स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २०५
इस दृष्टि से पादार्थिक जगत् और उसके विभिन्न रूप नश्वर हैं और उसका ज्ञाता रूप
अनश्वर है।१
सर्वज्ञत्व आदि गुणों का केन्द्र जो अन्तर्मुखी भाव है उसका लोप कभी नहीं होता।
'अन्तर्मुख' का अर्थ है—पदार्थ से (बाह्यार्थ से) विरुद्ध। अर्नुख 'ज्ञाता' है। यह वह है
जिसमें पराहंता (Supreme Egoity) का अधिपत्य है। 'अन्तर्मुखभाव' का अर्थ है—
ज्ञातृत्व आदि गुणों की परमास्पद चेतन सत्ता।२
देश कालादि से परिच्छिन्न कार्य की निवृत्ति होती है। अन्तर्मुख भाव जो बाहर
नहीं फैलता है स्वस्वरूपस्थ-स्वस्वभाव सर्वज्ञता आदि गुणों का आश्रय है, उस भाव की
निवृत्ति कभी नहीं होती। क्यों नहीं होती?
—इसलिए नहीं होती क्योंकि चिद्रूप के अतिरिक्त द्वितीय की उपलब्धि नहीं
होती। उसी की सर्वत्र, सर्वदा उपलब्धि होती है। जैसा कि कहा भी गया है कि—'देश-
काल-क्रिया एवं आकारों से परिच्छिन्न वस्तुओं में आप ही अनवच्छिन्न रूप से प्रकाशित
हो रहे हैं, क्योंकि आप उनसे बाहर हैं॥'—
देशकालक्रियाकारैरवच्छिन्नेषु वस्तुषु।
अनवच्छिन्नरूपस्त्वं भासि तस्य बहिः स्थितेः ॥'३
यही अन्यत्र भी कहा गया है। इसमें यह कहा गया है कि—सर्वज्ञता, ज्ञान आदि
में भेद नहीं है क्योंकि चिद्रूप ज्ञान की सब विभिन्न स्थितियाँ हैं।
'भेदः सर्वज्ञादीनां ज्ञानादीनां च नास्त्यमी।
ज्ञानस्यैव धर्मतया चिद्रूपस्य स्थितिर्यतः ॥'४
'षाड्गुण्य विवेक' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—'सभी गुणों के आदि अन्त
में ज्ञान ही होता है। केवल इसीसे तत्त्व का निश्चय हो जाता है। बल, वीर्य, ओज
आदि की शक्तियाँ धर्मरूप से स्वीकार हैं॥'५
'कक्ष्यास्तोत्र' में भी कहा गया है कि बाह्य विमर्श के कारण शक्ति अविद्या एवं
'ज्ञान' सर्वज्ञता है। बल तृप्तिमूलक है। अनादिबोध तेज है अतः बल का मूल बोध है।
'तेज' प्रभाव है जो दूसरों को झुका देता है।६
यही ईश्वर है और इसका स्वातन्त्र्य ही ऐश्वर्य है—
'बलस्य तृप्तिमूलत्वात् क्षमस्य तदभावतः।
आनादिबोधस्तेजोऽत्र बोधमूलं हि तत्सदा ॥'
कहा भी गया है७—
'प्रभाव लक्षणं यच्च तेजः प्रह्वयते परान्।
बोधत्वादेव तद्ग्रेह्यं बोधं प्रह्वयते जगत्।
स्वतन्त्रताऽत्र चैश्वर्यं स्वातन्त्र्यादीश्वरस्य तु ॥'
१-२. स्पन्दनिर्णय। ३-७. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।