स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२०८ स्पन्दकारिका
यही समस्त जड़ एवं चेतन दोनों भावों की विश्रान्ति का स्थान है—'हृदय' है—
प्रतिष्ठा स्थान है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तस्यापि विमर्शशक्तिः ॥'१ यही
महासत्ता 'विश्व जीवन' है—
'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ॥'
विश्व में जितनी भी जड़ सत्ताएँ हैं उन सभी की विश्रान्ति का एक मात्र स्थान यही
महादेवी है—यही विमर्श शक्ति या हृदय है।
'अन्तर्मुखोभावः' पदावली में 'भावः' पद—'कर्तृसत्ता' (कर्तृत्व) का बोधक है।
आत्मचैतन्य की नित्यता—कारिकाकार का कथन है कि 'अन्तर्मुख भाव' जो कि
शाश्वत रूप में अहं रूप में स्पन्दायमान है वह चेतन सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व आदि
गुणों का मूलाधिष्ठान है अतः उसका लोप (विनाश) कभी नहीं होता क्योंकि किसी भी
अन्य अतिरिक्त सत्ता की विद्यमानता का अनुभव किसी को भी नहीं होता।
इसी विचार को भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इस प्रकार कहते हैं—'न तु यः
अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढस्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात्
द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति ॥'२
सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों के भेद—
तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी ।
नित्यं स्यात्सुप्रबुद्धस्य तदाद्यन्ते परस्य तु ॥ १७ ॥
सुप्रबुद्ध योगी को उस (चैतन्यस्वभाव) की सम्प्राप्ति जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति
इन तीनों अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में समान एवं निरन्तर होती रहती है।
(किन्तु इसके विपरीत) प्रबुद्ध योगी को (इन तीनों अवस्थाओं में) से प्रथम (जाग्रत
अवस्था) की दो अवस्थाओं में (स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं में ही) चिद्रूप स्वभाव की
प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥
- सरोजिनी *
कारिकाकार ने इस कारिका में 'सुप्रबुद्ध' 'प्रबुद्ध' योगियों की अनुभूतियों का
तुलनात्मक विवेचन किया है।
तदाद्यन्ते = (आचार्य रामकण्ठ—'तत' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की
'आदि'—प्रथम । जाग्रत अवस्था के । 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों में (स्वप्न एवं
सुषुप्ति में) रामकण्ठाचार्य-भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या में 'स्वप्न सुषुप्तादौ'
शब्दों का प्रयोग करके—स्वप्न, सुषुप्ति एवं आदि (संवेदन की समस्त अवस्थाओं) को
द्योतित किया है।
भट्टकल्लट ने इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है—
१. शिवसूत्रविमर्शिनी । २. स्पन्दसर्वस्व ।