स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २१७
'कला' पुरुष में परिमित कर्तृत्व का निर्माण करती है और इसके द्वारा सुख
दुःखमोह रूप भोग्य का सृजन करती है ।
'कला'—कला से ही अष्टगुणात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है ।
सात्विक-राजस-तामस भेदभिन्न त्रिस्कंध अहंकार उत्पन्न होता है ।
अहंकार—मन को जन्म देता है । इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं
तन्मात्रा होती हैं । पंचभूत उत्पन्न होते हैं ।
इस प्रकार एक ही आदिदेव की स्वातन्त्र महिमा के द्वारा संसार में संसरण करने
वाले प्रमाता को परिमितप्रमातृत्व प्राप्त होता है—
'भूतानि तन्मात्रगणोनेन्द्रियाणि, मूलं पुमान्कंचुकयुक्तसुशुद्धम् ।
विद्यादि शक्त्यन्तमियान्स्वसंवित्, सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'१
चिद्रूप परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है और अत्यन्त उत्कृष्ट सामर्थ्य से युक्त है । वह
जाग्रत और स्वप्न में देदीत्यमान रहता है । उसकी शक्ति ही ज्ञान और ज्ञेय दोनों है ।
इसी से दोनों अवस्थाओं में दो प्रकार का कार्य करती हैं । दो प्रकार की उपलब्धि होती
है । इन दोनों अवस्थाओं में अन्यत्र सुषुप्ति और तुरीय दोनों अवस्थाओं में वह चिन्मात्र
ही रहता है क्योंकि वह ज्ञेय नहीं ज्ञान स्वरूप ही रहता है ।२
'विभुः' = व्यापक । 'ईश्वरश्चिन्मात्रमूर्तिरात्मा' ।
'पदद्वये' = जागर एवं स्वप्न नामक अवस्थाओं में ।
'परमया' = अत्यद्भुतरूप वाला होने के कारण सर्वातिशायिनी (शक्ति) के द्वारा ।
'शक्त्या' = निजी सामर्थ्य के द्वारा । शक्ति के द्वारा ।
'युतः' = सहित ॥ 'भाति' = प्रकाशित होता है । प्रकाशते, चकास्ति ॥
किस प्रकार की शक्ति के द्वारा ? 'ज्ञानज्ञेय स्वरूपिण्या' = ज्ञायतेऽनेन इति
ज्ञानं । बाह्याभ्यन्तर करणचक्र ग्रहणात्मक या ज्ञप्तिमात्र या 'ज्ञेय'—ग्राह्यः शब्दादिसुखादि
च विषयजातमनन्तविशेष । उस प्रकार का रूप जिसका हो वह 'ज्ञेयस्वरूपिणी' उस
ज्ञेयस्वरूपिणी के द्वारा ॥
परमेश्वर ही अपनी माया के वशीभूत होकर विविधात्मक क्षेत्रज्ञरूप द्वारा
अवभासमान होकर अपनी अव्यतिरिक्ता पराशक्ति को 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' भाव से
अवभासित करते हुए जागर-स्वप्न दशा वाले व्यवहार को उद्भावित करता है । यही
है उस शक्ति का पारम्य । अपने वैभवस्वरूप की प्रकाशमानता का अतिरोध करती हुई
शक्ति ज्ञान-ज्ञेय के अनन्त रूपों में स्फुरित होती है 'स्वस्य वैभवरूपस्य प्रकाशमानतां
अतिरोधधती ज्ञानज्ञेयमयानन्तरूपतया स्फुरति ॥'
द्वैतात्मक (अभेदप्रथन) स्थिति के मायांधकार में—अन्यत्र = अपरत्र । सुषुप्ति
१. जन्ममरणविचार में उद्धृत । २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।