली आचार्य क्षेमराज ('स्पन्दनिर्णय') भट्टकल्लट ('स्पन्द-
सर्वस्व') रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिकाविवृति) एवं भट्ट लोल्लट आदि सभी विद्वानों के
लिए अनुसंधेय बनी रही। सूत्र का वास्तविक अभिप्राय क्या है? यह अनुसंधान का एवं
जिज्ञासा का विषय बना रहा।
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि सुप्रबुद्ध योगियों में जाग्रत्-स्वप्न-
सुषुप्ति—इन अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में आत्मानुभव अखण्डरूप से
प्रवाहित रहता है।
प्रबुद्धयोगियों को यह आत्मानुभव मात्र स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था में प्राप्त
होता है—भट्टकल्लट।
प्रश्न—क्या प्रबुद्ध योगियों को भी स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थाओं में सुप्रबुद्धों
की ही भाँति ही अखण्ड, एकरस, अविरल एवं तैलधारावत् आत्मानुभव प्राप्त होता
रहता है या नहीं ? क्या इन दो अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में सुप्रबुद्धों की ही
भाँति 'सतत' एवं 'नित्य' अनुभूति प्राप्त होती रहती है या नहीं ? रामकण्ठाचार्य ने